Global Fertilizer Crisis: Will Your Food Cost More? (फर्टिलाइजर संकट: क्या महंगा होगा आपका भोजन?)

रूस का फर्टिलाइजर बैन और इजराइल-ईरान युद्ध: भारत में खाद का महासंकट?
Story at a Glance:
  • रूस का बड़ा फैसला: नाइट्रोजन फर्टिलाइजर के निर्यात पर लगा प्रतिबंध
  • खाद्य संकट और कृषि पर निर्भरता: भारत की चुनौती
  • गैस से खाद तक का सफर: क्यों जरूरी है Natural Gas?

दुनिया इस समय एक बेहद गंभीर और चिंताजनक दौर से गुजर रही है। जब दुनिया के किसी भी कोने में युद्ध की स्थिति पैदा होती है, तो उसका सीधा असर केवल हथियारों या सरहदों तक सीमित नहीं रहता। विशेष रूप से भारत जैसे 140 करोड़ की आबादी वाले देश के लिए यह चुनौतियां और भी बड़ी हो जाती हैं क्योंकि ऐसी वैश्विक उथल-पुथल हमें अलग-अलग स्तरों पर प्रभावित करती है।

वर्तमान में Iran और Israel के बीच चल रहा संघर्ष केवल दो देशों की लड़ाई नहीं रह गया है। आमतौर पर हम युद्ध की खबरों को तेल की कीमतों और LPG के दामों से जोड़कर देखते हैं। हमें लगता है कि Strait of Hormuz पर रुकने से सिर्फ पेट्रोल और डीजल महंगे होंगे, लेकिन एक तीसरी सबसे बड़ी चीज है जो पूरी दुनिया की खाद्य सुरक्षा को हिलाने वाली है, और वह है Fertilizer यानी उर्वरक।

आज हम दुनिया में उत्पन्न हो रहे फर्टिलाइजर शॉर्टेज (Fertilizer Shortage) के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे। उर्वरक वह व्यवस्था है जो हमारे खाद्यान्न के उत्पादन को बढ़ाती है। अगर उर्वरक का संकट आता है, तो खाद्यान्न का उत्पादन प्रभावित होगा और जब भोजन का उत्पादन घटेगा, तो इसका सीधा मतलब है कि एक बड़ा वैश्विक खाद्य संकट हमारे दरवाजे पर दस्तक दे रहा है।

रूस का बड़ा फैसला: नाइट्रोजन फर्टिलाइजर के निर्यात पर लगा प्रतिबंध

जब दुनिया पहले से ही तनाव में हो, तब कोई देश ऐसा फैसला ले ले जिससे उसकी नेगोशिएटिंग पावर बढ़ जाए, तो वह खबर पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बन जाती है। Russia ने हाल ही में एक महीने के लिए अपने यहां से Nitrogen Fertilizers के एक्सपोर्ट पर बैन लगा दिया है। अब सवाल यह उठता है कि रूस के इस बैन का मिडिल ईस्ट के तनाव से क्या संबंध है?

हमें फर्टिलाइज़र के लिए दूसरे देशों पर निर्भर क्यों रहना पड़ता है, यह एक बुनियादी सवाल है। असल में फर्टिलाइज़र का उत्पादन सीधे तौर पर Crude Oil और Natural Gas पर निर्भर करता है। जब तक आप गैस और तेल के खेल को नहीं समझेंगे, तब तक आप यह नहीं समझ पाएंगे कि क्यों Strait of Hormuz को दुनिया के 33% फर्टिलाइजर की सप्लाई का केंद्र माना जाता है।

💡 "अगर खेतों को समय पर खाद नहीं मिली, तो 300 रुपये की यूरिया की बोरी 3000 रुपये तक पहुँच सकती है—यह एक वैश्विक खाद्य आपातकाल की आहट है।"

दुनिया का भले ही 20% तेल स्ट्रेट ऑफ हॉर्मोज से आता हो, लेकिन अगर 33% ग्लोबल फर्टिलाइजर सप्लाई यहां से बाधित होती है, तो स्थिति भयावह हो जाती है। रूस, जो दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा विकल्प था, उसने खुद ही बैन लगा दिया है। यह स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि अब Kharif के मौसम की बुवाई का समय आ गया है।

खाद्य संकट और कृषि पर निर्भरता: भारत की चुनौती

खाद्य संकट और कृषि पर निर्भरता: भारत की चुनौतीभारत समेत दुनिया के कई देशों में खरीफ की फसलों की बुवाई लगभग इसी समय शुरू होती है। उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) के अधिकांश देशों में फसलों की बुवाई का समय एक जैसा होता है और इसी समय पौधों को सबसे ज्यादा Nitrogen Fertilizer की जरूरत होती है। रूस का बैन और हॉर्मोज जलडमरूमध्य का तनाव, दोनों मिलकर इस संकट को दोगुना कर रहे हैं।

भारत की बात करें तो हमारी GDP का लगभग 16% हिस्सा सीधे कृषि से आता है। इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि भारत की लगभग 46% आबादी अपनी आजीविका के लिए सीधे तौर पर कृषि पर निर्भर है। ऐसे में यदि उर्वरक नहीं मिलता, तो फसलें पैदा नहीं होंगी और करोड़ों लोगों के सामने भोजन और आजीविका का संकट खड़ा हो जाएगा।

कृषि में उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रमुख रूप से तीन घटकों का उपयोग किया जाता है: Nitrogen (N), Phosphorus (P) और Potassium (K)। इन तत्वों को सीधे तौर पर पौधों को नहीं दिया जा सकता, इसलिए इन्हें यौगिक (Compound) के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। जैसे नाइट्रोजन की पूर्ति के लिए Urea, अमोनियम नाइट्रेट या अमोनियम सल्फेट की जरूरत पड़ती है।

गैस से खाद तक का सफर: क्यों जरूरी है Natural Gas?

यूरिया बनाने की प्रक्रिया को समझना बहुत जरूरी है। यूरिया में लगभग 46% नाइट्रोजन होता है। इसे बनाने के लिए कार्बन डाइऑक्साइड के साथ अमोनिया मिलाया जाता है। अमोनिया बनाने के लिए हाइड्रोजन और नाइट्रोजन गैस का इस्तेमाल होता है। अब असली पेच यहीं फंसता है—इस हाइड्रोजन को बनाने के लिए CH4 (Methane) यानी Natural Gas की आवश्यकता पड़ती है।

अगर दुनिया में नेचुरल गैस की सप्लाई बाधित होती है, तो हाइड्रोजन नहीं मिलेगा। हाइड्रोजन नहीं होगा तो अमोनिया नहीं बनेगा, और अमोनिया के बिना यूरिया का उत्पादन असंभव है। दुनिया की सबसे ज्यादा नेचुरल गैस Qatar के पास है। वैश्विक गैस सप्लाई में कतर की 20% हिस्सेदारी है और कतर के पास ही ईरान द्वारा हालिया तनाव के चलते स्थिति खराब हुई है।

यही कारण है कि कतर नाइट्रोजन आधारित फर्टिलाइजर्स का भी एक बहुत बड़ा केंद्र है। जब हॉर्मोज का रास्ता प्रभावित होता है, तो वहां से निकलने वाली नेचुरल गैस और तैयार फर्टिलाइजर, दोनों की सप्लाई रुक जाती है। इसीलिए कतर को दुनिया के टॉप पर कैपिटा इनकम वाले देशों में गिना जाता है, क्योंकि उसके पास गैस और खाद का खजाना है।

💡 "यूक्रेन के ड्रोन हमले ने रूस के उस प्लांट को तबाह कर दिया जो दुनिया का 11% अमोनियम नाइट्रेट पैदा करता था, अब मई तक सप्लाई ठप है।"

चीन और रूस के कड़े कदम: दुनिया में मची हलचल

चीन और रूस के कड़े कदम: दुनिया में मची हलचलवैश्विक बाजार में केवल रूस ही नहीं, बल्कि China ने भी कड़ा रुख अपनाया है। 19 मार्च की रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने अपने फर्टिलाइजर एक्सपोर्ट पर रोक लगा दी है। वहीं 24 मार्च को रूस ने भी निर्यात रोकने का फैसला सुना दिया। एक तरफ मिडिल ईस्ट का रास्ता बंद है और दूसरी तरफ दुनिया के दो सबसे बड़े सप्लायर निर्यात रोक कर बैठ गए हैं।

इसके ऊपर यूक्रेन ने एक और बड़ी चोट की है। रूस के उस फर्टिलाइज़र प्लांट पर यूक्रेन ने ड्रोन हमला किया है जो दुनिया का लगभग 11% Ammonium Nitrate पैदा करता था। इस हमले के कारण वह फैक्ट्री अब मई तक चालू नहीं हो पाएगी। यानी इस सीजन में रूस चाहकर भी अमोनियम नाइट्रेट की सप्लाई नहीं कर पाएगा।

फास्फोरस खाद की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है। DAP (Di-Ammonium Phosphate) में भी अमोनिया का इस्तेमाल होता है, जिसके लिए फिर से हाइड्रोजन और नेचुरल गैस की जरूरत पड़ती है। भारत फास्फोरस आधारित खाद का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता और तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, लेकिन फिर भी हम अपनी जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर हैं।

भारत की स्थिति: क्या हम आत्मनिर्भर हैं?

दुनिया में सबसे ज्यादा यूरिया बनाने के मामले में चीन पहले नंबर पर है और भारत दूसरे नंबर पर आता है। लेकिन समस्या यह है कि हम यूरिया के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में भी दूसरे नंबर पर हैं। चीन जितना पैदा करता है, उसका अधिकांश हिस्सा खुद ही इस्तेमाल कर लेता है और थोड़ा बहुत निर्यात करता है। लेकिन भारत को अपनी 140 करोड़ की आबादी का पेट भरने के लिए हर साल 8 से 10 मेट्रिक टन यूरिया आयात करना पड़ता है।

यूरिया निर्यात करने वाले देशों में रूस सबसे ऊपर है, उसके बाद सऊदी अरब, मिस्र और कतर का नंबर आता है। अब आप स्थिति को समझ सकते हैं—रूस ने बैन लगा दिया है, सऊदी अरब और कतर का रास्ता (हॉर्मोज) बाधित है। ऐसे में सप्लाई चेन पूरी तरह चरमरा गई है। भारत ने बीते 10 सालों में पांच बड़े यूरिया प्लांट लगाए हैं, लेकिन मांग इतनी अधिक है कि पूरी तरह आत्मनिर्भर होना अभी भी एक चुनौती है।

💡 "भारत अपनी यूरिया की जरूरतों के लिए दुनिया पर निर्भर है, और जब बड़े सप्लायर हाथ खींच लें, तो संकट गहराना तय है।"

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2023-24 में भारत का कुल फर्टिलाइजर उत्पादन 503 लाख मेट्रिक टन रहा, जो एक रिकॉर्ड है। लेकिन हमारा उपभोग (Consumption) 655 मेट्रिक टन तक पहुंच गया है। इस कमी को पूरा करने के लिए हमें आयात का सहारा लेना ही पड़ता है। भारत यूरिया में 87% आत्मनिर्भर है, लेकिन डीएपी (DAP) में यह आत्मनिर्भरता सिर्फ 40% है और पोटाश के लिए हम 100% आयात पर निर्भर हैं।

किसानों के लिए राहत की खबर: पैनिक करने की जरूरत नहीं

इन तमाम वैश्विक संकटों के बीच भारत के किसानों के लिए एक राहत भरी खबर भी है। भारत सरकार और कृषि मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि खरीफ सीजन के लिए देश के पास पर्याप्त स्टॉक मौजूद है। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में सरकार ने पहले ही वैश्विक टेंडर्स के माध्यम से 86 लाख टन उर्वरकों की आपूर्ति सुनिश्चित कर ली है।

किसानों के लिए राहत की खबर: पैनिक करने की जरूरत नहींसरकार ने वेल इन एडवांस (Well in Advance) रणनीतिक कदम उठाते हुए मार्च में ही काफी स्टॉक इकट्ठा कर लिया था। कृषि मंत्री ने आश्वासन दिया है कि किसानों को चिंता करने की जरूरत नहीं है और फर्टिलाइजर की कोई कमी नहीं होने दी जाएगी। इसका मतलब है कि फिलहाल देश के अंदर पैनिक (Panic) क्रिएट करने जैसी कोई स्थिति नहीं है।

हालांकि, यह भी सच है कि अगर लंबे समय तक एलएनजी (LNG) की सप्लाई बाधित रही और वैश्विक रास्ते नहीं खुले, तो दूरगामी परिणाम गंभीर हो सकते हैं। इसलिए आवश्यक है कि किसान भाई उर्वरकों का संतुलित उपयोग करें। Soil Health Card के माध्यम से मृदा परीक्षण करवाएं और जमीन की वास्तविक जरूरत के हिसाब से ही खाद का इस्तेमाल करें।

निष्कर्ष: सावधानी और जागरूकता ही समाधान

वैश्विक परिस्थितियां बदल रही हैं और खाद का यह संकट हमें यह चेतावनी दे रहा है कि खाद्य सुरक्षा कितनी नाजुक हो सकती है। फिलहाल भारत सुरक्षित स्थिति में है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों और युद्ध के हालातों पर नजर रखना आवश्यक है। पैनिक में आकर खाद की कालाबाजारी या जमाखोरी न करें, क्योंकि सरकार ने इसे Essential Commodities Act के दायरे में रखा है और ऐसा करने वालों पर सख्त कार्रवाई हो सकती है।

हमें अपनी कृषि पद्धतियों में सुधार करने और आत्मनिर्भरता की ओर और तेजी से बढ़ने की जरूरत है। वैश्विक तनाव के इस दौर में हमें एक देश के रूप में एकजुट रहकर इन चुनौतियों का सामना करना होगा। उम्मीद है कि जल्द ही अंतरराष्ट्रीय हालात सामान्य होंगे और सप्लाई चैन फिर से सुचारू रूप से काम करने लगेगी।

Rajesh Kashyap

Digital & Tech enthusiast। पिछले कई सालों से Geopolitics, Indian Finance और EV sector को closely follow कर रहा हूँ। Behind The Fold (behindthefold.in) का Founder — जहाँ हम headlines के पीछे की असली कहानी लाते हैं।

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