- इत्तमार बेन गिविर: वह मंत्री जिसकी ज़िद ने बदला कानून
- भेदभावपूर्ण कानून: क्यों हो रहा है पूरी दुनिया में विरोध?
- इजराइल और फिलिस्तीन का खूनी इतिहास
दुनिया का ध्यान इस समय इज़राइल और अमेरिका की ईरान के साथ चल रही जंग पर केंद्रित है। इसी बीच इज़राइल की संसद Knesset ने एक ऐसा कानून पारित कर दिया है जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया है।
यह कानून फिलिस्तीन के नागरिकों के लिए मौत का फरमान बनकर आया है। इस आदेश के तहत अगर कोई फिलिस्तीनी नागरिक इजराइल को अस्थिर करने का प्रयास करता है, तो उसे सीधे फांसी की सजा दी जाएगी।
अब तक इज़राइल में अपराधियों को जेल में रखा जाता था, लेकिन अब नियम पूरी तरह बदल चुके हैं। इजराइल के इतिहास में अब तक केवल दो बार ही फांसी दी गई है, लेकिन यह नया कानून इसे सामान्य प्रक्रिया बनाने जा रहा है।
नया प्रावधान कहता है किइज़राइलल के खिलाफ कोई भी कार्रवाई मतलब सीधे फांसी का फंदा। इसके लिए विशेष रूप से Military Courts को अधिकार दिए गए हैं, जो फिलिस्तीनियों के मामलों पर फैसला सुनाएंगी।
हैरानी की बात यह है कि इस कानून के तहत सैन्य अदालत को फैसला लेने के 90 दिन के भीतर अपराधी को फांसी पर लटकाना होगा। पूरी दुनिया में इस फैसले को लेकर चर्चा शुरू हो गई है क्योंकि यह सीधे तौर पर एक समुदाय को निशाना बनाता दिख रहा है।
सवाल उठ रहे हैं कि आखिर इजराइल ने ऐसा कड़ा रुख क्यों अपनाया है? इसका जवाब इजराइल की आंतरिक राजनीति और सुरक्षा चिंताओं में छिपा है जिसे समझना बेहद जरूरी है।
इस कानून के पीछे इज़राइल के सुरक्षा मंत्री Itamar Ben-Gvir की बड़ी भूमिका मानी जा रही है। बेन गिविर को इजराइली राजनीति में एक कट्टरपंथी चेहरा माना जाता है जो लंबे समय से इस बिल की मांग कर रहे थे।
इत्तमार बेन गिविर: वह मंत्री जिसकी ज़िद ने बदला कानून
इत्तमार बेन गिविर इजराइल के Security Minister हैं और वह फार राइट विंग विचारधारा के समर्थक माने जाते हैं। उन्होंने बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार पर दबाव बनाया था कि यदि यह बिल पास नहीं हुआ, तो वह गठबंधन से समर्थन वापस ले लेंगे।
इजराइली संसद यानी नेसेट में कुल 120 सीटें हैं और बहुमत के लिए 60 से ज्यादा सीटों की जरूरत होती है। Benjamin Netanyahu की लिक्विड पार्टी 32 सीटों के साथ सरकार का नेतृत्व कर रही है, लेकिन उन्हें अन्य दलों के समर्थन की सख्त जरूरत है।
बेन गिविर की पार्टी के पास मात्र 6 सीटें हैं, लेकिन ये 6 सीटें सरकार को गिराने के लिए काफी हैं। नेतन्याहू ने अपनी सत्ता बचाने के लिए बेन गिविर की इस मांग को स्वीकार करना ही बेहतर समझा।
बिल पास होने के बाद संसद के अंदर जश्न का माहौल था। मंत्री बेन गिविर ने बकायदा शैंपेन की बोतलें खोलकर और शराब बांटकर अपनी जीत का इजहार किया।
तस्वीरें सामने आई हैं जिसमें वह संसद के भीतर खुशी मनाते दिख रहे हैं, जैसे उन्होंने कोई बहुत बड़ा युद्ध जीत लिया हो। पिछले एक साल से वह अपनी छाती पर फांसी का स्टिकर लगाकर घूम रहे थे, जो उनके इस मिशन के प्रति जुनून को दर्शाता था।
इस बिल के पास होने का मतलब है कि अब 7 अक्टूबर जैसी घटनाओं के बाद आतंकियों के साथ कोई बातचीत या नेगोशिएशन नहीं होगा। अब बंधकों की अदला-बदली के बदले अपराधियों को छोड़ने का रिवाज खत्म करने की कोशिश की जा रही है।
बेन गिविर का स्पष्ट संदेश है कि अब कोई भी फिलिस्तीनी अगर इजराइली नागरिक की हत्या करता है या आतंकी गतिविधि में शामिल होता है, तो उसे जेल नहीं बल्कि मौत मिलेगी।
भेदभावपूर्ण कानून: क्यों हो रहा है पूरी दुनिया में विरोध?
दुनियाभर के मानवाधिकार संगठन और कई देश इस कानून को Discriminatory यानी भेदभावपूर्ण बता रहे हैं। सबसे बड़ा विवाद इस बात पर है कि यह कानून केवल फिलिस्तीनियों पर लागू होगा, यहूदियों पर नहीं।
वेस्ट बैंक के क्षेत्र में रहने वाले फिलिस्तीनी और यहूदी सेटलर्स दोनों ही वहां मौजूद हैं। यदि कोई यहूदी नागरिक किसी अपराध में शामिल होता है, तो उसकी सुनवाई इज़राइल की Civil Courts में होगी।
लेकिन यदि उसी क्षेत्र का कोई फिलिस्तीनी नागरिक वही अपराध करता है, तो उसकी सुनवाई मिलिट्री कोर्ट में होगी। मिलिट्री कोर्ट के फैसलों पर कोई अपील करने का भी प्रावधान नहीं रखा गया है।
इस कानून की तुलना दक्षिण अफ्रीका के पुराने Apartheid (रंगभेद) सिस्टम से की जा रही है। वहां भी गोरों और अश्वेतों के लिए अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हुआ करती थीं।
संयुक्त राष्ट्र (UN), यूरोपीय संघ और कनाडा जैसे देशों ने इस पर सख्त आपत्ति जताई है। उनका मानना है कि यह फैसला क्षेत्र में तनाव को और अधिक बढ़ा सकता है और शांति की संभावनाओं को खत्म कर देगा।
यूरोपीय संघ के कमीशन ने इज़राइल से इस बिल को वापस लेने का आग्रह किया है। ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, इटली और यूके ने भी इसे एकतरफा और खतरनाक कदम करार दिया है।
विपक्ष के नेता Yair Lapid ने भी अपनी ही सरकार की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि ऐसा कानून बनाकर हम भी हमास जैसे ही बन रहे हैं, जो केवल नफरत और हिंसा में विश्वास रखते हैं।
इजराइल और फिलिस्तीन का खूनी इतिहास
इस कानून को समझने के लिए इज़राइल और फिलिस्तीन के बीच के लंबे और पेचीदा इतिहास को देखना जरूरी है। यह संघर्ष दशकों पुराना है और समय के साथ केवल गहराता गया है।
इतिहास 1917 से शुरू होता है जब प्रथम विश्व युद्ध में ऑटोमन साम्राज्य की हार के बाद ब्रिटेन ने फिलिस्तीन पर कब्जा किया था। इसके बाद हिटलर के द्वारा यहूदियों के नरसंहार ने उनके लिए एक अलग देश की मांग को जन्म दिया।
1947 में संयुक्त राष्ट्र ने फिलिस्तीन को बांटकर इजराइल बनाने का प्रस्ताव दिया और 1948 में Israel नामक देश अस्तित्व में आया। इसके बाद से ही अरब देशों और इज़राइल के बीच लगातार युद्ध होते रहे हैं।
1967 के युद्ध में इजराइल ने गोलन हाइट्स, वेस्ट बैंक और गाजा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया था। 1987 में Hamas की स्थापना हुई, जिसने इजराइल के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष शुरू किया।
जो फिलिस्तीन 1946 तक एक विशाल भूभाग हुआ करता था, वह आज केवल कुछ पैचेस में सिमट कर रह गया है। इजराइल लगातार अपने क्षेत्रफल का विस्तार कर रहा है और नए कानून इसी विस्तारवादी नीति का हिस्सा माने जा रहे हैं।
7 अक्टूबर 2023 की घटना ने इस संघर्ष में आग में घी डालने का काम किया है। हमास के हमले में 1200 से अधिक इजराली लोगों की मौत के बाद इजराइल का रुख और अधिक कड़ा हो गया है।
गाजा में चल रही एयर स्ट्राइक और वेस्ट बैंक में बढ़ता नियंत्रण इसी बदले की भावना का परिणाम हैं। अब फांसी का यह नया कानून फिलिस्तीनियों को पूरी तरह दबाने का एक नया हथियार बन गया है।
सुपर स्पार्टा बनने की राह पर नेतन्याहू
बेंजामिन नेतन्याहू ने हाल ही में एक बयान दिया था कि वह इज़राइल को Super Sparta बनाना चाहते हैं। इसका मतलब है एक ऐसा शक्तिशाली राष्ट्र जो केवल अपनी ताकत के दम पर टिका हो और किसी पर निर्भर न रहे।
इस 'सुपर स्पार्टा' के सपने को पूरा करने के लिए इज़राइल हर मोर्चे पर हमलावर है। वह न केवल हमास को खत्म कर रहा है, बल्कि लेबनान और ईरान जैसे दुश्मनों से भी सीधे लोहा ले रहा है।
इजराइल ने लेबनान के लगभग 10% हिस्से पर कब्जा कर लिया है और गाजा का बड़ा हिस्सा अब उसके नियंत्रण में है। वेस्ट बैंक में भी वह अपनी पकड़ मजबूत कर चुका है और फांसी का कानून अब वहां के बचे हुए फिलिस्तीनियों के लिए अंतिम चेतावनी है।
नेतन्याहू का लक्ष्य 2026 के चुनावों से पहले अपनी छवि को एक अजेय नेता के रूप में स्थापित करना है। वह दिखाना चाहते हैं कि वह इजराइल की सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं, चाहे पूरी दुनिया उनके खिलाफ क्यों न हो जाए।
वेस्ट बैंक में रहने वाले फिलिस्तीनी अब एक डर के साये में जीने को मजबूर हैं। यदि वे इजराइली कार्रवाई का विरोध करते हुए एक पत्थर भी उठाते हैं, तो नए कानून के तहत उन्हें फांसी हो सकती है।
यह कानून केवल अपराध की सजा नहीं है, बल्कि एक पूरे समुदाय को बेदखल करने की रणनीति का हिस्सा भी नजर आता है। इजराइल धीरे-धीरे उन क्षेत्रों को भी अपने में मिला रहा है जो कभी फिलिस्तीन की पहचान हुआ करते थे।
फिलहाल के लिए यह बिल पास हो चुका है और कानून बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद इजराइल ने अपने कदम पीछे खींचने से साफ इनकार कर दिया है।
आने वाले समय में यह कानून मिडिल ईस्ट की राजनीति को किस मोड़ पर ले जाएगा, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। क्या यह शांति की ओर एक कदम है या फिर एक महायुद्ध की आहट, इसका जवाब भविष्य के गर्भ में छिपा है।
पूरी दुनिया इस घटनाक्रम पर नजरें गड़ाए बैठी है क्योंकि यह केवल दो देशों का मामला नहीं है। यह मानवाधिकारों, अंतरराष्ट्रीय कानूनों और वैश्विक शांति के सिद्धांतों की एक बड़ी परीक्षा है।
इजराइल का यह सख्त कानून निश्चित रूप से आने वाले दशकों तक वैश्विक विमर्श का केंद्र बना रहेगा। दुनिया के तमाम बड़े देश इस पर अपनी प्रतिक्रिया दे चुके हैं, लेकिन इज़राइल अपनी जिद पर अड़ा हुआ है।
इस पूरे घटनाक्रम से यह साफ है कि इजराइल अब अपनी सुरक्षा के लिए किसी भी अंतरराष्ट्रीय मापदंड की परवाह नहीं करेगा। 'सुपर स्पार्टा' बनने की उसकी यह जर्नी दुनिया के लिए नई चुनौतियां लेकर आ रही है।
फिलिस्तीनियों के लिए यह कानून अस्तित्व की लड़ाई को और अधिक कठिन बना देगा। 90 दिन की समय सीमा और मिलिट्री कोर्ट का दखल, न्याय की अवधारणा को पूरी तरह बदल कर रख देगा।
दुनिया अब सिर्फ देख सकती है कि इस कानून का पहला शिकार कौन होगा और उसके बाद वैश्विक स्तर पर क्या प्रतिक्रिया होती है। इजराइल ने अपना दांव चल दिया है, अब बारी बाकी दुनिया की है।