- 3500 मरीन कमांडो की एंट्री: खाड़ी में सबसे बड़ी सैन्य तैनाती
- खर्ग आइलैंड: ईरान का वो 'कोहिनूर' जो अमेरिका के निशाने पर है
- दुनिया भर में तेल का हाहाकार: उत्पादन में भारी गिरावट
ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच चल रहे भीषण संघर्ष को अब 30 दिन पूरे हो चुके हैं। युद्ध के एक महीने बीत जाने के बाद भी पश्चिम एशिया में शांति के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं, बल्कि तनाव अब अपने चरम पर पहुंच गया है।
अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान को सैन्य और आर्थिक रूप से पंगु बनाने के लिए जो चक्रव्यूह रचा था, वह अब निर्णायक मोड़ पर खड़ा है।
युद्ध के इस शुरुआती एक महीने में अमेरिका का मुख्य उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना और उसकी क्षेत्रीय शक्ति को कम करना रहा है। डोनल्ड ट्रंप प्रशासन का दावा है कि वे यह युद्ध जीत रहे हैं।
लेकिन ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराक्षी का तर्क कुछ और ही है। ईरान का कहना है कि जब दुश्मन सरेंडर के बजाय नेगोशिएशन यानी बातचीत की मेज पर आने की गुहार लगाए, तो इसे अमेरिका की जीत नहीं बल्कि ईरान की बढ़त माना जाना चाहिए।
इस बीच, युद्ध के मैदान से जो तस्वीरें और खबरें आ रही हैं, वे बेहद डरावनी हैं। ईरान लगातार इज़राइल पर क्लस्टर बम गिरा रहा है। मिसाइलों पर "धन्यवाद भारत" जैसे संदेश लिखकर इज़राइल के ठिकानों को निशाना बनाया जा रहा है।
पश्चिम एशिया में बने अमेरिकी ठिकानों पर भी हमले तेज कर दिए गए हैं, जिसके कारण दुनिया अब एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध के मुहाने पर खड़ी है।
3500 मरीन कमांडो की एंट्री: खाड़ी में सबसे बड़ी सैन्य तैनाती
हाल ही में अमेरिका ने एक ऐसा कदम उठाया है जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। अमेरिका का विशालकाय युद्धपोत USS Tripoli करीब 3500 मरीन कमांडो को लेकर कतर, दोहा, सेंट्रल कमांड (CENTCOM) मुख्यालय पहुंच चुका है। यह अमेरिका की सेंट्रल कमांड है जो इस पूरे क्षेत्र की सैन्य गतिविधियों को नियंत्रित करती है।
वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम एशिया के विभिन्न देशों में पहले से ही 500 से अधिक अमेरिकी विशेष सैनिक तैनात हैं। अब 3500 अतिरिक्त मरीन कमांडो के आने से यह संख्या 4000 के पार पहुंच गई है।
मरीन कमांडो की विशेषता समुद्र और तटीय क्षेत्रों में विशेष ऑपरेशन करने की होती है, जिससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिका अब हवाई हमलों के बजाय जमीनी और समुद्री कार्रवाई की योजना बना रहा है।
जैसे ही अमेरिकी सैनिकों के पहुंचने की खबर लीक हुई, ईरान के प्रमुख सरकारी अखबार 'तेहरान टाइम्स' ने एक खौफनाक हेडलाइन प्रकाशित की: "Welcome to Hell" (नर्क में आपका स्वागत है)। ईरान ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि किसी भी अमेरिकी सैनिक ने ईरान की मुख्य भूमि पर कदम रखा, तो वे केवल ताबूत में बंद होकर ही वापस जाएंगे।
खर्ग आइलैंड: ईरान का वो 'कोहिनूर' जो अमेरिका के निशाने पर है
सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और इजराइल अब ईरान की आर्थिक कमर तोड़ने के लिए उसके सबसे महत्वपूर्ण ठिकाने खर्ग आइलैंड (Kharg Island) को निशाना बना सकते हैं।
खर्ग आइलैंड ईरान के लिए किसी ताज के कोहिनूर जैसा है। यह वह जगह है जहां से ईरान अपने कुल तेल निर्यात का लगभग 90% हिस्सा दुनिया को भेजता है।
ईरान की मुख्य भूमि से लगभग 25 किलोमीटर दूर स्थित यह द्वीप एक विशाल तेल डिपो है। यहां रिफाइंड और कच्चे तेल को स्टोर करने के लिए विशाल टैंकर्स बने हुए हैं।
आंकड़ों की बात करें तो इस अकेले आइलैंड पर 3 करोड़ बैरल तेल का स्टोरेज मौजूद है। भारत के कुल रणनीतिक तेल रिजर्व से यह करीब छह गुना बड़ा भंडार है।
ईरान ने इस द्वीप को मुख्य भूमि से दूर इसलिए बनाया था ताकि यदि कभी कोई हमला या बड़ी दुर्घटना हो, तो मुख्य भूमि सुरक्षित रहे।
लेकिन आज यही इसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है। यदि अमेरिका इस द्वीप पर कब्जा कर लेता है या इसे तबाह कर देता है, तो ईरान वैश्विक तेल बाजार से पूरी तरह कट जाएगा और उसकी अर्थव्यवस्था रातों-रात ढह जाएगी।
दुनिया भर में तेल का हाहाकार: उत्पादन में भारी गिरावट
इस युद्ध का असर केवल ईरान और इज़राइल तक सीमित नहीं है। खाड़ी के अन्य देशों का तेल उत्पादन भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है। आंकड़ों के अनुसार, इस क्षेत्र के देशों का लगभग 70% तेल उत्पादन ठप हो चुका है। सऊदी अरब, जिसका उत्पादन 1 करोड़ बैरल प्रतिदिन था, अब घटकर 80 लाख बैरल रह गया है।
इराक की स्थिति और भी खराब है। वहां का उत्पादन 43 लाख बैरल से गिरकर मात्र 13 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया है। कतर ने अपनी LNG सप्लाई में 17% की कटौती कर दी है।
कुवैत और यूएई भी अपनी सप्लाई को सुरक्षित रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इस अनिश्चितता के कारण जहाजों के इंश्योरेंस प्रीमियम में 400% तक की बढ़ोतरी हुई है।
ईरान इस स्थिति का फायदा उठाकर अब हफ्ता वसूली जैसे हथकंडे अपना रहा है। वह खाड़ी से गुजरने वाले प्रत्येक जहाज से 15 करोड़ रुपये तक का टोल वसूल रहा है।
इसी बढ़ते आर्थिक दबाव के कारण खाड़ी देश अब अमेरिका पर दबाव बना रहे हैं कि वे ईरान के तेल निर्यात को पूरी तरह बंद करें ताकि क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा में संतुलन बना रहे।
ट्रंप की 'टाइम बाय' नीति और व्हाइट हाउस के रहस्यमयी ट्वीट
डोनल्ड ट्रंप की रणनीति अक्सर युद्ध विराम के नाम पर समय खरीदने की रही है। उन्होंने पहले 5 दिन और अब इसे बढ़ाकर 10 दिन का युद्ध विराम घोषित किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह शांति के लिए नहीं, बल्कि USS Tripoli और अन्य युद्धपोतों को सही पोजीशन पर तैनात करने के लिए लिया गया समय है। 27 मार्च को अमेरिकी सैनिकों के पहुंचने और 6 अप्रैल तक युद्ध स्थगित रहने का सीधा मतलब है कि इसके बाद कोई बहुत बड़ा हमला होने वाला है।
व्हाइट हाउस के सोशल मीडिया हैंडल से हाल ही में कुछ बेहद अजीब और रहस्यमयी पोस्ट किए गए हैं। 26 मार्च को एक ब्लर स्क्रीन और बीप की आवाज वाला वीडियो डाला गया, जिसे बाद में डिलीट कर दिया गया।
इसके बाद ईरान के झुकते हुए झंडे और "Something is happening" (कुछ हो रहा है) जैसे संदेशों ने दुनिया भर के खुफिया तंत्रों को अलर्ट पर डाल दिया है।
ईरान भी हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठा है। उसने खर्ग आइलैंड के चारों ओर बारूदी सुरंगें (Landmines) बिछा दी हैं और 'मैनपैड्स' जैसे कंधे पर रखकर चलाए जाने वाले मिसाइल सिस्टम तैनात कर दिए हैं।
ईरान के राष्ट्रपति पजेशकियन ने चेतावनी दी है कि यदि खर्ग आइलैंड पर हमला हुआ, तो वे इसका बदला दुबई, अबू धाबी, दोहा और यहां तक कि मक्का जैसे शहरों पर हमला करके ले सकते हैं।
यमन की एंट्री और रेड सी का नया खतरा
युद्ध के इस नाजुक मोड़ पर ईरान समर्थित हुती विद्रोहियों ने भी यमन से मोर्चा खोल दिया है। उन्हें आदेश दिया गया है कि वे इज़राइल की ओर जाने वाले हर जहाज को निशाना बनाएं।
रेड सी और बाबा अल-मंडेब जलडमरूमध्य अब युद्ध के नए केंद्र बन गए हैं। यदि अमेरिका खर्ग आइलैंड पर कब्जा करता है, तो हुती विद्रोही वैश्विक व्यापार मार्ग को पूरी तरह बंद कर सकते हैं।
आने वाले दिन पश्चिम एशिया और पूरी दुनिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। यदि नेगोशिएशन सफल नहीं हुआ, तो 10 दिन का यह तथाकथित 'युद्ध विराम' एक ऐसी तबाही की शुरुआत होगा जिसे आधुनिक इतिहास ने पहले कभी नहीं देखा। तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं और वैश्विक सप्लाई चेन पूरी तरह ध्वस्त हो सकती है।
फिलहाल, USS Tripoli के 3500 कमांडो और ईरान की 'ताबूत' वाली धमकी ने माहौल को पूरी तरह विस्फोटक बना दिया है। अमेरिका की अगली चाल और ईरान का संभावित पलटवार तय करेगा कि दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की ओर बढ़ेगी या कोई कूटनीतिक रास्ता निकलेगा।