- निवेशक की दोहरी सोच: सपोर्ट और रेजिस्टेंस
- सीजफायर की घोषणा और बाजार में हलचल
- FOMO: फियर ऑफ मिसिंग आउट का खेल
नमस्कार साथियों। आज हम बाजार की एक ऐसी स्थिति पर बात कर रहे हैं जिसने सबको हैरान कर दिया है। हाल ही में ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच चल रहे तनाव और युद्ध की वजह से बाजार में भारी गिरावट देखी गई। हालात ऐसे बन गए थे कि ऐसा लग रहा था मानो बाजार क्रैश हो गया हो।
पिछले दिन बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) बुरी तरह टूटा हुआ था। सेंसेक्स के आंकड़े अपने 52-हफ्ते के निचले स्तर के बहुत करीब थे, जो कि 71425 था। निफ्टी 50 का हाल भी कुछ ऐसा ही था। खबरों के मुताबिक, 1837 अंकों की गिरावट के चलते बाजार से करीब 14 लाख करोड़ रुपये का सफाया हो गया। डॉलर के मुकाबले रुपया भी गिरकर 93.98 तक पहुंच गया था।
जब बाजार इतना गिर रहा था, तो कुछ ऐसे कीर्तिमान भी बन रहे थे जो हैरान करने वाले थे। खास तौर पर सोने की कीमतों में पिछले 40 सालों में एक हफ्ते के भीतर इतनी बड़ी गिरावट दर्ज की गई थी। यह एक दिलचस्प बात थी कि जहाँ रुपया, स्टॉक और क्रिप्टो सब गिर रहे थे, वहीं सोने की कीमत में भी बड़ी गिरावट आई।
आम तौर पर, जब स्टॉक बाजार में गिरावट आती है, तो लोग सोने को एक सुरक्षित निवेश (safe haven) मानकर उसमें पैसा लगाते हैं। लेकिन इस बार युद्ध के माहौल में सोने की कीमतों में गिरावट देखी गई, जिसने 40 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया।
सोने की कीमतें 4 महीने के निचले स्तर पर आ गईं। इस गिरावट ने निवेशकों के मन में दो बड़े सवाल खड़े कर दिए। पहला, क्या अब सोना खरीदना चाहिए? और दूसरा, निवेशक किस तरह से सोच रहे थे?
निवेशक की दोहरी सोच: सपोर्ट और रेजिस्टेंस
बाजार में जब इस तरह की खबरें आती हैं, तो निवेशक दो तरह से सोचते हैं। पारंपरिक निवेशक अक्सर तब निवेश करते हैं जब बाजार अपने सबसे निचले स्तर (सपोर्ट प्राइस) पर होता है। वे उस समय निकलने की तैयारी करते हैं जब कीमतें अपने उच्चतम स्तर (रेजिस्टेंस) पर पहुंच जाती हैं।
चांदी के साथ भी ऐसा ही हुआ। जब चांदी का भाव 4 लाख रुपये प्रति किलो के स्तर को छू गया, तो खरीदारों को लगा कि यह बहुत ऊपर चला गया है। ट्रेडिंग की भाषा में, जब कोई चीज रेजिस्टेंस को छू लेती है, तो माना जाता है कि अब उसमें गिरावट आ सकती है।
यह खबर कि सोना 4 महीने के निचले स्तर पर आ गया है, कुछ निवेशकों के लिए खरीद का मौका बन सकती थी।
कल (उस दिन की बात हो रही है) कुछ लोगों ने सोना खरीदने के बारे में सोचा होगा। अगर वे सपोर्ट पर एंट्री लेने की सोच रहे थे, तो उनके लिए यह खबर फायदेमंद हो सकती थी।
सीजफायर की घोषणा और बाजार में हलचल
यह सब तब हुआ जब डोनाल्ड ट्रंप ने सीजफायर (युद्धविराम) की घोषणा की। जिस समय सोने की कीमतों में गिरावट की खबरें चल रही थीं, उसी समय सीजफायर की घोषणा से सोने की कीमत फिर से बढ़ने लगी।
इसका मतलब है कि अगर आपने बाजार के सपोर्ट पर एंट्री ली होती, तो आपको लाभ होने की संभावना बढ़ जाती।
युद्ध के चलते सोने-चांदी की कीमतों में आई गिरावट की कुछ मुख्य बातें इस प्रकार थीं:
- 10 ग्राम सोने का भाव गिरकर 1.35 लाख रुपये तक आ गया था, जो एक हफ्ते में सबसे बड़ी गिरावट थी।
- 1 किलो चांदी के दाम गिरकर 2.01 लाख रुपये तक पहुंच गए थे (ट्रंप की घोषणा से पहले)।
- एक हफ्ते के दौरान सोने के मार्केट कैप में 18% की गिरावट आई, जिससे 7.3 ट्रिलियन का बाजार साफ हो गया।
- सोने की कीमतें जो कभी $5100 प्रति औंस तक पहुंच गई थीं, गिरकर $4200 प्रति औंस तक आ गईं।
यह सब खबरें लगातार आ रही थीं। 29 जनवरी को सोने-चांदी का भाव 3.85 लाख रुपये था, जो 23 मार्च को 2 लाख रह गया। 29 जनवरी को सोना 1.76 लाख रुपये था, जो 1.35 लाख रह गया।
जब अमेरिका को लगा कि यह समस्या उसके अपने बाजार को भी प्रभावित कर सकती है, तो उसने तुरंत कदम उठाया। जंगल की आग जब घर तक पहुंचने लगी, तो उन्होंने 5 दिन के सीजफायर का ऐलान कर दिया।
इस घोषणा का सीधा असर बाजार पर पड़ा। सिर्फ इस खबर के आते ही:
- Dow Jones फ्यूचर्स 769 अंक चढ़ गया।
- S&P 500 में 2.7% की तेजी दिखी।
- गिफ्ट निफ्टी (जो रात को भी चलता है) 3% उछलकर 687 अंक चढ़कर 23,150 पर पहुंच गया।
सोचिए, जिस बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में दोपहर तक 1836 अंकों की गिरावट थी, वही बाजार रात को गिफ्ट निफ्टी के माध्यम से वापसी करने लगा।
बाजार की इस रिकवरी का असर क्रिप्टो पर भी दिखा। बिटकॉइन, ईथीरियम और एस&पी 500 में अचानक तेजी आ गई। सोने-चांदी के भावों में भी फिर से तेजी लौटने लगी।
FOMO: फियर ऑफ मिसिंग आउट का खेल
जब बाजार में ऐसी तेजी आती है, तो लोगों के दिमाग में फिर वही सवाल दौड़ने लगता है कि क्या यह स्थिति पलटने वाली है? क्या हम कुछ खो देंगे?
ट्रेडिंग में सपोर्ट और रेजिस्टेंस का ज्ञान महत्वपूर्ण होता है। निवेशक हमेशा यह सोचता है कि उसका स्टॉप लॉस कहाँ होगा और टारगेट क्या होगा। जब कीमतें ऊपर जाने लगती हैं, तो लोगों के मन में यह ख्याल आता है कि क्या सोना या चांदी फिर से उस स्तर पर पहुंच जाएंगे जहाँ वे पहले थे?
इस खबर को सुनकर लोगों के चेहरे खिल उठे। हर कोई सोच रहा था कि बाजार उठ रहा है।
निवेशक दो तरह से सोचते हैं:
- पहला समूह: जो मानता है कि अगर बाजार गिरकर सपोर्ट पर आ गया है, तो यह खरीदने का सही समय है।
- दूसरा समूह: जोFOMO (Fear Of Missing Out - कुछ छूट जाने का डर) से प्रेरित होता है। जब बाजार उठता है, तो वे भागकर निवेश करते हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है कि कहीं सब पैसा कमा लें और वे पीछे रह जाएं।
यह दूसरा समूह असली ट्रेडर नहीं होता, बल्कि बाजार के आकर्षण और दूसरों को देखकर निवेश करने वाला होता है। उन्हें लगता है कि अगर उन्होंने सोना या चांदी तब नहीं खरीदा जब वे सस्ते थे, तो वे बाद में पछताएंगे।
तो, क्या निवेश करना चाहिए?
यह सवाल हमेशा बना रहता है कि क्या निवेश करना चाहिए या नहीं। इस सेशन में हम उन सभी विकल्पों पर बात करेंगे और बड़ी कंपनियों की सिफारिशों को देखेंगे, जो निवेश पर जानकारी देती हैं।
सोने की कीमतों ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है: जब यह इतना सुरक्षित था, तो यह गिरा क्यों? युद्ध के समय में सोने की कीमतों का बढ़ना इतिहास रहा है, तो इस बार यह क्यों गिरा?
युद्ध और सोने की कीमतें: इतिहास क्या कहता है?
हमेशा से यह माना जाता रहा है कि युद्ध के समय सोने और चांदी की कीमतें बढ़ती हैं। इसके पीछे कारण है कि लोग अपने पैसे को सुरक्षित जगह पर लगाना चाहते हैं, क्योंकि युद्ध से शेयर बाजार और अन्य निवेशों में गिरावट का खतरा रहता है।
इतिहास गवाह है: रूस-यूक्रेन युद्ध हो या खाड़ी युद्ध, हर बार सोने की कीमतों में 15% से 19% तक की बढ़ोतरी देखी गई है। लोग सेंट्रल बैंकों से लेकर आम निवेशक तक, सभी अपने पैसे को सुरक्षित करने के लिए सोने में निवेश करते हैं।
तो फिर इस बार ऐसा क्या हुआ कि युद्ध के समय सोना गिरा?
सोने की गिरावट के पीछे के कारण
इसके पीछे कई कारण हैं, जिन्हें समझना ज़रूरी है:
1. डॉलर का मजबूत होना (Dollar Surge)
सोने को भले ही हम रुपये में खरीदते हों, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसका कारोबार डॉलर में होता है। हाल के दिनों में डॉलर के भाव बहुत बढ़ गए थे (लगभग 93.98 रुपये प्रति डॉलर)।
इसका मतलब है कि अगर पहले 1 डॉलर से आप जितना सोना खरीद सकते थे, अब उतने ही पैसे में कम सोना मिलेगा, या फिर ज्यादा पैसे लगेंगे।
यहां एक दिलचस्प बात यह हुई कि लोगों ने सोने में निवेश करने की बजाय डॉलर में निवेश करना शुरू कर दिया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि डॉलर को युद्ध के समय सबसे स्थिर मुद्रा माना जा रहा था।
जब-जब युद्ध होते हैं, तो डॉलर की सुप्रीमेसी (प्रभुत्व) बढ़ जाती है। रुपया लगातार डॉलर के सामने गिर रहा था, जिसका मतलब था कि डॉलर की वैल्यू बढ़ रही थी। अगर आपने 25 दिन में $1 से ₹4 कमाए, तो यह सोने में निवेश से ज्यादा रिटर्न दे सकता था।
तेल की कीमतों में बढ़ोतरी ने भी डॉलर की मांग बढ़ाई, क्योंकि तेल का कारोबार भी डॉलर में होता है। जब तेल महंगा होता है, तो उसकी खरीद के लिए डॉलर की जरूरत पड़ती है, जिससे डॉलर और मजबूत होता है।
समझदार लोगों ने सोने को छोड़कर डॉलर में निवेश करना बेहतर समझा, क्योंकि उन्हें लगा कि डॉलर चढ़ता ही रहेगा।
2. ब्याज दरों का स्थिर रहना (Static Interest Rates)
दुनिया भर की बैंकों ने अपनी रिजर्व रेट्स (जैसे रेपो रेट) को नहीं बदला। महंगाई बढ़ रही थी, लेकिन उसे कंट्रोल करने के लिए कदम नहीं उठाए गए।
रुपए या डॉलर की सप्लाई को बढ़ाने या घटाने के खास प्रयास नहीं किए गए। इससे बाजार में अनिश्चितता बनी रही।
3. प्रॉफिट बुकिंग (Profit Booking)
जब कीमतें एक स्तर पर पहुंचकर रुकने लगती हैं (रेजिस्टेंस), तो निवेशक अक्सर मुनाफावसूली (प्रॉफिट बुकिंग) करना शुरू कर देते हैं।
चांदी के मामले में भी यही हुआ, जब भाव 4 लाख के पार गया। सोने के मामले में भी, जब भाव 1.83 लाख तक पहुंचा, तो लोगों ने मुनाफा लेकर अपना पैसा सुरक्षित करना शुरू कर दिया।
4. कैश रखने की प्रवृत्ति (Preference for Cash)
युद्ध और आर्थिक अनिश्चितता के माहौल में, लोग नकदी (कैश) को ज्यादा सुरक्षित मानने लगते हैं। गैस सिलेंडर और तेल जैसी ज़रूरी चीज़ों की दिक्कतों को देखते हुए, लोगों को लगा कि घर में पैसा होना ज़रूरी है।
यह सारे कारक मिलकर सोने की कीमतों में गिरावट का कारण बने।
क्या सोना फिर से बढ़ेगा?
इतिहास गवाह है कि सोने की कीमतें समय के साथ हमेशा बढ़ी हैं। पिछले 30 सालों में शायद ही 4 साल ऐसे रहे होंगे जब सोने ने रिटर्न न दिया हो।
सरकारी बैंकें भी सोने को खरीदने में रुचि दिखाती हैं, और हम सब सरकारी बैंकों पर निर्भर हैं।
निवेश का सही समय कौन सा है, यह सोचना महत्वपूर्ण है। लेकिन यह कहना कि सोना निवेश का अच्छा विकल्प नहीं है, गलत होगा।
विशेषज्ञों की राय
अगर बड़ी इन्वेस्टमेंट बैंकों की सलाह को देखें, तो वे सोने के भविष्य को लेकर काफी सकारात्मक हैं:
- जेपी मॉर्गन का मानना है कि 2026 तक सोने की कीमतें $6300 प्रति औंस (28 ग्राम) तक पहुंच सकती हैं, जबकि अभी यह लगभग $4100-$4200 के आसपास है।
- यूबीएस का अनुमान है कि सोने का भाव बढ़कर $6200 प्रति औंस तक जाएगा।
चांदी के बारे में भी उम्मीदें हैं। बुलियन एंड ज्वेलरी एसोसिएशन के मुताबिक, 1 जनवरी को चांदी का भाव ऑल-टाइम हाई पर था। इसके बावजूद, मोतीलाल ओसवाल जैसी ब्रोकरेज फर्मों का मानना है कि चांदी के भाव बढ़कर ₹3.5 लाख से ₹4.5 लाख प्रति किलो तक जा सकते हैं।
यह सब दर्शाता है कि बाजार इन दोनों धातुओं में काफी संभावनाएं देख रहा है।
निवेश का अंतिम निर्णय हमेशा आपका अपना होता है। मेरा काम आपको विकल्पों और वर्तमान घटनाओं के पीछे के कारणों को समझाना था।
अगर आप भी निवेश करना चाहते हैं, तो सोच-समझकर, अपनी रिसर्च के आधार पर निर्णय लें।
ध्यान दें: म्यूच्यूअल फंड में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। सभी स्कीम से संबंधित दस्तावेजों को ध्यान से पढ़ें।