- क्यूबा में गहराता मानवीय संकट: बिना तेल और बिजली के लोग
- वेनेजुएला का पतन और क्यूबा की तेल सप्लाई का अंत
- मार्को रूबियो और क्यूबा के खिलाफ अमेरिकी रणनीति
वेनेजुएला के बाद अगला नंबर ईरान का है और ईरान के बाद अब अगला नंबर क्यूबा का है। यह कोई सामान्य कयास नहीं है, बल्कि अमेरिका की ओर से आया एक सीधा और स्पष्ट बयान है।
निकोलस मादुरो के बाद हमने इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों को देखा, जिसमें अमेरिका पूरी तरह से इजराइल के साथ खड़ा था। अब अमेरिकी निशाने पर Cuba है और डोनाल्ड ट्रंप ने इसे 'नेक्स्ट' कहकर सुर्खियों में ला दिया है।
28 मार्च की ताजा हेडलाइन इसी ओर इशारा करती है जब ट्रंप ने खुले तौर पर कहा कि अब उनके लिए अगला टारगेट क्यूबा है। ईरान के बाद क्यूबा तक पहुंचने की इस कहानी में अमेरिका एक बहुत बड़ी बिसात बिछा रहा है।
क्यूबा को ऐतिहासिक रूप से रूस के एक मजबूत मित्र के रूप में जाना जाता रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या रूस क्यूबा की मदद के लिए आगे आएगा?
या फिर जिस तरह रूस ने बशर अल असद और मादुरो का साथ धीरे-धीरे कम किया, वैसे ही क्यूबा को भी अकेला छोड़ दिया जाएगा? पहले क्यूबा अमेरिका की नाक के नीचे बैठकर उसे चिढ़ाता था क्योंकि तब सोवियत रूस का हाथ उसके ऊपर था।
लेकिन हाल के समय में जब से रूस ने अपने करीबियों का साथ देना कम किया है, क्यूबा की स्थिति एक बेकार पड़े सामान जैसी हो गई है। अमेरिका क्यूबा को लेकर इतना आक्रामक हो चुका है कि बिना कब्जा किए भी वहां के हालात कब्जे जैसे बना दिए हैं।
क्यूबा में गहराता मानवीय संकट: बिना तेल और बिजली के लोग
क्यूबा के लिए वर्तमान में कोई भी देश आगे क्यों नहीं आ रहा है, यह एक बड़ा सवाल है। अमेरिका ने क्यूबा पर जो Sanctions लगाए हैं, उनसे वहां की कमर पूरी तरह टूट चुकी है।
क्यूबा अमेरिका के दक्षिण-पूर्व किनारे पर स्थित एक छोटा सा देश है, जिसे अमेरिका कभी पसंद नहीं करता। इसका मुख्य कारण क्यूबा का साम्यवादी (Communist) होना और अमेरिका का पूंजीवादी होना रहा है।
साम्यवादी देशों का नेतृत्व हमेशा से सोवियत रूस ने किया है और क्यूबा उसी विचारधारा पर अडिग रहा है। वहां आज भी कोई प्राइवेट अस्पताल या स्कूल नहीं है, सब कुछ सरकार के नियंत्रण में है।
क्यूबा ने इतिहास में 'शुगर का कटोरा' बनने और Fidel Castro के नेतृत्व में अपनी एक अलग अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई थी। लेकिन अब फिदेल कास्त्रो नहीं हैं और ट्रंप का अमेरिका इस देश पर दबाव बढ़ाने के नए तरीके ढूंढ रहा है।
कोल्ड वॉर के दौर में क्यूबा 'एप्पल ऑफ डिस्कॉर्ड' बना हुआ था, जब वहां रूस ने मिसाइलें तैनात कर दी थीं। आज का दौर बिल्कुल अलग है, जहां क्यूबा को 3 महीने से अमेरिकी सेनाओं ने चारों तरफ से घेर रखा है।
दुनिया में इस घेराबंदी की चर्चा बहुत कम हो रही है, जबकि क्यूबा का 90% से अधिक तेल इंपोर्ट होता है। तेल की सप्लाई रुकने से वहां खाना बनाने तक का संकट उत्पन्न हो गया है और जनजीवन अस्त-व्यस्त है।
राजधानी Havana में कचरों के ढेर लग गए हैं क्योंकि कचरा उठाने वाले ट्रकों के लिए फ्यूल उपलब्ध नहीं है। बिजली का हाल यह है कि कभी इक्का-दुक्का घंटे बिजली आती है, तो लोग उसी में खाना बना लेते हैं।
वेनेजुएला का पतन और क्यूबा की तेल सप्लाई का अंत
वर्तमान में मिग्वेल डियाज़ कैनेल क्यूबा के राष्ट्रपति हैं, जो अमेरिका के साथ संबंध सुधारने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिका क्यूबा को अपने लिए एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण डेस्टिनेशन मानता आया है।
यह लोकेशन अमेरिका के लिए वैसी ही है जैसे भारत के लिए मालदीव हैहैंट्रंप का सपना रहा है कि वह यहां गोल्फ कोर्स बनाएं या फिर इसे पूरी तरह से न्यूट्रलाइज कर दें।
जनवरी 2026 तक के घटनाक्रमों को देखें तो ट्रंप ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो को जिस तरह से सत्ता से बाहर किया, उससे क्यूबा के हालात बिगड़ गए। क्यूबा का 35% तेल वेनेजुएला से और 44% तेल मेक्सिको से आता था।
जब तक मादुरो सत्ता में थे, वेनेजुएला और क्यूबा एक-दूसरे के मजबूत मित्र बने हुए थे। मादुरो ट्रंप से नहीं डरते थे, लेकिन अब जब वह नहीं रहे, तो क्यूबा पूरी तरह से आइसोलेट यानी अकेला पड़ गया है।
अमेरिकी जहाजों ने वेनेजुएला से आने वाले तेल को पूरी तरह रोक दिया है। इतना ही नहीं, दुनिया के अन्य देशों को भी धमकाया गया है कि अगर किसी ने क्यूबा को तेल भेजा, तो उन पर कड़े प्रतिबंध लगाए जाएंगे।
यही वजह है कि मेक्सिको, जो क्यूबा की तेल जरूरतों का 44% हिस्सा पूरा करता था, उसने भी हाथ पीछे खींच लिए हैं। ट्रंप का कहना है कि वह क्यूबा के साथ 'हाईएस्ट लेवल' पर डील करना चाहते हैं और उसे टेकओवर करने की तैयारी में हैं।
मार्को रूबियो और क्यूबा के खिलाफ अमेरिकी रणनीति
सवाल यह उठता है कि क्यूबा में मादुरो के सुरक्षा कवच के रूप में कौन तैनात था? असल में क्यूबन सैनिक ही मादुरो की निजी सुरक्षा में लगे हुए थे, जो अमेरिकी कार्रवाई के दौरान मारे गए।
29 जनवरी को ट्रंप ने एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर साइन किया कि कोई भी देश क्यूबा को ऑयल सप्लाई नहीं करेगा। इसके बाद वहां महंगाई आसमान छूने लगी और 15 फरवरी तक 'नो फ्यूल, नो टूरिस्ट, नो कैश' की स्थिति बन गई।
1 करोड़ की आबादी वाला यह देश अब पूरी तरह से Blackout में जीने को मजबूर है। फ्रिज में रखा खाना खराब हो रहा है और लोग सड़कों पर सरकार के विरोध में उतर आए हैं।
अमेरिका को क्यूबा के खिलाफ इस तरह की सख्त रणनीति की सलाह देने वालों में Marco Rubio का नाम सबसे ऊपर है। रूबियो के माता-पिता फिदेल कास्त्रो के समय क्यूबा छोड़कर अमेरिका आए थे।
मार्को रूबियो, जो वर्तमान में अमेरिका के विदेश मंत्री हैं, उनके मन में क्यूबा की वर्तमान व्यवस्था को लेकर गहरी नफरत है। वह चाहते हैं कि वहां सत्ता परिवर्तन हो और पुराने हिसाब चुकता किए जाएं।
ट्रंप ने स्पष्ट रूप से कहा है कि "I can do anything I want with Cuba." इसका मतलब है कि वह क्यूबा के साथ जो चाहें कर सकते हैं और रूबियो की रणनीति इसमें ईंधन का काम कर रही है।
क्या पुतिन और रूस क्यूबा के बचाव में आएंगे?
इस पूरे मामले में Vladimir Putin की भूमिका काफी संदिग्ध और दिलचस्प नजर आ रही है। रूस ही वह देश था जिसने क्यूबा को सुरक्षा का भरोसा दिया था, लेकिन संकट के समय वह कहां है?
ताजा खबरों के अनुसार, ट्रंप ने जब ईरान-इजराइल युद्ध के दौरान तेल प्रतिबंधों में थोड़ी ढील दी, तब रूस ने मौका देख लिया। रशियन एंबेसी के अनुसार, दो रूसी जहाज तेल लेकर क्यूबा की ओर रवाना हुए हैं।
अमेरिकी ब्लॉकेड के बावजूद अब रूसी तेल टैंकर क्यूबा पहुंच रहे हैं, क्योंकि अमेरिका ने अब रूस को अपनी मर्जी के हिसाब से चलने के लिए मजबूर सा कर दिया है।
ट्रंप पुतिन को अपनी शर्तों पर खेलने दे रहे हैं ताकि रूस पूरी तरह से ईरान के साथ खड़ा न हो जाए। रूस का तेल बिकना शुरू हुआ है और वह क्यूबा को तेल भेजकर अपनी साख बचाने की कोशिश कर रहा है।
दुनिया में एक बार फिर Imperialism यानी साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद तेजी से पैर पसारता दिख रहा है। एक तरफ अमेरिका है, तो दूसरी तरफ रूस और चीन अतिक्रमण के नाम पर छोटे देशों में घुस रहे हैं।
क्यूबा की यह स्थिति हमें सोचने पर मजबूर करती है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई स्थाई मित्र नहीं होता, सिर्फ हित होते हैं। क्यूबा जैसा देश, जो कभी स्वाभिमान का प्रतीक था, आज तेल की एक-एक बूंद के लिए तरस रहा है।
इस पूरी घटना और अमेरिका के आक्रामक रुख पर आपकी क्या राय है? क्या क्यूबा अपनी संप्रभुता बचा पाएगा या फिर वह अगला अमेरिकी उपनिवेश बन जाएगा?
क्यूबा की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है, बल्कि यह एक नए और खतरनाक अध्याय की शुरुआत है। आने वाले समय में वैश्विक समीकरण और भी जटिल होने वाले हैं, जिसका असर हम सभी पर पड़ेगा।