- क्या था साथानकुलम कस्टोडियल डेथ का पूरा मामला?
- थाने के भीतर की बर्बरता: खून से सने कपड़े
- CBI जांच और पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी
मदुरई की एक अदालत ने न्याय का एक ऐसा फैसला सुनाया है जिसने पूरे देश को झकझोरकर रख दिया है। यह मामला रक्षकों के भक्षक बनने का है, जहाँ पुलिसकर्मियों ने अपनी शक्ति का दुरुपयोग करते हुए दो मासूम जिंदगियों को मौत के घाट उतार दिया।
मदुरई सेशन कोर्ट ने नौ पुलिसकर्मियों को एक पिता और पुत्र की हत्या के मामले में फांसी की सजा सुनाई है। यह मामला तमिलनाडु के साथानकुलम में हुई कस्टोडियल डेथ से जुड़ा हुआ है, जिसने कोरोना काल के दौरान पूरी मानवता को शर्मसार कर दिया था।
क्या था साथानकुलम कस्टोडियल डेथ का पूरा मामला?
यह घटना 19 जून 2020 की है, जब भारत कोविड-19 लॉकडाउन की सख्त पाबंदियों से जूझ रहा था। तमिलनाडु के साकुलम (साथानकुलम) में पुलिस ने 59 वर्षीय पी जयराज और उनके बेटे जे बेनिक्स को हिरासत में लिया था।
शुरुआती आरोप यह था कि उन्होंने लॉकडाउन के नियमों का उल्लंघन करते हुए अपनी मोबाइल की दुकान निर्धारित समय से अधिक देर तक खुली रखी थी। हालांकि, बाद में हुई जांच में जो तथ्य निकलकर आए, वे रोंगटे खड़े कर देने वाले थे।
वास्तव में, पी जयराज ने किसी स्थानीय विवाद में पुलिस की बदसलूकी का विरोध किया था, जिसे पुलिसकर्मियों ने अपने आत्मसम्मान पर चोट मान लिया। पुलिस ने उन्हें सबक सिखाने की नीयत से दुकान से उठाया और थाने ले गए।
जब बेनिक्स अपने पिता को बचाने के लिए पुलिस स्टेशन पहुंचे, तो उन्हें भी हिरासत में ले लिया गया। उस काली रात में पुलिस स्टेशन के भीतर जो हुआ, उसने पुलिसिया तंत्र की बर्बरता की सारी हदें पार कर दीं।
थाने के भीतर की बर्बरता: खून से सने कपड़े
पी जयराज और उनके बेटे बेनिक्स को रात भर बेरहमी से पीटा गया और उन्हें अमानवीय यातनाएं दी गईं। मारपीट इतनी गंभीर थी कि उनके शरीर से लगातार खून बह रहा था और उनकी हालत नाजुक हो गई थी।
परिजनों ने आरोप लगाया कि पुलिस ने खून से सने कपड़ों को बदलने के लिए घर से नए कपड़े मंगवाए थे ताकि उन्हें कोर्ट में पेश किया जा सके। न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के तीन दिन के भीतर ही दोनों की मौत हो गई।
22 जून को बेनिक्स की मौत हुई और उसके अगले ही दिन 23 जून को पी. जयराज ने भी दम तोड़ दिया। इस घटना ने पूरे तमिलनाडु में जनाक्रोश की आग भड़का दी और लोग सड़कों पर उतर आए।
जनता के दबाव और मामले की गंभीरता को देखते हुए मद्रास हाईकोर्ट की मदुरई बेंच ने स्वतः संज्ञान लिया। कोर्ट ने पुलिस प्रशासन से स्टेटस रिपोर्ट मांगी और मामले की निष्पक्ष जांच के आदेश दिए।
CBI जांच और पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी
बढ़ते जनाक्रोश के बीच तमिलनाडु सरकार ने 28 जून 2020 को यह मामला सीबीआई (CBI) को सौंप दिया। सीबीआई ने अपनी जांच में पाया कि पुलिसकर्मियों ने पिता-पुत्र के खिलाफ झूठा मामला दर्ज किया था।
जांच एजेंसी ने तेजी से कार्रवाई करते हुए सब-इंस्पेक्टर बालकृष्ण, कांस्टेबल मुर्गन और मुख्य आरोपी इंस्पेक्टर श्रीधर सहित दस पुलिसकर्मियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया। इनमें से एक आरोपी की मौत कोरोना संक्रमण के कारण हो गई थी।
सीबीआई ने कोर्ट को बताया कि लॉकडाउन उल्लंघन का मामला महज एक बहाना था, असली मकसद जयराज को प्रताड़ित करना था। कोर्ट के सामने रखे गए सबूतों ने पुलिसिया बर्बरता की पूरी कहानी बयां कर दी।
यह कानूनी लड़ाई आसान नहीं थी, क्योंकि आरोपी पुलिस वाले खुद कानून के जानकार थे। मामले की सुनवाई 2020 से शुरू होकर 2024 तक चली, जिसमें कई मोड़ आए और दर्जनों बार जिरह हुई।
न्याय मिलने में लगे 6 साल: ऐतिहासिक फैसला
मदुरई कोर्ट ने इस मामले को 'दुर्लभ से दुर्लभतम' (Rarest of Rare) करार दिया। कोर्ट ने माना कि यह मानवीय गरिमा का खुला उल्लंघन है और समाज में कानून के प्रति विश्वास बनाए रखने के लिए सख्त सजा जरूरी है।
6 अप्रैल को सुनाए गए फैसले में नौ के नौ पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा दी गई। इसके साथ ही कोर्ट ने पीड़ित परिवार को 1 करोड़ 40 लाख रुपये का मुआवजा देने का भी आदेश दिया।
यह मुआवजा किसी सरकारी खजाने से नहीं, बल्कि दोषी पुलिसकर्मियों की संपत्तियों को बेचकर या कुर्क करके वसूला जाएगा। यह राशि पीड़ित की मां और बहन को न्याय के रूप में दी जाएगी।
भारत में कस्टोडियल डेथ के चौंकाने वाले आंकड़े
यह फैसला सिर्फ एक सजा नहीं है, बल्कि उस कस्टोडियल हिंसा पर कड़ा प्रहार है जो देश में लंबे समय से चली आ रही है। नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन (NHRC) के आंकड़े इस हकीकत को बयां करते हैं।
साल 2023-24 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में 150 से अधिक मौतें पुलिस कस्टडी में हुईं। वहीं, न्यायिक हिरासत (Judicial Custody) के दौरान होने वाली मौतों का आंकड़ा 2000 से भी ऊपर है।
पिछले 8 वर्षों में पुलिस हिरासत में 1131 लोगों की जान जा चुकी है। यह आंकड़े बताते हैं कि पुलिसिया तंत्र में आज भी सुधार की भारी गुंजाइश है और रक्षक कई बार भक्षक की भूमिका में आ जाते हैं।
इन आंकड़ों के बावजूद, बहुत कम मामलों में पुलिसकर्मियों को सजा मिल पाती है। मदुरई कोर्ट का यह फैसला उन अधिकारियों के लिए एक चेतावनी है जो कानून को अपने हाथ में लेते हैं।
संविधान और हमारे मौलिक अधिकार
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अनुच्छेद 21 के तहत सम्मान के साथ जीने का अधिकार देता है। कस्टोडियल डेथ इस मौलिक अधिकार का सबसे बड़ा उल्लंघन है।
अनुच्छेद 20(3) के अनुसार, किसी भी व्यक्ति को खुद के खिलाफ गवाही देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। लेकिन अक्सर देखा गया है कि पुलिस थर्ड डिग्री का इस्तेमाल कर जबरन कबूलनामा लेती है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023 के तहत अब हिरासत और पूछताछ की प्रक्रियाओं को और अधिक स्पष्ट किया गया है। इसमें पुलिस की मनमानी को रोकने के लिए कई प्रावधान शामिल किए गए हैं।
कानून यह भी कहता है कि किसी आरोपी से मारपीट करना या उसे गंभीर चोट पहुँचाना एक अपराध है। बावजूद इसके, पुलिस थानों के भीतर हिंसा की संस्कृति अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
क्या है इस समस्या का समाधान?
लॉ कमीशन की 273वीं रिपोर्ट में सिफारिश की गई थी कि भारत को यातना विरोधी अंतरराष्ट्रीय संधि (UNNCAT) को अपनाना चाहिए। इसके लिए एक अलग और कड़ा कानून बनाना समय की मांग है।
सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में एक महत्वपूर्ण निर्देश दिया था कि हर पुलिस थाने के भीतर सीसीटीवी (CCTV) कैमरे लगे होने चाहिए। इनका डेटा कम से कम 6 महीने तक सुरक्षित रहना अनिवार्य है।
हालांकि, धरातल पर इसकी पालना में कई कमियां हैं। कभी कैमरे खराब होने का बहाना बनाया जाता है तो कभी डेटा गायब होने की बात कही जाती है। पारदर्शिता के बिना कस्टोडियल हिंसा को रोकना असंभव है।
पुलिस प्रशिक्षण (Training) में भी बड़े बदलाव की जरूरत है। पुलिसकर्मियों को यह सिखाया जाना चाहिए कि बिना शारीरिक क्षति पहुँचाए मनोवैज्ञानिक तरीके से जांच कैसे की जाती है।
दोषियों के पास अब क्या विकल्प हैं?
मदुरई कोर्ट के इस फैसले के बाद, दोषी पुलिसकर्मी अभी भी कानूनी विकल्पों का इस्तेमाल कर सकते हैं। चूंकि यह फांसी की सजा है, इसलिए इसे हाईकोर्ट द्वारा पुष्ट (Confirm) करना अनिवार्य है।
दोषी पुलिसकर्मी मद्रास हाईकोर्ट में अपील कर सकते हैं। यदि वहां से भी राहत नहीं मिलती, तो वे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन और क्यूरेटिव पिटीशन के विकल्प भी मौजूद रहते हैं।
अंतिम विकल्प के रूप में, वे भारत के राष्ट्रपति के पास क्षमादान के लिए आवेदन कर सकते हैं। भारत में फांसी की प्रक्रिया अत्यंत लंबी है, लेकिन यह फैसला एक नजीर पेश कर चुका है।
अंततः, साथानकुलम का यह मामला हमें याद दिलाता है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है, चाहे वह वर्दीधारी पुलिस अधिकारी ही क्यों न हो। मानवीय गरिमा और न्याय की जीत ही लोकतंत्र की असली ताकत है।