- इंटरनेट की फिजिकल हकीकत: समुद्र के नीचे बिछा जाल
- कैसे काम करता है इंटरनेट: माचिस की डिब्बी से फाइबर केबल तक
- इतिहास और विज्ञान: चांद की यात्रा से शुरू हुआ सफर
दुनिया भर में जारी युद्ध और तनाव के बीच तमाम प्रकार की बातें इन दिनों चल रही हैं। हमने पहले तेल के संकट को देखा और फिर एलपीजी के संकट पर चर्चा की। हाल ही में फर्टिलाइजर संकट के बारे में भी बात हुई कि कैसे दुनिया के अंदर फर्टिलाइजर संकट आएगा, तो उसकी वजह से खाद्यान्न यानी भोजन का बड़ा संकट पैदा हो जाएगा।
लेकिन इसी बीच एक बहुत ही गंभीर और तगड़ा मैसेज चर्चाओं में है, जो कहीं ना कहीं सत्य के बहुत नजदीक नजर आता है। इस पूरे वैश्विक बवाल में हम जिस चीज को भूल गए हैं, वो यह है कि स्टेट ऑफ हॉर्मोज (Strait of Hormuz) से सिर्फ तेल ही नहीं निकलता, बल्कि वहां से एक और बहुत जरूरी चीज गुजरती है और वो है इंटरनेट।
अब सवाल यह उठता है कि अगर इंटरनेट स्टेट ऑफ हॉर्मोज से निकलता है, तो क्या इसे वाकई में काटा जा सकता है? अक्सर लोग केबल कटने की बात तो सुनते हैं, लेकिन इंटरनेट कटने का विचार थोड़ा अजीब लग सकता है। आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर इंटरनेट चलता कैसे है और स्टेट ऑफ हॉर्मोज से यह कैसे कंट्रोल होता है।
इंटरनेट की फिजिकल हकीकत: समुद्र के नीचे बिछा जाल
इंटरनेट के बारे में आम धारणा यह है कि यह हवा में चलता है, लेकिन इसकी असलियत समुद्र की गहराई में छिपी है। अगर ईरान यह तय कर ले कि उसे यहां से इंटरनेट काटना है, तो इसके वैश्विक स्तर पर क्या भयानक असर होंगे, इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है।
आज दुनिया में जो भी अपडेट्स मिल रहे हैं या जो डेटा ट्रांसफर हो रहा है, उसके पीछे इंटरनेट ही मुख्य कारण है। ईरान द्वारा रेड सी केबल्स (Red Sea cables) को लेकर दी जा रही धमकियां अब सुर्खियां बन रही हैं। ऐसी खबरें तैर रही हैं कि ईरान का अगला कदम हॉर्मुज को ग्लोबल इंटरनेट से डिसरप्ट करना हो सकता है।
इंटरनेट समुद्र की गहराई से होकर निकलता है। क्या इसमें स्टेट ऑफ हॉर्मोज भी शामिल है? क्या दुनिया भर के समुद्रों में केबल बिछी हुई है? इन सवालों के जवाब इंटरनेट की कार्यप्रणाली को समझने में छिपे हैं।
इंटरनेट की कनेक्टिविटी अगर बाधित हो जाए, तो अमेरिका की बड़ी-बड़ी कंपनियों के स्टॉक्स रातों-रात गिर सकते हैं। सोशल मीडिया पर चल रही खबरें संकेत दे रही हैं कि यदि ईरान सब कुछ बर्बाद करने पर उतारू हुआ, तो तेल और फर्टिलाइजर से ज्यादा त्वरित और गहरा असर इंटरनेट बंद करने से होगा।
कैसे काम करता है इंटरनेट: माचिस की डिब्बी से फाइबर केबल तक
इंटरनेट कैसे चलता है, इसे एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है। बचपन में कई लोगों ने माचिस की दो डिब्बियों को धागे से बांधकर बात करने वाला खेल खेला होगा। एक व्यक्ति डिब्बी में कुछ बोलता है और दूसरा धागे के माध्यम से दूर तक उसे सुन लेता है। यह डेटा ट्रांसफर का सबसे बुनियादी तरीका है।
इसी तरह, यदि एक लैपटॉप को HDMI केबल से डिजिटल बोर्ड या दूसरे कंप्यूटर से जोड़ दिया जाए, तो डेटा एक जगह से दूसरी जगह जाने लगता है। इंटरनेट भी मूल रूप से यही है—दुनिया भर के सारे कंप्यूटरों को किसी न किसी प्रकार के तार या माध्यम से जोड़ देना।
भले ही हम वायरलेस फिडेलिटी यानी Wi-Fi या मोबाइल नेटवर्क का इस्तेमाल करते हों, लेकिन एक देश से दूसरे देश तक डेटा पहुंचाने के लिए समुद्र के नीचे विशाल तार डाले जाते हैं। जब बीच में महासागर आ जाता है, तो वहां न ब्लूटूथ काम करता है और न ही सामान्य वायरलेस तकनीक। वहां सिर्फ समुद्र के नीचे बिछी केबल्स ही काम आती हैं।
इतिहास और विज्ञान: चांद की यात्रा से शुरू हुआ सफर
इंटरनेट का विचार सबसे पहले अमेरिका के वैज्ञानिकों को तब आया जब उन्होंने 1969 के दौरान चांद पर इंसान को उतारा था। उस समय MIT (Massachusetts Institute of Technology) के वैज्ञानिकों ने चार कंप्यूटरों को आपस में जोड़कर डेटा ट्रांसफर किया था। यहीं से वैश्विक नेटवर्क का आइडिया जन्म लिया।
अमेरिकी सेना के लिए ARPANET (Advanced Research Projects Agency Network) पर काम शुरू हुआ। वैज्ञानिकों ने सोचा कि यदि डेटा को बिजली की जगह प्रकाश (Light) की गति से भेजा जाए, तो यह सबसे तेज होगा। इसी विचार ने Internet Protocol Suite और HTML के विकास का मार्ग प्रशस्त किया।
डेटा ट्रांसफर को तेज करने के लिए ऑप्टिकल फाइबर केबल (Optical Fiber Cable) का उपयोग किया जाता है। यह केबल अंदर से एक कांच के पाइप जैसी होती है। इसमें डेटा Total Internal Reflection (पूर्ण आंतरिक परावर्तन) के सिद्धांत पर चलता है। जिस तरह कांच से रोशनी टकराकर परावर्तित होती है, वैसे ही डेटा प्रकाश की लहरों के रूप में इस पाइप से होकर गुजरता है।
समुद्र के नीचे केबल की सुरक्षा: कई परतों वाला कवच
अब सवाल उठता है कि पानी के नीचे ये तार पिघलते या खराब क्यों नहीं होते? दरअसल, इन केबल्स को मल्टी-लेवल सुरक्षा दी जाती है। सबसे पहले इनके चारों तरफ Polyethylene की परत होती है, फिर Nylon के धागे और Mylar Tape लगाई जाती है जो एल्युमीनियम वाटर बैरियर का काम करती है।
इसके बाद मजबूती के लिए Steel Wires, फिर कॉपर शीट और अंदर पेट्रोलियम जेली भरी जाती है ताकि पानी का असर न हो। इस पूरी सुरक्षा के केंद्र में वह ऑप्टिकल फाइबर केबल होती है जिससे सूचनाएं गुजरती हैं। दुनिया भर में ऐसी लगभग 450 से ज्यादा केबल्स बिछी हुई हैं, जिनकी कुल लंबाई लगभग 13 लाख किलोमीटर है।
इन केबल्स को बिछाने और मेंटेन करने में Google, Microsoft और Amazon जैसी दिग्गज कंपनियों का सबसे बड़ा हाथ है, क्योंकि सबसे ज्यादा डेटा इन्हीं को इधर से उधर पहुंचाना होता है। ये केबल्स समुद्र के तटवर्ती इलाकों जैसे मुंबई, केरल, गुजरात या तिरुवनंतपुरम के डेटा सेंटर्स और सर्वर रूम्स से जुड़ती हैं।
हॉर्मुज की खाड़ी और इंटरनेट का खतरा
डेटा के निर्बाध प्रवाह के लिए हर 50 किलोमीटर पर बूस्टर्स लगाए जाते हैं और विशेष जहाज लगातार इनकी निगरानी करते हैं। लेकिन युद्ध जैसी स्थिति में यह सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है। Strait of Hormuz की सबसे बड़ी चिंता यह है कि यहां समुद्र की गहराई बहुत कम है—मात्र 200 फीट।
इतनी कम गहराई पर कोई भी गोताखोर आसानी से पहुंच सकता है। स्टेट ऑफ हॉर्मोज में निगरानी के लिए अन्य क्षेत्रों की तरह पर्याप्त जहाज भी नहीं हैं। यदि यहां कोई डिसरप्शन आता है, तो पूरी दुनिया का इंटरनेट और व्यापार बुरी तरह प्रभावित हो सकता है।
ऐतिहासिक डेटा बताते हैं कि सितंबर 2025 (प्रक्षेपित संकट) और पूर्व की घटनाओं में इंटरनेट बाधित होने से बड़े नुकसान हुए हैं। एक बार रेड सी में केबल कटने से दुनिया का 17% इंटरनेट प्रभावित हुआ था। तब इसका आरोप यमन के हूतियों पर लगा था। ताइवान के पास भी ऐसी ही घटनाएं हो चुकी हैं, जिनसे डेटा सप्लाई चेन में भारी व्यवधान आया।
हॉर्मुज से होकर लगभग 20 प्रमुख समुद्री केबल्स गुजरती हैं। अगर खाड़ी देशों और भारत या पश्चिमी देशों के बीच का डेटा कनेक्शन कट गया, तो तेल, गैस और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की कोई भी खबर समय पर नहीं मिल पाएगी। यह सूचना का ब्लैकआउट युद्ध से भी ज्यादा भयानक साबित हो सकता है।
निष्कर्ष: सूचनाओं के युद्ध में नई चुनौती
इंटरनेट के इन तारों को बिछाने से पहले समुद्र की मैपिंग की जाती है—ज्वालामुखी, गड्ढे और समुद्री पहाड़ों का ध्यान रखा जाता है। लेकिन मानवीय हस्तक्षेप और युद्ध की धमकियां इन वैज्ञानिक सावधानियों पर भारी पड़ सकती हैं। हालांकि अभी तक ईरान का कोई आधिकारिक बयान इस बारे में नहीं आया है कि वह केबल काट देगा, लेकिन रणनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज है।
आज के दौर में एक सिंगल खबर से बाजार ऊपर-नीचे हो जाता है। चाहे वो सीजफायर की घोषणा हो या युद्ध की धमकी, यह सब आप तक इंटरनेट के माध्यम से ही पहुंचता है। यदि यह माध्यम ही टूट गया, तो दुनिया एक ऐसे अंधेरे युग में जा सकती है जहां सूचनाओं का अभाव सबसे बड़ा संकट बन जाएगा।
फिलहाल दुनिया यही उम्मीद कर रही है कि युद्ध और तनाव कम हों और वैश्विक संचार के ये रास्ते सुरक्षित रहें। इंटरनेट की यह फिजिकल कमजोरी हमें याद दिलाती है कि हमारी डिजिटल दुनिया कितनी नाजुक है और समुद्र की गहराई में बिछे इन तारों पर हमारी निर्भरता कितनी अधिक है।