- साइड-लोडिंग ऐप्स पर नई पाबंदियाँ
- थर्ड-पार्टी ऐप स्टोर और जेमिनी का दबदबा
- OEMs का "माफिया" और कस्टम ROMs का अंत?
एंड्रॉइड की दुनिया में 2026 में बड़े बदलाव आने वाले हैं, खासकर साइड-लोडिंग ऐप्स और AI इंटीग्रेशन को लेकर। गूगल इस बार यूजर डेटा और डिवाइस को सुरक्षित रखने पर जोर दे रहा है, लेकिन यह ओपन-सोर्स नेचर के साथ कितना बैलेंस करेगा, यह देखना दिलचस्प होगा।
साइड-लोडिंग ऐप्स पर नई पाबंदियाँ
अभी तक, आप किसी भी एपीके फ़ाइल को डाउनलोड करके अपने एंड्रॉइड डिवाइस पर आसानी से इंस्टॉल कर सकते थे। लेकिन 2026 से, यह प्रक्रिया ज्यादा जटिल हो जाएगी, खासकर अनवेरिफाइड ऐप्स के लिए। गूगल ने पुष्टि की है कि एपीके इंस्टॉलेशन का तरीका नहीं बदलेगा, लेकिन अनवेरिफाइड डेवलपर्स से आने वाले ऐप्स पर कड़ी पाबंदियां लगाई जाएंगी।
अनवेरिफाइड ऐप्स वे होती हैं जो किसी ऐसे अज्ञात डेवलपर से आती हैं, जिनमें दुर्भावनापूर्ण कोड होने की आशंका हो सकती है। यदि आप ऐसी कोई ऐप इंस्टॉल करने की कोशिश करते हैं, तो आपको कई चरणों से गुजरना होगा। सबसे पहले, सिस्टम आपसे पूछेगा कि क्या आप खुद इस ऐप को डाउनलोड कर रहे हैं या कोई और करवा रहा है। इसके बाद, आपका फोन रीस्टार्ट होगा।
परमिशन इनेबल करने के लिए आपको 24 घंटे इंतजार करना पड़ सकता है, और इसके बाद भी आपको डेवलपर ऑप्शन में जाकर सेटिंग्स को इनेबल करना होगा। यह सेटिंग 7 दिनों के लिए या हमेशा के लिए इनेबल की जा सकती है। यह मल्टीपल लेवल ऑफ सिक्योरिटी का एक उदाहरण है, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी अनटैक-सेवी यूजर गलती से कोई मैलिशियस या स्कैम वाली ऐप इंस्टॉल न कर ले।
मार्केट में कई तरह के स्कैम होते हैं, जहाँ स्कैमर गलत ऐप इंस्टॉल करवाकर आपके मोबाइल फोन का पूरा कंट्रोल हासिल कर लेते हैं। इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए गूगल यह कदम उठा रहा है, ताकि आपके डेटा और डिवाइस को सुरक्षित रखा जा सके। यह कदम एंड्रॉइड की ओपननेस को बनाए रखते हुए सुरक्षा को बढ़ाने का एक प्रयास है।
अगर आप वेरिफाइड डेवलपर से कोई ऐप इंस्टॉल करते हैं, तो वह पहले की तरह ही काम करेगी। लेकिन अननोन सोर्स से डाउनलोड करने पर दिक्कतें आ सकती हैं। हालांकि, यह भी सच है कि ज्यादातर लोग वेरिफाइड ऐप्स ही डाउनलोड करते हैं, और कई बार एपीके भी वेरिफाइड सोर्स से ही डाउनलोड की जाती हैं। ज्यादातर ऐप्स तो गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध हैं।
अनवेरिफाइड ऐप्स में अक्सर क्रैक्ड या मॉडेड ऐप्स शामिल होती हैं, जिनके इंस्टॉलेशन में अब दिक्कत आ सकती है। इन सब बदलावों का मुख्य उद्देश्य यूजर के डेटा और फोन को सुरक्षित रखना है। एंड्रॉइड ओपन-सोर्स है, लेकिन इसी ओपन-सोर्स नेचर के कारण सुरक्षा संबंधी चुनौतियाँ भी आती हैं। आज दुनिया में सबसे ज्यादा स्मार्टफोन एंड्रॉइड पर चलते हैं, और किसी भी सुरक्षा खामी का बड़ा असर हो सकता है।
थर्ड-पार्टी ऐप स्टोर और जेमिनी का दबदबा
2026 में, गूगल पहली बार थर्ड-पार्टी ऐप स्टोर को भी आधिकारिक तौर पर अनुमति देगा। एपिक गेम्स स्टोर जैसी चीजें अब आधिकारिक हो जाएंगी, जिससे डेवलपर्स को गूगल प्ले स्टोर के अलावा और भी विकल्प मिलेंगे।
लेकिन सबसे बड़ा बदलाव जेमिनी (Gemini) के इंटीग्रेशन में देखने को मिलेगा। गूगल असिस्टेंट को साइडलाइन करके, गूगल अब अपनी हर ऐप में जेमिनी को इंटीग्रेट करने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। गूगल क्रोम से लेकर जीमेल और गूगल मैप्स तक, हर जगह जेमिनी का इंटीग्रेशन हो रहा है।
हाल ही में T20 वर्ल्ड कप और आने वाले IPL में जेमिनी के विज्ञापन ज्यादा देखने को मिले हैं। गूगल जेमिनी को भारत और वैश्विक स्तर पर बढ़ावा दे रहा है ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इसे इस्तेमाल करना शुरू कर दें। गूगल का ऑपरेटिंग सिस्टम फ्री है, लेकिन प्ले स्टोर और गूगल ऐप्स के लिए वह पैसा कमाता है। जेमिनी के व्यापक उपयोग से गूगल अपनी कमाई बढ़ाने की उम्मीद कर रहा है।
जेमिनी को बनाना एक महंगा काम है, और गूगल चाहता है कि लोग इसकी ऐप्स का इस्तेमाल करें और उस पर निर्भर हो जाएं। इसके बाद, गूगल जेमिनी प्रो जैसे पेड प्लान भी ला सकता है।
गूगल पिक्सल फोन के साथ एक साल का जेमिनी प्रो सब्सक्रिप्शन दिया जा रहा है, और जियो भी जेमिनी प्रो का सब्सक्रिप्शन फ्री में दे रहा है। इसका उद्देश्य लोगों को जेमिनी के फीचर्स, जैसे इमेज एडिटिंग, का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित करना है।
अगर ज्यादा लोग जेमिनी का इस्तेमाल करते हैं, तो गूगल के पास एंड्रॉइड को डिक्टेट करने की और अधिक शक्ति आ जाएगी। इससे कंपनियों के लिए खुद का AI बनाना या थर्ड-पार्टी AI का उपयोग करना और मुश्किल हो जाएगा। गूगल पूरे एंड्रॉइड इकोसिस्टम को कंट्रोल करना चाहता है, जिससे थर्ड-पार्टी OS या AI बनाना और भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
OEMs का "माफिया" और कस्टम ROMs का अंत?
गूगल अकेले एंड्रॉइड को कंट्रोल नहीं कर रहा है; उसके मेजर पार्टनर्स जैसे Xiaomi, Samsung, Vivo, और Oppo भी इसमें शामिल हैं। यह पार्टनरशिप एक तरह का "माफिया" जैसा बन गई है, जो यह तय करते हैं कि गूगल कैसे काम करेगा और कौन से फीचर्स डेवलप होंगे।
इसी वजह से, आपको ColorOS, OriginOS, या HyperOS में थोड़ी अलग आंतरिक सेटिंग्स देखने को मिलती हैं, क्योंकि ये कंपनियाँ अपनी तरफ से भी कुछ कंट्रोल रखती हैं। यह कंट्रोल इतना बढ़ रहा है कि कस्टम ROMs, जो कभी बहुत लोकप्रिय थीं, अब धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं।
आज के समय में कस्टम ROMs को इंस्टॉल करना बहुत मुश्किल हो गया है। अगर आप फोन की सेटिंग्स या ऑपरेटिंग सिस्टम से छेड़छाड़ करते हैं, तो कई ऐप्स, खासकर बैंकिंग ऐप्स, काम करना बंद कर देती हैं।
गूगल और एंड्रॉइड फोन कंपनियाँ कस्टम ROMs को हतोत्साहित कर रही हैं ताकि लोग उनके द्वारा बनाए गए ऑपरेटिंग सिस्टम का ही उपयोग करें। इससे कंपनियों का सॉफ्टवेयर के माध्यम से पैसा कमाना बंद हो जाएगा, और गूगल की ऐप्स और जेमिनी का प्रचार भी रुकेगा।
सीधी बात यह है कि गूगल एक क्लोज्ड ऑपरेटिंग सिस्टम बनाना चाहता है, जहाँ सब कुछ उसके नियंत्रण में हो। जहाँ पहले एंड्रॉइड अपनी ओपननेस के लिए जाना जाता था, वहीं अब यह गूगल के अनुभव के अनुसार काम करेगा। अनवेरिफाइड ऐप्स को इंस्टॉल करने में जो फ्रिक्शन ऐड किया गया है, उसका उद्देश्य यह है कि लोग बीच में ही कोशिश छोड़ दें, जिससे नियंत्रित यूजर एक्सपीरियंस मिल सके।
गूगल का कंट्रोल और AI का भविष्य
हालांकि, यह कहना गलत होगा कि एंड्रॉइड OEMs के पास सबसे ज्यादा पावर है। गूगल के पास इससे भी ज्यादा पावर है। 2026 से, गूगल यह मैंडेट कर रहा है कि कंपनियां सालाना बड़े अपडेट के बजाय, मंथली या क्वार्टरली कुछ न कुछ अपडेट देंगी।
इससे डिवाइस में फीचर्स और सिक्योरिटी दोनों लगातार अपडेट होते रहेंगे। गूगल खुद अपने पिक्सल फोन में मंथली सिक्योरिटी अपडेट और हर तिमाही में पिक्सल ड्रॉप अपडेट देता है, ताकि नए फीचर्स का अनुभव मिलता रहे।
एंड्रॉइड 17 में ढेर सारे AI फीचर्स इंटीग्रेट किए जाएंगे, और पहली बार हमें एक AI-संचालित ऑपरेटिंग सिस्टम का असली रूप देखने को मिलेगा। गूगल IO में इस बारे में और जानकारी साझा की जाएगी।
गूगल अब किसी भी बाहरी ऑपरेटिंग सिस्टम को अपने प्लेटफॉर्म में एंट्री नहीं देना चाहता। वह अपने अंदर ही नई चीजों को डेवलप कर रहा है और ऐप्स को भी अपग्रेड कर रहा है ताकि वे पुराने एंड्रॉइड वर्जन तक भी पहुँच सकें।
ज्यादातर ऐप्स, जैसे गूगल ऐप, जेमिनी, क्रोम, और मैप्स, AI फीचर्स के साथ अपडेट होंगी। भले ही ये फीचर्स ऑनलाइन चलेंगे, लेकिन इससे गूगल अपने AI को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचा पाएगा।
इसके अलावा, गूगल उन तरीकों को भी प्रतिबंधित करेगा जिनसे एंड्रॉइड मेकर थर्ड-पार्टी ऐप्स को इंटीग्रेट करते थे। इससे फालतू या ब्लोटवेयर के रूप में आने वाली यूजलेस ऐप्स से छुटकारा मिलेगा, जिससे यूजर एक्सपीरियंस बेहतर होगा और गूगल का कंट्रोल भी बढ़ेगा।
संक्षेप में, एंड्रॉइड ओपन-सोर्स बना रहेगा, लेकिन जिन डिवाइस पर गूगल की सेवाएं, ऐप्स और प्ले स्टोर का इस्तेमाल होगा, वहां एक कंसिस्टेंट AI और अन्य फीचर्स का अनुभव मिलेगा। गूगल और उसके पार्टनर्स मिलकर यह तय करेंगे कि आपका यूजर एक्सपीरियंस कैसा होगा। 2026 में एंड्रॉइड में ये बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे, और एंड्रॉइड 17 में और भी नए AI फीचर्स आने की उम्मीद है।