- ट्रंप का बड़ा फैसला: क्या अमेरिका छोड़ देगा मध्य पूर्व का साथ?
- स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज का संकट और तेल की बढ़ती कीमतें
- भारत की रणनीति: प्रधानमंत्री ने बुलाई कैबिनेट कमेटी की बैठक
दुनिया भर में एक बार फिर से महायुद्ध की आहट सुनाई देने लगी है। मध्य पूर्व (Middle East) के हालातों को देखते हुए आशंका व्यक्त की जा रही है कि कुछ ऐसा बड़ा होने वाला है, जो पूरी दुनिया को हिलाकर रख देगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस संकट की तुलना कोरोना काल (COVID-19) से की है। उनके अनुसार, यह संकट वैसा ही है जैसा पूरी दुनिया ने वैश्विक महामारी के दौरान देखा था।
आज रात का समय पूरी दुनिया के लिए बेहद संवेदनशील माना जा रहा है। तेहरान यानी ईरान (Iran) के द्वारा पश्चिम एशिया के उन देशों पर हमले किए जाने की पूरी संभावना है, जहां अमेरिकी कंपनियों के बड़े ठिकाने हैं।
इन ठिकानों में Google, Facebook (Meta) और Alphabet जैसी दिग्गज अमेरिकी कंपनियां शामिल हैं। रिपोर्टों के अनुसार, लगभग 18 से अधिक ऐसी कंपनियां हैं जिन्हें निशाना बनाया जा सकता है।
ईरान के समय के अनुसार रात 8:00 बजे और भारतीय समयानुसार रात 10:00 बजे ये हमले शुरू हो सकते हैं। तेहरान टाइम्स की खबरों ने इस खतरे को और भी अधिक गंभीर बना दिया है।
ट्रंप का बड़ा फैसला: क्या अमेरिका छोड़ देगा मध्य पूर्व का साथ?
एक तरफ ईरान हमले की तैयारी कर रहा है, तो दूसरी तरफ डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके सबको चौंका दिया है। ट्रंप ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वह अब इस युद्ध से खुद को बाहर कर रहे हैं।
ट्रंप का मानना है कि यह युद्ध अब मुश्किल से दो हफ्ते और चलेगा। उन्होंने स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज (Strait of Hormuz) के मसले पर किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप से इनकार कर दिया है।
अमेरिका का यह रुख दुनिया के लिए काफी चिंताजनक है क्योंकि वह एक बार फिर वापसी की राह देख रहा है। ट्रंप ने साफ कह दिया है कि अगर स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज रुकता है, तो यह दुनिया की परेशानी है, उनकी नहीं।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अमेरिका के पास अपना पर्याप्त तेल भंडार है। जिन्हें तेल की जरूरत है, वे खुद इसे खुलवाएं और अपना व्यापार सुरक्षित करें।
ट्रंप का यह व्यवहार वैसा ही है जैसा उन्होंने अफगानिस्तान (Afghanistan) से बाहर निकलते समय अपनाया था। उन्होंने अफगानिस्तान को तालिबान के भरोसे छोड़ दिया था और अब वे ईरान के मामले में भी ऐसा ही कुछ कर सकते हैं।
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज का संकट और तेल की बढ़ती कीमतें
दुनिया की लगभग 20% तेल आपूर्ति पूरी तरह से बाधित होने की कगार पर है। ईरान इस क्षेत्र में अपना दबदबा बनाए हुए है और वह बदले की कार्रवाई के लिए तैयार है।
जब इशान पर हमले हुए थे, तो ईरान ने उसी समय घोषणा कर दी थी कि वह इसका बदला जरूर लेगा। अब सवाल यह है कि क्या ये बदले वाकई में होंगे या यह केवल एक मनोवैज्ञानिक युद्ध है।
अगर ये हमले हकीकत में बदलते हैं, तो जीसीसी (GCC) देशों की ताकत और उनकी हिम्मत टूट सकती है। इसके बाद ये देश भी जवाबी कार्रवाई के लिए मजबूर हो जाएंगे, जिससे युद्ध की आग और भड़क सकती है।
ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि यूएई (UAE) भी अब इस युद्ध में शामिल होने पर विचार कर रहा है। हालांकि, अभी तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन चर्चाएं तेज हैं।
यूएई एक ऐसी विशेष सैन्य फोर्स बनाने की योजना बना रहा है जो बलपूर्वक स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को खुलवा सके। इससे उनके जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी और व्यापार को फिर से गति मिल सकेगी।
भारत की रणनीति: प्रधानमंत्री ने बुलाई कैबिनेट कमेटी की बैठक
इस वैश्विक अस्थिरता के बीच भारत सरकार पूरी तरह से सतर्क मोड में आ गई है। प्रधानमंत्री मोदी ने कैबिनेट कमेटी ऑफ सिक्योरिटी (CCS) की एक अहम बैठक बुलाई है।
इस बैठक में रक्षा मंत्री, गृह मंत्री, विदेश मंत्री और वित्त मंत्री के साथ-साथ शीर्ष सैन्य अधिकारियों ने भी हिस्सा लिया। बैठक का मुख्य उद्देश्य इस युद्ध के भारत पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण करना था।
भारत सरकार ने तेल की बढ़ती कीमतों से देश की जनता को बचाने के लिए एक्साइज ड्यूटी (Excise Duty) में कटौती का ऐतिहासिक फैसला लिया है। यह कदम आम जनता को महंगाई की मार से बचाने के लिए उठाया गया है।
जब कच्चा तेल रिफाइन होकर आप तक पहुंचता है, तो सरकार उस पर उत्पादन शुल्क वसूलती है। भारत सरकार ने इस शुल्क में लगभग ₹10 की कटौती की है, ताकि पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर रहें।
युद्ध से पहले कच्चे तेल की कीमत $70 प्रति बैरल थी, जो अब $105 से $110 तक पहुंच गई है। इसके बावजूद भारत सरकार ने अपने करों में कटौती करके कीमतों को बढ़ने से रोका है।
भारत अब वैकल्पिक रास्तों से और 41 से अधिक देशों से तेल मंगाने के प्रयास कर रहा है। इस रणनीति का उद्देश्य ईरान-इजराइल संकट पर भारत की निर्भरता को कम करना है।
ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन ने भी अपनाए भारत जैसे कड़े कदम
हैरानी की बात यह है कि दुनिया की विकसित अर्थव्यवस्थाएं भी अब भारत के मॉडल को अपना रही हैं। ऑस्ट्रेलिया (Australia) के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बेनीस ने भी राष्ट्र को संबोधित किया है।
ऑस्ट्रेलिया ने साफ किया है कि वे इस युद्ध में सीधे तौर पर शामिल नहीं हैं, लेकिन इसका आर्थिक असर उन पर भी पड़ रहा है। इसी कारण उन्होंने भी भारत की तरह एक्साइज ड्यूटी में कटौती का ऐलान किया है।
ऑस्ट्रेलिया में अगले 3 महीनों के लिए तेल पर लगभग 26 सेंट की कटौती की गई है। यह दर्शाता है कि विकसित देश भी अब यह मानने लगे हैं कि यह संकट लंबा खिंचने वाला है।
वहीं दूसरी ओर, ब्रिटेन (UK) के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने भी देश के नाम संबोधन जारी किया है। ब्रिटेन ने अपनी जनता की सुरक्षा के लिए कई कठोर फैसले लिए हैं।
ब्रिटेन ने स्पष्ट कर दिया है कि वे युद्ध में शामिल नहीं होंगे, जिससे ट्रंप काफी नाराज बताए जा रहे हैं। ट्रंप ने यहां तक कह दिया है कि वे नाटो (NATO) भी छोड़ सकते हैं क्योंकि उनके सहयोगी उनका साथ नहीं दे रहे हैं।
यूरोप में आर्थिक मंदी का साया और वर्क फ्रॉम होम की वापसी
यूरोप के हालात इस समय सबसे ज्यादा खराब बताए जा रहे हैं। वहां आर्थिक मंदी (Recession) का डर अपने चरम पर है और सरकारों ने एहतियाती कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।
यूरोप के कई देशों ने अपने नागरिकों को फिर से वर्क फ्रॉम होम (Work From Home) करने की सलाह दी है। इसका मुख्य कारण तेल और ऊर्जा की खपत को कम करना है ताकि संकट के समय संसाधनों को बचाया जा सके।
यूरोप के लिए सबसे बड़ी पनौती यूक्रेन युद्ध बना था, जिसके चलते उन्हें रूस से मिलने वाला सस्ता तेल और गैस छोड़ना पड़ा। अब मध्य पूर्व का यह संकट उनकी अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ सकता है।
बैंक ऑफ इंग्लैंड ने भी चेतावनी दी है कि अगर यह युद्ध लंबा चला, तो ब्रिटेन और पूरे यूरोप में भयानक फाइनेंशियल क्राइसिस पैदा हो सकता है। इसीलिए वहां की सरकारों ने रेल और बिजली के बिलों को कंट्रोल में रखने का फैसला किया है।
इधर भारत में भी एयर फेयर (हवाई किराया) काफी बढ़ गया है क्योंकि जेट फ्यूल (Jet Fuel) महंगा हो चुका है। दुबई और दोहा जैसे ट्रांजिट पॉइंट्स अब सुरक्षित नहीं माने जा रहे हैं।
ईरान का आंतरिक संकट: आईआरजीसी का बढ़ता प्रभाव
ईरान के भीतर भी स्थितियां सामान्य नहीं हैं, वहां एक अलग ही प्रकार का सत्ता संघर्ष देखने को मिल रहा है। ईरान के राष्ट्रपति पजेकियन की बातों को वहां की सेना (IRGC) नजरअंदाज कर रही है।
आईआरजीसी (IRGC) यानी ईरान का रिवोल्यूशनरी गार्ड अब पूरी तरह से स्वतंत्र होकर फैसले ले रहा है। यह स्थिति वैसी ही है जैसे पाकिस्तान में सेना और सरकार अलग-अलग दिशा में चलते हैं।
हैरानी की बात यह है कि ईरान के राष्ट्रपति अब तक अपने सुप्रीम लीडर से नहीं मिल पाए हैं। आईआरजीसी ने सारा कमांड कंट्रोल अपने हाथ में ले लिया है और वे ही अब देश की युद्ध नीति तय कर रहे हैं।
आईआरजीसी के चीफ अहमद वहीदी इस समय ईरान के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बनकर उभरे हैं। उनका लक्ष्य है कि वे अमेरिका के हर हमले का जवाब पश्चिम एशिया में मौजूद अमेरिकी संपत्तियों पर हमला करके देंगे।
ईरान ने हाल ही में अपने मिसाइलों के जखीरे की तस्वीरें भी जारी की हैं। इन तस्वीरों में उनके कमांडर मिसाइलों के बीच चलते हुए दिखाई दे रहे हैं, जो सीधे तौर पर दुनिया को दी गई एक धमकी है।
भविष्य की चुनौतियां: क्या होगा अगला कदम?
अब सबकी नजरें कल सुबह होने वाले ट्रंप के संबोधन पर टिकी हैं। भारतीय समयानुसार परसों सुबह 6:00 बजे ट्रंप अमेरिका को संबोधित करेंगे, जिसे पूरी दुनिया बहुत ध्यान से देखेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप किसी बड़े सीजफायर (Ceasefire) की आड़ में अमेरिका को इस युद्ध से बाहर निकालने का रास्ता खोज रहे हैं। वे इस युद्ध का लाभ उठाकर अपने डिफेंस और ऊर्जा सेक्टर को और मजबूत करना चाहते हैं।
अमेरिका इस समय ऊंचे दामों पर तेल और हथियार बेचकर मुनाफा कमा रहा है। लेकिन दुनिया के अन्य देशों के लिए यह स्थिति बहुत ही घातक साबित हो रही है, जिससे वैश्विक शांति को खतरा है।
भारत जैसे देश इस पूरी गतिविधि में अपनी आत्मनिर्भरता और कूटनीति के दम पर टिके हुए हैं। सरकार ने आश्वासन दिया है कि देश के पास तेल और गैस के प्रचुर भंडार मौजूद हैं और चिंता की कोई बात नहीं है।
लेकिन आने वाले कुछ घंटे यह तय करेंगे कि क्या दुनिया एक और बड़े युद्ध की आग में झोंकी जाएगी या कूटनीति के जरिए इस संकट को टाला जा सकेगा। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पर कब्जा पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था की चाबी है, जो इस समय ईरान के पास है।
फिलहाल, स्थिति तनावपूर्ण है और हर देश अपनी-अपनी तैयारियों में जुटा है। भारत की कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी इस पर पल-पल की नजर बनाए हुए है ताकि देश की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था को आंच न आए।