- बाजार की गिरावट और सोने का रहस्यमयी व्यवहार
- डॉलर की मजबूती और सोने का दबाव
- केंद्रीय बैंकों द्वारा सोने की भारी बिकवाली
दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था में एक ऐसा मोड़ आया जिसने निवेशकों की नींद उड़ा दी है। Donald Trump ने हाल ही में दुनिया को अमेरिका के बहाने संबोधित करते हुए एक बहुत ही कड़ा बयान दिया है।
उन्होंने साफ लफ्जों में कहा कि वे ईरान को मिट्टी में मिला देंगे यानी उसे 'स्ट्रांग एज' तक पहुंचा देंगे। ट्रंप का यह राष्ट्र के नाम संबोधन होते ही दुनिया भर के बाजारों में हड़कंप मच गया और वे धड़ाम से नीचे गिर गए।
जब अमेरिका के राष्ट्रपति ने दुनिया के सामने अमेरिकियों को संबोधित किया, तो वह केवल एक भाषण नहीं था। वे सही मायने में पूरी दुनिया को सूचित कर रहे थे कि उनका विज़न अगले दो हफ्तों तक शांति रखने का बिल्कुल नहीं है।
इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले समय में भी हमले जारी रहेंगे और युद्ध की स्थिति बनी रहेगी। ईरान ने पहले ही स्पष्ट कर रखा है कि अगर उस पर हमले होते हैं, तो वह Strait of Hormuz (हॉर्मोस जलडमरूमध्य) को बंद कर देगा।
अब तक दुनिया यह समझ चुकी है कि अगर स्टेट ऑफ हॉर्मोस बंद होता है, तो वैश्विक तेल की सप्लाई पूरी तरह प्रभावित हो जाएगी। सप्लाई बाधित होने का सीधा अर्थ है महंगाई का बढ़ना, जिसका सीधा असर शेयर बाजार पर पड़ता है।
जैसे ही ट्रंप ने यह कड़ा रुख अपनाया, अमेरिका का S&P 500 इंडेक्स नीचे गिर गया। यहां तक कि Bitcoin के भाव में भी भारी गिरावट देखी गई, क्योंकि अनिश्चितता के माहौल में रिस्की एसेट्स से पैसा बाहर निकलने लगा।
बाजार की गिरावट और सोने का रहस्यमयी व्यवहार
आमतौर पर जब भी युद्ध या भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है, तो सोने के भाव आसमान छूने लगते हैं। तेल की सप्लाई बाधित होने पर तेल महंगा होता है और लोग सुरक्षित निवेश के लिए गोल्ड की ओर भागते हैं।
लेकिन इस बार कहानी थोड़ी अलग और चौंकाने वाली रही है। ट्रंप के आदेश और युद्ध की धमकियों के बावजूद Gold Prices नीचे आ गए हैं।
यह एक ऐसी घटना है जिसने अनुभवी निवेशकों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। सामान्यतः गोल्ड को 'सेफ हेवन' माना जाता है, लेकिन इस बार बाजार के साथ-साथ गोल्ड भी नीचे गिर गया।
आज के इस दौर में बाजार ने रूस और तुर्की द्वारा अत्यधिक सोना बेचने की खबर को भी पचा लिया है। यह एक बहुत ही रणनीतिक बदलाव है जो वैश्विक बाजार में देखने को मिल रहा है।
इतिहास गवाह है कि जब-जब खाड़ी देशों में झगड़ा हुआ है, सोने की कीमतों में भारी इजाफा हुआ है। लेकिन पिछले 17 सालों में पहली बार ऐसा हुआ है कि युद्ध के माहौल के बीच सोने की दरों में इतनी बड़ी गिरावट देखी गई।
मार्च के महीने में सोने की कीमतों में जो गिरावट दर्ज हुई है, वैसी स्थिति आखिरी बार 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान देखी गई थी। आखिर क्या कारण है कि सोना अचानक इतना सस्ता होने लगा है?
इन कारणों को समझना आज के समय में हर छोटे-बड़े निवेशक के लिए बेहद जरूरी हो गया है। अंततः हम सबके दिमाग में एक ही प्रश्न आता है - क्या अब सोना खरीद लेना चाहिए?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अप्रैल की शुरुआत में लोगों की सैलरी आती है। जो लोग SIP (Systematic Investment Plan) के जरिए निवेश करते हैं, वे अब दुविधा में हैं।
जहां कुछ समय पहले सोना ₹1,80,000 प्रति 10 ग्राम के आसपास की चर्चाओं में था, वहां अब भारी गिरावट देखी जा रही है। निवेशक इस बात को लेकर उलझन में है कि वह अभी खरीदारी करे या भाव और नीचे जाने का इंतजार करे।
निवेशक अक्सर इसी आशंका में अटका रहता है कि माल और सस्ता होगा या फिर यह मौका हाथ से निकल जाएगा। आइए समझते हैं उन ठोस कारणों को जिनके कारण सोने के भाव इस तरह गिर रहे हैं।
डॉलर की मजबूती और सोने का दबाव
ट्रंप के संबोधन के तुरंत बाद भारतीय बाजार के Nifty और Sensex में लगभग 2% की गिरावट देखी गई। वहीं जापान के बाजार में तो 2.5% तक की बड़ी गिरावट दर्ज की गई।
एशियाई बाजारों से लेकर अमेरिकी बाजारों तक, गिरावट का सिलसिला हर तरफ दिखाई दिया। 2 अप्रैल के दिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने के भाव में प्रति औंस के हिसाब से लगभग 3.5% की कमी आई।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना 'औंस' (Ounce) में बिकता है, जो लगभग 28 ग्राम के बराबर होता है। भारत में हम इसे 10 ग्राम या 'तोला' के हिसाब से देखते हैं, लेकिन वैश्विक भाव डॉलर में तय होते हैं।
यही सबसे बड़ा कारण है सोने के भाव गिरने का, जिसे समझना जरूरी है। जब तेल महंगा होता है, तो दुनिया भर के देशों को तेल खरीदने के लिए US Dollar की अधिक जरूरत पड़ती है।
महंगा तेल खरीदने के लिए देशों को अपने विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Reserve) से ज्यादा डॉलर निकालने पड़ते हैं। जब डॉलर की डिमांड बढ़ती है, तो वह अन्य मुद्राओं के मुकाबले मजबूत होने लगता है।
डॉलर के मुकाबले रुपया और अन्य करेंसी कमजोर होने लगती हैं, जिससे डॉलर खुद एक कीमती वस्तु (Commodity) बन जाता है। लोगों को लगता है कि सोना खरीदने से बेहतर डॉलर में निवेश करना है।
जब डॉलर महंगा हो जाता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की खरीदारी कम हो जाती है। चूंकि सोना डॉलर में खरीदा जाता है, इसलिए डॉलर महंगा होने पर गोल्ड की मांग में कमी आने लगती है।
यही वजह है कि 2 अप्रैल को सोने के साथ-साथ चांदी में भी भारी गिरावट देखी गई। चांदी की कीमतों में 6% की गिरावट आई और यह $70 प्रति औंस के स्तर पर पहुंच गई।
केंद्रीय बैंकों द्वारा सोने की भारी बिकवाली
सोने के भाव गिरने के पीछे एक और बड़ा कारण है—दुनिया के केंद्रीय बैंकों (Central Banks) की रणनीति। हम अक्सर सुनते हैं कि बैंकों द्वारा सोना खरीदने से कीमतें बढ़ती हैं।
लेकिन पिछले कुछ समय से इसका उल्टा हो रहा है। युद्ध के कारण कई देशों की करेंसी जैसे तुर्की की 'लीरा' और रूस की 'रूबल' डॉलर के सामने बुरी तरह गिर रही हैं।
जब किसी देश की मुद्रा गिरती है, तो उसे अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए डॉलर की जरूरत होती है। डॉलर हासिल करने का सबसे तेज तरीका है अपने पास रखे सोने के भंडार को बेचना।
Turkey (तुर्की) ने पिछले 14 दिनों के भीतर ही लगभग 58 टन सोना बेच दिया है। ऐसा करके उसने बाजार से 8 बिलियन डॉलर जुटाए हैं ताकि अपनी गिरती मुद्रा को संभाल सके।
रूस ने भी कुछ ऐसा ही किया है। रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते उस पर भारी आर्थिक दबाव है, जिसके कारण उसने 25 साल में सबसे ज्यादा सोना इस साल बेचा है।
रूस ने जनवरी और फरवरी के महीनों में करीब 14 टन सोना अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेच दिया। 2002 के बाद रूस द्वारा की गई यह सोने की सबसे बड़ी बिक्री मानी जा रही है।
जब इतने बड़े देश एक साथ भारी मात्रा में सोना बाजार में उतारते हैं, तो सप्लाई अचानक बढ़ जाती है। मांग के मुकाबले सप्लाई ज्यादा होने के कारण कीमतों का गिरना स्वाभाविक है।
भारत के पास भी लगभग 880 टन सोने का भंडार रिजर्व बैंक के पास है। हालांकि भारतीयों के घरों में बहुत सोना है, लेकिन वह अंतरराष्ट्रीय व्यापार में उपयोग नहीं होता; केवल रिजर्व बैंक का सोना ही बाजार को प्रभावित करता है।
रूस और तुर्की जैसे देशों के लिए गोल्ड उनके बुरे वक्त का सबसे बड़ा साथी साबित हुआ है। उन्होंने सोना बेचकर डॉलर कमाया और अपनी युद्ध की जरूरतों व अर्थव्यवस्था को संभाला।
क्या यह सोना खरीदने का सही समय है?
अब सवाल उठता है कि एक आम निवेशक के लिए इस स्थिति का क्या मतलब है? बाजार में जब भी इस तरह का 'डिप' (गिरावट) आता है, तो इसे निवेश का एक अवसर माना जाता है।
लॉन्ग टर्म निवेशकों के लिए यह स्थिति अक्सर फायदेमंद साबित होती है। जो लोग इंट्राडे या शॉर्ट टर्म ट्रेडिंग करते हैं, उनके लिए जोखिम ज्यादा हो सकता है, लेकिन लंबी अवधि के लिए सोना हमेशा सुरक्षित रहा है।
इतिहास बताता है कि जब आप सोचते हैं कि सोना और सस्ता होगा, तब वह अचानक रिकवर कर जाता है। Goldman Sachs जैसी दिग्गज कंपनियां मानती हैं कि साल के अंत तक सोना $5400 प्रति औंस तक जा सकता है।
आज के समय में निवेश के तरीके भी बदल गए हैं। अब आपको फिजिकल गोल्ड खरीदने के लिए ज्वेलरी शॉप पर जाकर मेकिंग चार्ज या जीएसटी देने की जरूरत नहीं है।
Digital Gold और गोल्ड म्यूचुअल फंड्स एक बेहतर विकल्प बनकर उभरे हैं। इसमें आप मात्र ₹100 से भी निवेश शुरू कर सकते हैं और आपको सुरक्षा की भी चिंता नहीं रहती।
म्यूचुअल फंड के जरिए आप गोल्ड और सिल्वर के बास्केट में निवेश कर सकते हैं जो पूरी तरह से सेबी (SEBI) द्वारा रेगुलेटेड होते हैं। इसमें कोई हिडन चार्ज नहीं होता और लिक्विडिटी भी बनी रहती है।
फिजिकल गोल्ड के मुकाबले डिजिटल निवेश में पारदर्शिता ज्यादा होती है। आप जब चाहें अपने निवेश को ट्रैक कर सकते हैं और मौजूदा बाजार भाव पर उसे बेच सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि सोने में निवेश करने का सबसे अच्छा समय कल था, और दूसरा सबसे अच्छा समय आज है। हालांकि, बाजार के जोखिमों को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए।
ट्रंप के बयानों और युद्ध की स्थितियों ने बाजार में जो अस्थिरता पैदा की है, वह कुछ समय और बनी रह सकती है। डॉलर की मजबूती सोने पर दबाव बनाए रखेगी, लेकिन यह स्थिति हमेशा के लिए नहीं है।
जैसे ही केंद्रीय बैंकों की बिकवाली रुकेगी और डॉलर की मांग स्थिर होगी, सोने के भाव फिर से चढ़ने की उम्मीद है। इसलिए, यदि आप एक लॉन्ग टर्म इन्वेस्टर हैं, तो इस गिरावट को एक अवसर के रूप में देख सकते हैं।
निवेश करने से पहले हमेशा अपने वित्तीय सलाहकार से चर्चा जरूर करें। क्योंकि म्यूचुअल फंड और बाजार से जुड़े निवेश हमेशा जोखिम के अधीन होते हैं।
अंत में, भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक डेटा ही सोने की अगली दिशा तय करेंगे। ट्रंप के आने वाले हफ्तों के कदम इस बात की पुष्टि करेंगे कि बाजार और कितनी गहराई तक गिरेगा।
फिलहाल, नजरें डॉलर इंडेक्स और वैश्विक तेल आपूर्ति पर रहनी चाहिए। बाजार की यह हलचल हमें सिखाती है कि वैश्विक घटनाएं किस तरह हमारी जेब और निवेश पर सीधा असर डालती हैं।