- ईरान की 10 सूत्रीय शर्तें और अमेरिका का पीछे हटना
- ईरान के लोगों का जज्बा और 'ह्यूमन चेन' की शक्ति
- पाकिस्तान का 'स्क्रिप्टेड' रोल और ट्विटर की गलती
बीते कई दिनों से ईरान और अमेरिका के बीच इजराइल के जरिए जो तनाव चल रहा था, उसे अब एक बड़ा विराम मिलता नजर आ रहा है। महीनों से डोनाल्ड ट्रंप जिस तरह के कड़े बयान दे रहे थे, उससे पूरी दुनिया में युद्ध का खौफ पैदा हो गया था।
ट्रंप ने ईरान को मिटाने तक की बात कही थी और एक बयान ने तो सभी हदें पार कर दी थीं। उन्होंने कहा था कि "यह रात्रि अब आखिरी रात है, कल तो इनकी सिविलाइजेशन ही खत्म हो जाएगी।"
इस बयान के बाद पूरी दुनिया में टाइमर चलने शुरू हो गए थे। भारत में लोग सुबह 5:30 बजे का और अमेरिका में रात 8:00 बजे का बेसब्री से इंतजार करने लगे थे।
हर कोई डरा हुआ था कि ईरान पर कुछ इतना भयानक होने वाला है जिसकी कल्पना इंसानियत ने पहले कभी नहीं की होगी। ट्रंप अक्सर कहते थे कि अगर ईरान को बात करनी है तो वह Unconditional Surrender यानी बिना शर्त आत्मसमर्पण की बात करे।
लेकिन अब जो खबरें निकलकर सामने आ रही हैं, वे बेहद चौंकाने वाली हैं। अमेरिका के द्वारा जितना भी एक्सट्रीम प्रेशर क्रिएट किया गया था, वह असल में महज एक दबाव की रणनीति साबित हुई।
फाइनली इजराइल, ईरान और अमेरिका तीनों मिलकर एक Ceasefire यानी युद्ध विराम के लिए तैयार हो गए हैं। दो हफ्ते की इस सीजफायर में यह तय हुआ है कि अमेरिका ईरान की लगभग सभी शर्तें मान लेगा।
ईरान की 10 सूत्रीय शर्तें और अमेरिका का पीछे हटना
ईरान ने अपनी शर्तें मनवा ली हैं और अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि असल में यह युद्ध कौन जीता? ईरान में इस समय जश्न का माहौल है और लोग सड़कों पर खुशियां मना रहे हैं।
सोशल मीडिया पर अमेरिका को लगातार ट्रोल किया जा रहा है कि अंततः ईरान ने अपनी बातें मनवा ही लीं। इस सीजफायर में ईरान का 10-point plan सबसे महत्वपूर्ण बिंदु बनकर उभरा है।
हैरानी की बात यह है कि अमेरिका Uranium Enrichment तक के लिए मान गया है। यानी ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम के लिए यूरेनियम को और भी ज्यादा एनरिच कर सकेगा।
इसके साथ ही अमेरिका ईरान पर लगे सभी प्रकार के प्रतिबंधों को हटाने के लिए भी राजी हो गया है। यह दर्शाता है कि इस पूरे घटनाक्रम में सही मायने में अमेरिका पीछे हटा है और ईरान की कूटनीति सफल रही है।
ईरान ने स्पष्ट कर दिया था कि यदि अमेरिका हमला करता है, तो वह भी चुप नहीं बैठेगा। इस दबाव का असर यह हुआ कि Strait of Hormuz को खोलने के बदले अमेरिका ईरान की शर्तों को मानने पर मजबूर हुआ।
अब दुनिया देख रही है कि क्या ट्रंप इस मजाक को सह पाएंगे या यह सीजफायर दो हफ्ते की जगह दो दिन भी नहीं चल पाएगा। अगर ट्रंप को लगा कि दुनिया में उनका मजाक बन रहा है, तो स्थितियाँ फिर से बदल सकती हैं।
ईरान के लोगों का जज्बा और 'ह्यूमन चेन' की शक्ति
जब अमेरिका और इजराइल की ओर से ईरान के इंफ्रास्ट्रक्चर को तबाह करने की धमकियां मिल रही थीं, तब ईरान ने एक अनोखा रास्ता चुना। इजराइल ने कहा था कि वे ईरान की सारी ट्रेनें और पावर प्लांट उड़ा देंगे।
अमेरिका ने भी पुलों और बिजली केंद्रों को निशाना बनाने की धमकी दी थी ताकि ईरान को दशकों पीछे धकेला जा सके। ऐसे में ईरान के अधिकारियों ने अपने नागरिकों से सड़कों पर उतरने की अपील की थी।
ईरान के लोग बड़ी संख्या में बाहर आए और उन्होंने पावर प्लांट्स और ब्रिजेस के आसपास Human Chain बना ली। उनका मकसद यह था कि यदि अमेरिका बमबारी करता है, तो उसे पहले आम नागरिकों को मारना होगा।
ईरान के राष्ट्रपति ने खुद घोषणा की थी कि लगभग 14 मिलियन यानी डेढ़ करोड़ लोग सड़कों पर उतरने के लिए तैयार हैं। यह जज्बा देखकर अमेरिका और पूरी दुनिया के होश उड़ गए थे।
आम नागरिकों पर हमला करना किसी भी युद्ध में अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन माना जाता है। अगर अमेरिका इन लोगों पर गोला चलाता, तो पूरी दुनिया में उसका कड़ा विरोध होता, जिसमें भारत, चीन और रूस भी शामिल होते।
ईरान के लोगों ने दिखा दिया कि वे अपनी सभ्यता और संसाधनों की रक्षा के लिए जान देने को भी तैयार हैं। इसी दबाव ने अमेरिका को अपनी रणनीति बदलने और बातचीत की मेज पर आने के लिए मजबूर किया।
पाकिस्तान का 'स्क्रिप्टेड' रोल और ट्विटर की गलती
इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका भी काफी चर्चा में रही है। कई देशों ने पाकिस्तान को इस मध्यस्थता के लिए धन्यवाद दिया है, लेकिन इसके पीछे की कहानी कुछ और ही है।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने एक ट्वीट किया था जिसमें उन्होंने ट्रंप से दो हफ्ते की मोहलत मांगी थी। उन्होंने ईरान से भी अनुरोध किया था कि वे Strait of Hormuz को दो हफ्ते के लिए खोल दें।
शुरुआत में लगा कि पाकिस्तान ने बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत हासिल की है, लेकिन जल्द ही एक बड़ी गलती पकड़ी गई। शहबाज शरीफ के ट्वीट में ऊपर लिखा रह गया था "Draft message to Pakistan PM"।
इसका साफ मतलब था कि यह संदेश पाकिस्तान ने नहीं, बल्कि अमेरिका ने खुद लिखकर दिया था। पाकिस्तान का ट्विटर हैंडल असल में अमेरिका की दी हुई स्क्रिप्ट पर काम कर रहा था।
अमेरिका चाहता था कि वह सीधे तौर पर झुकता हुआ न दिखे, इसलिए उसने पाकिस्तान का सहारा लिया। पाकिस्तान को एक मोहरे की तरह इस्तेमाल किया गया ताकि दुनिया को लगे कि मध्यस्थता किसी तीसरे देश ने की है।
सोशल मीडिया पर इस "एडिटेड" ट्वीट को लेकर पाकिस्तान की काफी फजीहत हुई। लोगों ने कहा कि पाकिस्तान सिर्फ अमेरिका की दलाली कर रहा था और उसे जमीनी हकीकत का पता भी नहीं था।
वैश्विक अर्थव्यवस्था और तेल की कीमतों में उछाल
युद्ध के इस माहौल ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। कल रात्रि जब हमले की आशंका चरम पर थी, तब Brent Crude का भाव $144 प्रति बैरल तक पहुंच गया था।
यह अब तक के इतिहास का सबसे उच्चतम स्तर माना जा रहा है, जिसने दुनिया भर के बाजारों में खलबली मचा दी। तेल की कीमतों में इस भारी उछाल ने अमेरिका जैसे बड़े देशों की चिंता बढ़ा दी थी।
ईरान ने पहले ही चेतावनी दी थी कि अगर उस पर हमला हुआ, तो वह पूरे मिडिल ईस्ट की रिफाइनरीज को तबाह कर देगा। सऊदी अरब, कुवैत और यूएई जैसे देशों के तेल संसाधनों को निशाना बनाने की धमकी दी गई थी।
कुवैत ने तो रातों-रात कर्फ्यू तक लागू कर दिया था और पूरी दुनिया में एक दहशत का माहौल बन गया था। अमेरिका को समझ आ गया था कि अगर तेल की आपूर्ति रुकी, तो उसकी अपनी अर्थव्यवस्था भी डूब जाएगी।
ईरान ने यह भी सुनिश्चित किया कि उसके नागरिकों को Iodine Tablets बांट दी जाएं। यह टैबलेट रेडिएशन के प्रभाव को कम करने के लिए दी जाती हैं, जिससे यह संकेत गया कि ईरान परमाणु हमले के लिए भी तैयार है।
इतने बड़े पैमाने पर तैयारियों ने अमेरिका के B-2 Bombers को भी पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। अंततः शांति की बहाली के लिए सीजफायर ही एकमात्र रास्ता बचा था।
चीन की पर्दे के पीछे की भूमिका और भविष्य की चुनौतियां
भले ही पाकिस्तान को सामने रखा गया हो, लेकिन इस डील के पीछे असली खिलाड़ी China बताया जा रहा है। चीन ने ईरान के साथ मिलकर इस पूरी मध्यस्थता की रूपरेखा तैयार की थी।
ट्रंप ने खुद स्वीकार किया है कि चीन ने इस मामले में अहम भूमिका निभाई है। यह पुराने 'रिचर्ड निक्सन' वाले दौर की याद दिलाता है जब चीन और अमेरिका के बीच ऐसे ही कूटनीतिक खेल चलते थे।
ईरान ने जो 10 शर्तें रखी हैं, उनमें लेबनान पर हमले रोकना और यूरेनियम एनरिचमेंट जारी रखना शामिल हैं। साथ ही ईरान चाहता है कि गल्फ देशों से अमेरिकी सेना पूरी तरह से हट जाए।
हालांकि, इज़राइल ने पहले ही साफ कर दिया है कि वह लेबनान में अपने हमले नहीं रोकेगा। बेंजामिन नेतन्याहू के कार्यालय से बयान आया है कि वे लेबनान की शर्त को नहीं मानेंगे।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ईरान अपनी इस शर्त के टूटने पर शांत रहेगा? इजराइल में नेतन्याहू का विरोध भी शुरू हो गया है क्योंकि उन्हें इस पूरी डील से बाहर रखा गया है।
अगले दो हफ्तों में पाकिस्तान में होने वाली वार्ता यह तय करेगी कि क्या यह शांति स्थायी है। दुनिया उम्मीद कर रही है कि पश्चिम एशिया में चल रहा यह खूनी खेल अब हमेशा के लिए खत्म हो जाए।
निष्कर्ष: किसकी हुई असली जीत?
वर्तमान स्थितियों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि Iran इस कूटनीतिक लड़ाई में विजेता बनकर उभरा है। उसने न केवल अपनी शर्तें मनवाईं, बल्कि अमेरिका को बातचीत की मेज पर आने को मजबूर भी किया।
ट्रंप के लिए यह स्थिति काफी असहज हो सकती है क्योंकि उन्होंने "बिना शर्त समर्पण" की बात कही थी। अब उन्हें ईरान की 10 सूत्रीय योजना पर विचार करना पड़ रहा है, जो उनकी छवि के विपरीत है।
ईरान के लोग सड़कों पर अपनी जीत का जश्न मना रहे हैं और खमेनेई के पुराने बयानों को याद कर रहे हैं। उन्होंने साबित कर दिया कि दबाव के आगे झुकने के बजाय मुकाबला करना ही सबसे बेहतर विकल्प है।
अब देखना यह होगा कि 10 अप्रैल को पाकिस्तान में होने वाली बैठक में क्या ठोस नतीजे निकलते हैं। क्या अमेरिका वाकई सभी प्रतिबंध हटा लेगा या यह केवल वक्त काटने की एक चाल है?
इस पूरे घटनाक्रम ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक युग में केवल हथियारों से युद्ध नहीं जीते जाते। कूटनीति, जनसमर्थन और आर्थिक दबाव किसी भी महाशक्ति को घुटने टेकने पर मजबूर कर सकते हैं।
आने वाले दिन पश्चिम एशिया के भविष्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण होने वाले हैं। पूरी दुनिया की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह दो हफ्ते का समय किसी स्थाई शांति की नींव रख पाएगा।