- सांसों का सौदा और 200 करोड़ का काला खेल
- नेपाल बनाम चीन: पर्वतारोहियों की पहली पसंद
- ऑक्सीजन की कमी और अक्लमेटाइजेशन का विज्ञान
सामान्यतः जिन्हें एडवेंचर पसंद होते हैं, वह एडवेंचर के नाम पर एक बहुत बड़ा एडवेंचर प्लान करने की सोचते हैं। उनमें से कुछ लोग उसे हासिल कर जाते हैं।
दुनिया में तमाम प्रकार के रोमांचकारी कार्यों में से एक सबसे रोमांचक जिसे माना जाता है, वह है दुनिया के सबसे ऊंची पर्वत चोटी माउंट एवरेस्ट पर पहुंचना। दुनिया के सबसे ऊंची ऐसी जगह जिसे इंसान ने हमेशा मिसाल में पाया वहां पहुंचना हर पर्वतारोही का सपना होता है।
हजारों की संख्या में लोग इस काम को करने के लिए निकलते हैं और रास्ते में लंबी कतारें लगती हैं। उनमें से कुछ लोग पहुंच पाते हैं और कुछ नहीं पहुंच पाते।
जो पहुंच जाते हैं वो पर्वतारोही अपने आप को हमेशा माउंट एवरेस्ट के पर्वतारोही के रूप में रिकॉग्नाइज करते हैं। लेकिन खबर निकलकर आती है कि इस पूरी कहानी में एक बड़ा स्कैम हो रहा है।
स्कैम क्या है? क्या साहब स्कैम के नाम पर लोगों को माउंट एवरेस्ट की जगह कोई दूसरी चोटी पर घुमा के ले आते हैं और कह देते हैं कि यह माउंट एवरेस्ट है?
नहीं, स्कैम यह हो रहा है कि रास्ते में इन पर्वतारोहियों को बेकिंग सोडा खिला दिया जाता है। बेकिंग सोडा खिलाने से जो पर्वतारोही चढ़ रहे हैं ,उनकी सांस फूलने लगती है।
सांसों का सौदा और 200 करोड़ का काला खेल
उन्हें ऐसा लगने लगता है कि ऑक्सीजन की कमी होना उनके लिए मुसीबत पैदा कर गया है। जिसके चलते उन्हें रास्ते से लौटा के लाया जाता है और लगभग $20 मिलियन का रेवेन्यू केवल इस तरह से बेवकूफ बनाकर कमा लिया जाता है।
20 मिलियन डॉलर का मतलब है लगभग 200 करोड़ रुपये के आसपास का यह पूरा खेल है। इस पूरी कहानी को आज अंतरराष्ट्रीय मीडिया में हेडलाइन बनाया गया है।
हेडलाइन है कि एवरेस्ट पर बेकिंग सोडा घोटाला चल रहा है। आइए समझते हैं इस पूरी कहानी को डिटेल में और कैसे इसमें पैसा कमाया जाता है, उसे जानते हैं।
नेपाल के अंदर चल रहे इस फेक रेस्क्यू रैकेट की सच्चाई अब दुनिया के सामने आने लगी है। माउंट एवरेस्ट हिमालय की सबसे ऊंची चोटी है जो भारत की शान और उत्तर पूर्व तक विस्तारित हिमालय का हिस्सा है।
माउंट एवरेस्ट मुख्य रूप से नेपाल में स्थित है। इसके उत्तर की तरफ तिब्बत वाला क्षेत्र है, यानी कि यह चीन वाला क्षेत्र है।
मतलब, इस पर्वत को नेपाल और चीन का बॉर्डर समझिए। इसमें एक साइड अगर आप नेपाल देख रहे हैं तो दूसरी साइड इसकी चाइना वाली साइड है।
नेपाल बनाम चीन: पर्वतारोहियों की पहली पसंद
अगर आपको इसकी चोटी पर जाना है तो या तो आप नेपाल वाली साइड से चले जाएं या चाइना वाली साइड से चले जाएं। सामान्यतया लोग नेपाल वाली साइड को ज्यादा प्रेफर करते हैं।
रीजन यह है कि नेपाल वाली साइड में थोड़ी ढलान ठीक है और वहां कैंप्स काफी ज्यादा हैं। लोग लोगों के लिए अब इतना ज्यादा इसको एक्सप्लोर कर लिया गया है कि सुविधाएं मिलने लगी हैं।
चाइना वाली साइड में क्या है कि वहां बहुत हाइट तक हालांकि कार चली जाती है लेकिन दूसरी तरफ से तेज हवाएं आती हैं। वहां सुविधाओं का भी अभाव है, इसलिए बड़ी संख्या में जो ट्रैकर्स चढ़ते हैं वो नेपाल वाली साइड से इस पहाड़ी के ऊपर चलते हैं।
इसकी हाइट लगभग 29,000 फीट है, यानी 8849 मीटर। यह दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटियों में से एक है जहां पहुंचने के लिए लोग निरंतर प्रयास करते हैं।
माउंट एवरेस्ट की इस हाइट पर पहुंचने के लिए लोग चाहते हैं कि वो कीर्तिमान स्थापित करें। इस पूरी चढ़ाई में कई स्टेप्स में चढ़ाई होती है और यह काफी जटिल प्रक्रिया है।
सबसे पहली जो चढ़ाई होती है यहां पे वो काठमांडू से लेकर लुक्का तक पहुंचती है। जहां पर खुम्बु घाटी के रास्ते साउथ बेस कैंप तक पहुंचा जाता है।
फिर खुम्बु आइस फॉल, कैंप वन, टू, थ्री और फिर साउथ कोल होते हुए समिट यानी टॉप पर पहुंचा जाता है। इस पूरी प्रक्रिया के अंदर जो रास्ते इनवॉल्व होते हैं उनमें पूरी टीम काम करती है।
इन पूरे रास्तों में लोगों को ले जाने के लिए काफी सारे शेरपा नेपाल से मिलते हैं जो ट्रैकिंग में मदद करते हैं। यहाँ एवरेस्ट बेस कैंप जमीन से ऑलरेडी 5000 मीटर यानी 5 कि.मी. ऊपर है।
ऑक्सीजन की कमी और अक्लमेटाइजेशन का विज्ञान
यहाँ से ऊपर की तरफ खंभू ग्लेशियर के बाद कैंप वन, कैंप टू, कैंप थ्री और कैंप फोर होते हुए फिर एवरेस्ट की तरफ पहुंच बनाई जाती है। इस पूरी प्रक्रिया में आपके साथ गाइड्स प्रेजेंट होते हैं जिन्हें शेरपा कहा जाता है।
जैसे-जैसे आप ऊंचाई पर चलते चले जाते हैं, तो माना जाता है कि लगभग 163 मीटर ऊपर चलने पर 1 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान कम होने लगता है। वहां ऑलरेडी बर्फ की स्थिति दिखाई देने लगती है और ठंड बढ़ने लगती है।
ऊंचाई पर हवा विरल यानी डाइल्यूट हो जाती है और ऑक्सीजन कम होने लगती है। एक्सपेक्टेड होता है कि ऊपर तक पहुंचते-पहुंचते 1/3 ऑक्सीजन कम हो जाएगी।
ऑक्सीजन सरफेस पर सबसे अधिक होती है और हाइट पर पहुंचते-पहुंचते यह कम होने लगती है। इसीलिए इस पूरी प्रक्रिया में 2 महीने से अधिक का समय लगता है।
पर्वतारोहियों को पहले अक्लमेटाइज किया जाता है ताकि वो किसी प्रकार की गलती का शिकार ना हो जाएं या बीमार ना हो जाएं। उन्हें हाइपोक्सिया यानी ऑक्सीजन की कमी से बचाने के लिए प्रैक्टिस कराई जाती है।
कम ऑक्सीजन में भी शरीर काम चला ले, इसके लिए उन्हें बेस कैंप पर रखकर एक्सरसाइज कराई जाती है। जब सांस फूलने लगती है तो व्यक्ति को लगता है कि वह बीमार हो जाएगा।
पर्वतारोही के लिए सबसे बड़ी चुनौती ऑक्सीजन की कमी का सामना करना है। जब वो ऊपर होता है तो उसके साथ गैस सिलिंडर्स भी उपलब्ध कराए जाते हैं।
लेकिन फिर भी अगर आपको अंदर से यह फील हो रहा हो कि सांस अंदर नहीं जा रही, तो इसके पीछे कोई और कारण भी हो सकता है। यहीं से शुरू होता है बेकिंग सोडा का घिनौना खेल।
बेकिंग सोडा: कृत्रिम बीमारी पैदा करने का तरीका
रीज़न हो सकता है कि आपको कोई गैस्ट्रिक प्रॉब्लम हो जाए। आपको कुछ ऐसा खिला दिया जाए जिससे आपको सांस लेने में दिक्कत आए।
यह काम कुछ शेरपाओं और टूर गाइड्स के द्वारा उन लोगों के साथ किया गया जो पर्वत पर चढ़ रहे थे। उनके भोजन में बेकिंग सोडा डाल दिया गया।
बेकिंग सोडा सामान्यतः खाने को फुलाने के लिए इस्तेमाल होता है। जब इसे भोजन में डाल दिया जाता है, तो वह व्यक्ति के पेट में आफरा जैसा फील कराता है।
व्यक्ति को एहसास होता है कि पेट भरा हुआ है और धीरे-धीरे उसे लगता है कि अब सांस नहीं आएगी। सांस की यह स्थिति जब बिगड़ती है तो उसे लगता है कि स्थितियाँ कंट्रोल से बाहर हैं।
ऐसी स्थिति में पर्वतारोही कहता है कि "मुझे बचा लिया जाए। बस इसी बचाने के नाम पर यहां बड़ा खेल खेला जाता है।
जो लोग बीमार फील कर रहे हैं, उन्हें हेलीकॉप्टर के जरिए रेस्क्यू करके वापस बेस कैंप या अस्पताल तक लाया जाता है। आप अक्सर हेलीकॉप्टर के साथ किसी व्यक्ति को लटके हुए रेस्क्यू होते देखते होंगे।
इन्हें उस हाइट से लाया जाता है जहां से फिर इन्हें अस्पताल पहुंचाया जा सके। यह केवल रेस्क्यू हेलीकॉप्टर नहीं है, बल्कि एक इमरजेंसी एंबुलेंस सेवा के रूप में दिखाया जाता है।
इसका अर्थ यह है कि यह आपका जीवन बचाने आया है, इसलिए यह अस्पताल की सेवाओं में शामिल हो जाता है। अस्पताल ने आपको बचाया और फिर आपका भारी-भरकम बिल बनाया।
बीमा कंपनियों के साथ करोड़ों की धोखाधड़ी
अस्पताल चेकअप करके बताता है कि आप बहुत बीमार हैं और इलाज में बहुत पैसा लगेगा। इसमें टूर गाइड से लेकर अस्पताल के कर्मचारी और रेस्क्यू करने वाले लोग सब शामिल होते हैं।
पैसा कौन देता है? टेक्निकली तो पैसा देने वाला टूरिस्ट ही है, लेकिन पर्वतारोही पहले से बीमा (Insurance) करा के जाते हैं।
अगर इलाज महंगा पड़ा, मान लीजिए $1 लाख का बिल बना, तो बीमा कंपनियां उसका भुगतान करती हैं। अस्पताल वाले जानबूझकर भारी-भरकम बिल बनाते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि इंश्योरेंस कंपनी पैसा देगी।
उस पैसे को फिर 20% गाइड को, कुछ कंपनियों को, कुछ रेस्क्यू टीम को और कुछ अस्पतालों को बांट दिया जाता है। इस तरह से यह एक पूरा रैकेट बन चुका है।
नेपाल में सालाना लगभग 1.19 मिलियन टूरिस्ट आते हैं। उनमें से पहाड़ों पर लगभग 60 हजार टूरिस्ट हाइट पर जाना चाहते हैं।
उनमें से लगभग 600 ही टॉप तक पहुंच पाते हैं और बाकी के साथ इस प्रकार का खेल होने की संभावना बनी रहती है। रेस्क्यू के नाम पर बड़ी-बड़ी कंपनियां करोड़ों कमा रही हैं।
अस्पताल वालों ने यह तक तरीका अपना रखा है कि एक ही हेलीकॉप्टर में चार लोगों को लाए और बिल चार अलग-अलग ट्रिप का बना दिया। जब यह बात इंटरनेशनल मेडिकल असिस्टेंस कंपनीज को पता चली, तब जांच शुरू हुई।
2018 में यह मामला पहली बार उजागर हुआ था और 2019 में इसकी गहराई से जांच की गई। जांच में समझ में आया कि शुरुआती दौर में ही 171 मामले पूरी तरह से फर्जी थे।
इसी को लेकर बीमा कंपनियों ने नेपाल जाने वाले यात्रियों के बीमा करने से इंकार करना शुरू कर दिया। फिलहाल नेपाल सरकार भी चेती है और इस तरह की गतिविधियों में शामिल लोगों पर एक्शन लेना शुरू किया है।
अगर कोई भी व्यक्ति इस तरह की ट्रैकिंग में जा रहा हो, तो उसे इस स्कैम के बारे में समझाना बहुत जरूरी है। एडवेंचर पर जब ऐसी धोखाधड़ी सुनने को मिलती है, तो यह पर्वतारोहियों के हौसलों के लिए एक बड़ी चुनौती बन जाती है।