- स्टेट ऑफ हॉर्मुज पर अब ईरान का राज?
- तेल की राजनीति और अमेरिका का फायदा
- यूरोप और नाटो देशों पर भड़के ट्रंप
डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर दुनिया को अपने चौंकाने वाले फैसलों से हिलाकर रख दिया है। अमेरिका ने आधिकारिक तौर पर ईरान के साथ चल रहे युद्ध जैसे हालातों से पीछे हटने का ऐलान कर दिया है।
ट्रंप ने साफ लफ्जों में कह दिया है कि अब State of Hormuz (स्टेट ऑफ हॉर्मुज) को खुलवाना अमेरिका की जिम्मेदारी नहीं है। उन्होंने उन तमाम देशों को चेतावनी दी है जो तेल के लिए अमेरिका पर निर्भर रहते थे।
ट्रंप का कहना है कि जिन्हें तेल चाहिए, वे खुद जाएं और अपना रास्ता साफ करें। उन्होंने NATO (नाटो) देशों को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि जब आप युद्ध में हमारे साथ नहीं आए, तो हम आपकी सुरक्षा क्यों करें?
यह बयान वैश्विक राजनीति में एक बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रहा है। ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका अब दुनिया का पुलिसमैन बनने के मूड में नहीं है।
स्टेट ऑफ हॉर्मुज पर अब ईरान का राज?
स्टेट ऑफ हॉर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण Strategic Choke Points में से एक है। यहाँ से दुनिया का एक बड़ा हिस्सा कच्चे तेल का व्यापार करता है।
ट्रंप के ताजा बयान के बाद अब इस रास्ते पर ईरान का दबदबा पूरी तरह कायम होने की संभावना है। ट्रंप ने पत्रकारों से कहा कि हम अपने सैन्य अभियान खत्म करने की तैयारी में हैं।
ईरान और ओमान के बीच स्थित इस छोटे से रास्ते से व्यापार करने वाले देशों को अब सीधे ईरान से बात करनी होगी। अमेरिका ने साफ कर दिया है कि उसे इस रास्ते को खुला रखने की अब कोई आवश्यकता नहीं है।
अखबारों को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने दावा किया कि ईरान में जो परिवर्तन वे चाहते थे, वह होता हुआ दिखाई दे रहा है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि ट्रंप का असली मकसद कुछ और ही है।
तेल की राजनीति और अमेरिका का फायदा
ट्रंप ने दुनिया को चार कड़े संदेश भेजे हैं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण ईधन की राजनीति है। उन्होंने कहा कि अमेरिका के पास भरपूर तेल है, जिसे चाहिए वह हमसे खरीदे।
दुनिया में तेल की कीमतें बढ़ाकर ट्रंप ने अमेरिकी तेल के लिए एक बेहतरीन माहौल तैयार कर लिया है। अब तक अमेरिका का तेल महंगा होने के कारण लोग इसे कम खरीदते थे, लेकिन अब स्थिति बदल गई है।
ट्रंप की रणनीति को 'ब्लैक गोल्ड' यानी क्रूड ऑयल से पैसा कमाने के मास्टरस्ट्रोक के रूप में देखा जा रहा है। उन्होंने साफ कहा कि हम ईरान के खात्मे में अब शामिल नहीं होंगे, क्योंकि बुनियादी काम पूरा हो चुका है।
उनका दावा है कि ईरान का बुनियादी ढांचा तबाह हो चुका है और वह अब Nuclear Bomb (परमाणु बम) नहीं बना पाएगा। हालांकि, इस दावे पर अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है।
यूरोप और नाटो देशों पर भड़के ट्रंप
ट्रंप ने फ्रांस और अन्य यूरोपीय देशों पर जमकर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि फ्रांस ने अमेरिकी जहाजों को अपने हवाई क्षेत्र का उपयोग करने से रोका, जिसे अमेरिका याद रखेगा।
नाटो देशों के प्रति ट्रंप का गुस्सा उनके भाषणों में साफ झलका। उन्होंने कहा कि जब इज़राइल को मिलिटरी सप्लाई की जरूरत थी, तब फ्रांस ने मदद करने से इनकार कर दिया था।
दिलचस्प बात यह है कि स्पेन और इटली जैसे देशों ने भी अमेरिका को अपनी जमीन का उपयोग करने से मना कर दिया है। इन देशों का कहना है कि वे अपनी धरती का इस्तेमाल किसी भी युद्ध के लिए नहीं होने देंगे।
अमेरिका के पास दुनिया भर में 250 से अधिक सैन्य ठिकाने हैं, लेकिन युद्ध के समय वे उनके काम नहीं आ पा रहे हैं। इस क्रेडिबिलिटी के संकट ने ट्रंप को युद्ध से पीछे हटने पर मजबूर किया है।
ईरान की पलटवार की धमकी: Apple और Google निशाने पर
ईरान का तर्क है कि जब उन पर हमले हो रहे थे, तब दुनिया चुप थी। अब अगर किसी को उनके समुद्री क्षेत्र से गुजरना है, तो उसे कीमत चुकानी होगी।
ईरान ने यह भी चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका ने जमीन पर उतरने की कोशिश की, तो वे Apple, Microsoft और Google जैसी कंपनियों के ठिकानों को निशाना बनाएंगे। पश्चिम एशिया में इन कंपनियों के बड़े सेंटर ईरान की मिसाइलों की जद में हैं।
ईरान का कहना है कि वे किसी भी तरह के सत्ता परिवर्तन (Regime Change) को बर्दाश्त नहीं करेंगे। ट्रंप ने हालांकि अब कहना शुरू कर दिया है कि सत्ता परिवर्तन कभी उनका लक्ष्य था ही नहीं।
यह ट्रंप की एक और 'यू-टर्न' वाली राजनीति मानी जा रही है। उन्होंने अब केवल परमाणु हथियारों को रोकने की बात तक ही खुद को सीमित कर लिया है।
ट्रंप की 'मैडमैन थ्योरी' और दुनिया में भ्रम
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप जानबूझकर दुनिया को भ्रमित कर रहे हैं। कभी वे 48 घंटे में हमले की बात करते हैं, तो कभी 10 दिन के सीजफायर की।
इसे ट्रंप की Double-Cross Strategy कहा जाता है, जहाँ वे दुश्मन को यह समझने ही नहीं देते कि अगला कदम क्या होगा। ट्रंप ने खुद को एक ऐसे विजेता के रूप में पेश किया है जिसने अपना काम पूरा कर लिया है।
लेकिन वास्तविकता यह है कि अमेरिकी ठिकानों पर हमले अभी भी जारी हैं। सऊदी अरब में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों और दूतावासों को निशाना बनाया जा रहा है।
ट्रंप इन हमलों को 'अर्धसत्य' कहकर टाल रहे हैं। उनका कहना है कि अमेरिका की मुख्य भूमि सुरक्षित है, और बाहर क्या हो रहा है उससे उन्हें विशेष फर्क नहीं पड़ता।
पाकिस्तान और चीन की बैकडोर एंट्री
जब अमेरिका खुद को इस दलदल से निकाल रहा है, तो उसने बैकडोर से Pakistan (पाकिस्तान) का इस्तेमाल करना शुरू किया है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार हाल ही में चीन पहुंचे हैं।
अब दुनिया भर के देश शांति के लिए चीन और संयुक्त राष्ट्र (UN) की ओर देख रहे हैं। ट्रंप ने माहौल को इतना बिगाड़ दिया है कि अब सुधारने की जिम्मेदारी दूसरों पर डाल दी है।
चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ पाकिस्तान ने 5 सूत्रीय शांति कार्यक्रम पर चर्चा की है। इसमें ईरान की संप्रभुता और स्टेट ऑफ हॉर्मुज को खुला रखने की बात शामिल है।
भविष्य का संकट: क्या फिर बढ़ेंगे तेल के दाम?
ट्रंप ने साफ कर दिया है कि वे बहुत जल्द ईरान के मुद्दे को छोड़कर पूरी तरह बाहर निकल जाएंगे। आने वाले हफ्तों में अमेरिकी सेना की वापसी बड़े पैमाने पर हो सकती है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या ट्रंप के जाने के बाद शांति आएगी? या फिर ईरान और अधिक आक्रामक होकर टोल वसूलना और रास्ता बंद करना शुरू कर देगा?
दुनिया की अर्थव्यवस्था पहले ही महंगाई से जूझ रही है। अगर स्टेट ऑफ हॉर्मुज पर ईरान का नियंत्रण होता है, तो तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं।
ट्रंप की इस व्यापारिक राजनीति ने दुनिया को एक ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया है जहाँ हर देश को अपनी सुरक्षा खुद देखनी होगी। अमेरिका अब केवल अपने व्यापारिक हितों की रक्षा करने में लगा है।
आज रात ट्रंप देश को संबोधित करने वाले हैं, जिसमें वे कुछ और बड़े ऐलान कर सकते हैं। दुनिया भर की नजरें अब व्हाइट हाउस पर टिकी हैं कि क्या वास्तव में यह युद्ध समाप्त हो रहा है या यह किसी बड़ी तबाही की शुरुआत है।
ईरान ने स्पष्ट किया है कि वे 6 महीने तक युद्ध लड़ने के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा कि युद्ध हमने शुरू नहीं किया था, लेकिन खत्म करेंगे।
इस पूरी प्रक्रिया में अमेरिका ने एक पूंजीपति की तरह व्यवहार किया है। पहले मांग और आपूर्ति के संतुलन को बिगाड़ा और अब मुनाफा कमाने के लिए बाजार से बाहर हो रहा है।
आने वाले समय में ट्रंप की इस थ्योरी को 'इकोनॉमिक वॉरफेयर' के रूप में पढ़ा जाएगा। फिलहाल, दुनिया को अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए नए विकल्प तलाशने होंगे क्योंकि 'ग्लोबल पुलिसमैन' अब छुट्टी पर जा चुका है।