दुनिया पर जहां एक ओर अमेरिका और ईरान के तनाव के बीच तेल संकट गहरा रहा है, वहीं फर्टिलाइजर, एलपीजी और एलएनजी के दामों में भी भारी अस्थिरता देखी जा रही है। सोने और क्रूड के भाव पहले से ही आसमान छू रहे हैं, जिससे वैश्विक बाजारों में बेचैनी का माहौल है।
इसी बीच एक बड़ी खबर निकल कर आती है कि अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने अपने देश में 'लिबरेशन डे' के अवसर पर एक चौंकाने वाली घोषणा की है। यह घोषणा वैश्विक व्यापार और विशेष रूप से फार्मास्यूटिकल सेक्टर के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है।
ट्रंप ने पिछले साल 2 अप्रैल 2025 को कुछ टेरिफ लगाए थे, जिनका उद्देश्य अमेरिका को वैश्विक व्यापारिक पकड़ से बाहर निकालकर आत्मनिर्भर बनाना था। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि यदि आप अमेरिका में सामान बेचना चाहते हैं, तो आपको पहले भारी Tariffs चुकाने होंगे।
अब उन्होंने दवाओं के आयात पर 100% टैरिफ लगाने का ऐलान कर दिया है। इसका सीधा मतलब है कि यदि किसी दवा की कीमत 100 रुपये है, तो अब उस पर 100 रुपये का अतिरिक्त टैक्स देना होगा।
इसके साथ ही मेटल्स पर भी 50% टैरिफ की घोषणा की गई है। बाजार पहले से ही युद्ध और वैश्विक अनिश्चितता के कारण घाटे में था, और अब इस फैसले ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है।
ट्रंप का विजन अभी भी MAGA (Make America Great Again) पर टिका हुआ है। उनका तर्क है कि ये टेरिफ कंपनियों को अमेरिका के भीतर निर्माण इकाइयां लगाने के लिए मजबूर करेंगे।
वह चाहते हैं कि दवाइयों और धातुओं का उत्पादन अमेरिका में ही हो। जो कंपनियां इन भारी टैक्सों से बचना चाहती हैं, उन्हें अमेरिका में आकर फैक्ट्रियां लगानी होंगी।
सवाल यह उठता है कि क्या इस कदम से अमेरिका में महंगाई नहीं बढ़ेगी? आइए इस पूरी स्थिति का गहराई से विश्लेषण करते हैं क्योंकि हेडलाइन बन चुकी है कि 'ट्रंप ने विदेशी निर्मित दवाओं पर 100% टेरिफ लगाया' है।
इस फैसले का सबसे बड़ा असर भारत और चीन जैसे देशों पर पड़ने की संभावना है। भारत दुनिया का एक प्रमुख दवा निर्यातक देश है, जो अमेरिका को बड़ी मात्रा में दवाइयां भेजता है।
दवाइयों के बाजार को समझने के लिए हमें दो श्रेणियों को जानना होगा: Patented Drugs (ब्रांडेड) और Generic Drugs (नॉन-ब्रांडेड)। पेटेंटेड दवाइयां वे होती हैं जिन्हें किसी कंपनी ने बड़ी रिसर्च और भारी खर्च के बाद पहली बार बनाया होता है।
वैज्ञानिकों के प्रयोगों, प्रयोगशालाओं के खर्च और सालों की मेहनत के बाद जब कोई नई दवा (जैसे कैंसर या कोरोना के लिए) बनती है, तो कंपनी उस पर एकाधिकार चाहती है। इस एकाधिकार को ही Patent कहा जाता है, ताकि कंपनी अपनी रिसर्च की लागत वसूल सके।
इसी कारण पेटेंटेड दवाओं के दाम बहुत ऊंचे होते हैं। कभी-कभी एक-एक डोज की कीमत लाखों में होती है, ताकि कंपनी अपने निवेश पर लाभ कमा सके।
लेकिन यदि ये दवाएं हमेशा इतनी महंगी रहीं, तो आम आदमी तक इनका लाभ कभी नहीं पहुंच पाएगा। इसलिए देशों के नियम होते हैं कि कुछ सालों बाद कंपनियों को अपना फार्मूला सार्वजनिक करना पड़ता है।
जब यह फार्मूला दूसरी कंपनियों को उपलब्ध हो जाता है, तो वे इसे बड़े पैमाने पर और सस्ते में बनाना शुरू कर देती हैं। इसी प्रक्रिया से बनी दवाओं को Generic Drugs कहा जाता है।
भारत दुनिया में इन्हीं जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक है। इसीलिए भारत को 'दुनिया की फार्मेसी' कहा जाता है क्योंकि हम लाखों लोगों के लिए सस्ती दवाएं बनाते हैं।
दवा बनाने के लिए सबसे जरूरी चीज होती है API (Active Pharmaceutical Ingredient)। यह दवा का वह मूल रासायनिक हिस्सा है जो बीमारी को ठीक करने का काम करता है।
री दुनिया में एपीआई बनाने का सबसे बड़ा केंद्र चीन है। यानी चीन से एपीआई आता है, भारत में उससे जेनेरिक दवा बनती है, और फिर वह पूरी दुनिया में निर्यात की जाती है।
ट्रंप ने जो 100% टेरिफ लगाया है, वह मुख्य रूप से Patented/Brand-name दवाओं पर केंद्रित है। उन्होंने फिलहाल जेनेरिक दवाओं को इस भारी टैक्स से बाहर रखा है।
इसका मतलब है कि ट्रंप भी जानते हैं कि अमेरिका के आम नागरिकों के लिए सस्ती जेनेरिक दवाएं कितनी जरूरी हैं। उनका निशाना उन बड़ी कंपनियों पर है जो पेटेंट के जरिए अरबों डॉलर कमा रही हैं।
ट्रंप ने स्पष्ट किया है कि यदि ये कंपनियां अमेरिका में प्लांट लगाती हैं, तो उन पर टैक्स 20% से भी कम होगा। लेकिन बाहर से आयात करने पर 100% का बोझ उठाना ही पड़ेगा।
भारत की अधिकतर कंपनियां जेनेरिक दवाएं बेचती हैं, इसलिए उन पर इस फैसले का तत्काल असर कम होने की उम्मीद है। हालांकि, कुछ बड़ी भारतीय कंपनियां जो पेटेंटेड दवाओं के लिए वैश्विक दिग्गजों के साथ जुड़ी हैं, उन्हें झटका लग सकता है।
इस फैसले के पीछे ट्रंप ने एक कानूनी चाल भी चली है। फरवरी 2026 में अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप को इस तरह के मनमाने टेरिफ लगाने से रोकने की कोशिश की थी।
लेकिन ट्रंप ने इस बार National Security (राष्ट्रीय सुरक्षा) का हवाला दिया है। जब कोई मुद्दा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ जाता है, तो अदालतें भी अक्सर हस्तक्षेप करने से बचती हैं।
ट्रंप का कहना है कि यदि भविष्य में युद्ध होता है और विदेशी कंपनियां दवा देने से मना कर देती हैं, तो अमेरिका संकट में आ जाएगा। इसलिए, दवा उत्पादन का अमेरिका में होना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अनिवार्य है।
यह आदेश 1 अक्टूबर से लागू होने की संभावना थी, जिसे पहले अनिश्चित काल के लिए टाल दिया गया था। लेकिन अब ट्रंप ने इसे पूरी शक्ति के साथ लागू करने का मन बना लिया है।
जो कंपनियां अमेरिका में प्लांट लगाने के लिए बातचीत करेंगी, उन्हें 120 से 180 दिनों का समय दिया गया है। इन कंपनियों पर शुरुआती तौर पर 20% टेरिफ लगेगा, जो 4 साल में बढ़कर 100% हो जाएगा।
लेकिन जो कंपनियां बातचीत नहीं करेंगी और केवल आयात जारी रखेंगी, उन्हें तत्काल प्रभाव से 100% टैक्स देना होगा। इसका असर फाइजर, एली लिली और ब्रिस्टल-मायर्स जैसी बड़ी कंपनियों पर पड़ेगा।
ये कंपनियां मुख्य रूप से आयरलैंड, जर्मनी, स्विट्जरलैंड और जापान जैसे विकसित देशों में स्थित हैं। आंकड़ों के अनुसार, आयरलैंड दुनिया की दवाओं के निर्यात का 28% हिस्सा संभालता है, जो लगभग 66 बिलियन डॉलर है।
भारत के लिए यह एक 'आपदा में अवसर' जैसा भी हो सकता है क्योंकि हमारी जेनेरिक दवाएं फिलहाल सुरक्षित हैं। हालांकि, यह सोचने वाली बात है कि रिसर्च में पिछड़ा होने के कारण हम पेटेंटेड दवाओं के बड़े मुनाफे से बाहर हैं।
अमेरिका को होने वाले कुल दवा निर्यात में भारत की हिस्सेदारी मात्रा (Volume) के हिसाब से बहुत ज्यादा है। लेकिन मूल्य (Value) के हिसाब से हम काफी पीछे हैं क्योंकि हम महंगी पेटेंटेड दवाएं नहीं बेचते।
भारत की प्रमुख फार्मा कंपनियां जैसे Sun Pharma, Dr. Reddy's, Lupin और Cipla के शेयरों में इस खबर के बाद हलचल देखी गई। निफ्टी फार्मा इंडेक्स में गिरावट दर्ज की गई है क्योंकि निवेशकों को भविष्य की अनिश्चितता का डर है।
अब बात करते हैं मेटल्स पर लगाए गए 50% टैरिफ की। ट्रंप ने स्टील, एल्युमीनियम और कॉपर (तांबा) पर टैक्स के नियमों को और अधिक स्पष्ट और सख्त कर दिया है।
उन्होंने एक 15% का विशेष नियम पेश किया है। यदि किसी उत्पाद के कुल मूल्य में इन धातुओं का हिस्सा 15% से कम है, तो उस पर टेरिफ नहीं लगेगा।
लेकिन यदि किसी उत्पाद में 15% से अधिक स्टील या कॉपर का उपयोग हुआ है, तो पूरे उत्पाद की कीमत पर 50% टेरिफ वसूला जाएगा। इसे एक उदाहरण से समझते हैं।
मान लीजिए एक स्टील की बोतल में महंगी शराब भरी हुई है। यदि उस बोतल में स्टील का वजन और मूल्य 15% की सीमा को पार कर जाता है, तो ट्रंप केवल स्टील पर टैक्स नहीं लेंगे।
वे पूरी शराब की बोतल की कीमत पर 50% टेरिफ लगा देंगे। यह एक बहुत ही स्मार्ट चाल है जिसके जरिए वे पैकेजिंग और मिश्रित उत्पादों पर भी टैक्स वसूलेंगे।
इसका सीधा असर भारत की मेटल कंपनियों जैसे Tata Steel, Hindustan Copper और Adani Steel पर पड़ सकता है। मेटल सेक्टर के शेयरों में भी इस घोषणा के बाद बिकवाली का दबाव देखा गया है।
पूरी दुनिया अब एक 'टेरिफ वॉर' की ओर बढ़ती दिख रही है। एक तरफ सीमा पर वास्तविक युद्ध चल रहे हैं और दूसरी तरफ व्यापारिक युद्ध (Trade War) ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है।
बाजार के विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप के इन फैसलों से अमेरिका में महंगाई और बढ़ सकती है। लेकिन ट्रंप का मानना है कि लंबी अवधि में यह अमेरिका को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाएगा।
निवेशकों के लिए सलाह है कि वे फार्मा और मेटल सेक्टर की उन कंपनियों पर नजर रखें जिनका अमेरिका में बड़ा एक्सपोर्ट एक्सपोजर है। हर बड़े संकट के बाद बाजार में रिकवरी भी आती है, इसलिए समझदारी से निवेश करना जरूरी है।
ट्रंप के इन फैसलों ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले समय में वैश्विक व्यापार के नियम पूरी तरह बदलने वाले हैं। भारत को अपनी रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) क्षमता बढ़ानी होगी ताकि हम केवल जेनेरिक तक ही सीमित न रहें।
फिलहाल, बाजार इस झटके को पचाने की कोशिश कर रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि अन्य देश इन टेरिफों के जवाब में क्या कदम उठाते हैं।
दुनिया भर की निगाहें अब व्हाइट हाउस की अगली घोषणाओं पर टिकी हैं। क्या यह केवल एक शुरुआत है या ट्रंप और भी सख्त कदम उठाने वाले हैं, यह वक्त ही बताएगा।