- पावर का पागलपन या सोची-समझी रणनीति?
- युद्ध के इतिहास से दी अपनी दलील
- स्टेट ऑफ हॉर्मुज और तेल का संकट
डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में राष्ट्र को संबोधित करते हुए एक ऐसा संदेश दिया है जिसने न केवल अमेरिका बल्कि पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है। ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे इस तनावपूर्ण युद्ध को 33 दिन बीत चुके हैं, लेकिन ट्रंप के तेवरों से साफ है कि यह संघर्ष अभी रुकने वाला नहीं है।
ट्रंप ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यह युद्ध तब तक चलेगा जब तक ईरान को मिट्टी में नहीं मिला दिया जाता। उन्होंने कहा कि ईरान के ऊपर अब खतरे के ऐसे बादल मंडराएंगे जो उसे सीधे पाषाण युग (Stone Age) में ले जाएंगे।
इस संबोधन के खत्म होते ही वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका तात्कालिक असर देखने को मिला। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल यानी Oil Prices में भारी उछाल आया है और शेयर बाजार धड़ाम से गिर गए हैं।
हैरानी की बात यह है कि दुनिया भर के बड़े नेताओं को शायद इस स्थिति का आभास पहले ही हो गया था। यही कारण है कि भारत में CCS (Cabinet Committee on Security) की इमरजेंसी मीटिंग बुलाई गई और ऑस्ट्रेलिया, यूके व यूरोपीय संघ ने पहले ही अपनी तैयारियों का एलान कर दिया था।
पावर का पागलपन या सोची-समझी रणनीति?
ट्रंप के इस बयान का गहरा मतलब निकाला जा रहा है। उन्होंने संकेत दिया है कि अगले दो हफ्तों के भीतर वे ईरान का बहुत कुछ बिगाड़ने की योजना बना चुके हैं।
सवाल यह उठता है कि क्या ट्रंप अपनी शक्ति के मद में दुनिया के लिए किसी बड़े कहर की प्लानिंग कर रहे हैं? ट्रंप का मानना है कि उन्होंने कूटनीति के माध्यम से ईरान की रेजीम बदलने की कोशिश की थी, लेकिन सफलता न मिलने पर अब सैन्य विकल्प ही एकमात्र रास्ता बचा है।
ट्रंप ने अपनी उपलब्धियां गिनाते हुए कहा कि उनके कार्यकाल में अमेरिकी दुश्मन हार रहे हैं और अमेरिका की जीत हो रही है। उन्होंने ईरान के न्यूक्लियर वेपन प्रोग्राम को विफल करने का दावा भी किया है।
उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि दुनिया सालों से कहती आ रही थी कि ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं होने चाहिए, लेकिन अंत में वे केवल शब्द बनकर रह गए। ट्रंप का तर्क है कि जब समय आए तब एक्शन लेना जरूरी होता है, जो उन्होंने लिया है।
द्ध के इतिहास से दी अपनी दलील
ट्रंप ने राष्ट्र के नाम संबोधन में यह भी स्पष्ट किया कि वे ईरान को जल्द क्यों नहीं छोड़ रहे हैं। उन्होंने इतिहास के पन्नों को पलटते हुए अमेरिका द्वारा लड़े गए पिछले युद्धों की समय सीमा गिनाई।
उन्होंने बताया कि अमेरिका ने प्रथम विश्व युद्ध में 1 साल 7 महीने, द्वितीय विश्व युद्ध में 3 साल 8 महीने और वियतनाम युद्ध में करीब 19 साल से अधिक का समय बिताया था।
ट्रंप का तर्क था कि जब अमेरिका ने इराक में 8 साल युद्ध लड़ा, तो लोग मात्र 32-33 दिनों में ही क्यों थक रहे हैं? उन्होंने अपनी 'इनोसेंस' जताते हुए कहा कि वे पिछले राष्ट्रपतियों की तुलना में बहुत छोटा युद्ध लड़ रहे हैं।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि कोई डील नहीं होती है, तो वे ईरान के जनरेटिंग प्लांट्स और बुनियादी ढांचे को एक-एक करके निशाना बनाएंगे। उनके पास मिलिट्री फोर्स के रूप में असीम ताकत है।
स्टेट ऑफ हॉर्मुज और तेल का संकट
स्टेट ऑफ हॉर्मुज (Strait of Hormuz) पर ट्रंप का रुख पूरी तरह से बदल चुका है। पहले उन्होंने कहा था कि जहाजों की सुरक्षा अमेरिका करेगा, लेकिन अब वे अपने बयान से पलट गए हैं।
उन्होंने दुनिया के उन देशों को साफ कह दिया जिन्हें तेल की जरूरत है कि वे खुद जाकर अपनी सुरक्षा करें। ट्रंप ने कहा, "हम आपकी मदद नहीं करेंगे, जाइए स्टेट में जाइए और तेल लीजिए, हमसे उम्मीद मत रखिए।"
ट्रंप अच्छी तरह जानते हैं कि अगर ईरान जवाबी कार्रवाई करता है, तो हॉर्मुज से तेल की सप्लाई बाधित होगी। इससे पूरी दुनिया में हाहाकार मचेगा, लेकिन फिर भी कोई देश अमेरिका की निंदा करने की स्थिति में नहीं होगा।
ट्रंप ने सहयोगियों जैसे इजराइल, सऊदी अरब, कतर, यूएई और कुवैत को धन्यवाद तो दिया, लेकिन उनकी सुरक्षा की गारंटी पर अब संशय बना हुआ है। उन्होंने साफ कहा कि जब कॉन्फ्लिक्ट खत्म होगा, तभी हॉर्मुज का रास्ता खुलेगा।
वैश्विक नेताओं का मजाक और नाटो को चेतावनी
अपने संबोधन के दौरान ट्रंप ने अंतरराष्ट्रीय स्तर के नेताओं का मजाक उड़ाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुअल मैक्रोन पर विवादित टिप्पणी की।
उन्होंने मैक्रोन की अपनी पत्नी से कथित पिटाई वाले वायरल वीडियो का जिक्र करते हुए कहा कि मैक्रोन अभी उस सदमे से बाहर नहीं निकल पाए हैं। यह टिप्पणी वैश्विक कूटनीति में बेहद अपमानजनक मानी जा रही है।
इतना ही नहीं, उन्होंने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर को भी आड़े हाथों लिया। ट्रंप के अनुसार, जब उन्होंने स्टारमर से साथ चलने को कहा, तो उन्होंने जवाब दिया कि उन्हें लोगों से पूछना पड़ेगा।
ट्रंप ने NATO को 'कागज का शेर' करार दिया और अमेरिका द्वारा नाटो छोड़ने की धमकी भी दे डाली। उन्होंने कहा कि अमेरिका को ऐसे संगठनों की जरूरत नहीं है जो वक्त आने पर साथ न खड़े हो सकें।
यूक्रेन की मदद से हाथ पीछे खींचे
ट्रंप ने जो बाइडन प्रशासन पर निशाना साधते हुए उन्हें 'पागल' करार दिया। उन्होंने कहा कि पिछले प्रशासन ने यूक्रेन को 350 बिलियन डॉलर के हथियार बेचे, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला।
उन्होंने साफ कर दिया कि अब वे यूक्रेन की रक्षा के लिए अमेरिकी संसाधन बर्बाद नहीं करेंगे। उनका तर्क है कि यूक्रेन को बचाकर वे केवल यूरोप की रक्षा कर रहे हैं और जब यूरोप उनके साथ नहीं है, तो वे भी पीछे हट रहे हैं।
ट्रंप के इस बयान ने रशिया को एक तरह से खुला निमंत्रण दे दिया है कि वह जो चाहे एक्शन ले सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब यूक्रेन को बचाने की जिम्मेदारी उनकी नहीं है।
संबोधन के दौरान उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के साथ भी ट्रंप ने मजाकिया स्वर में कहा कि अगर ईरान के साथ डील फेल होती है तो जिम्मेदारी वेंस की होगी, और अगर सफल होती है तो सारा क्रेडिट उनका होगा।
युद्ध बनाम अंतरिक्ष की दौड़
एक तरफ जहां दुनिया ट्रंप के फैसलों से महंगाई और युद्ध के डर में जी रही है, वहीं अमेरिका एक अलग ही दिशा में बढ़ रहा है। अमेरिका ने 54 साल बाद चंद्रमा पर इंसान उतारने के लिए मिशन आर्टेमिस (Mission Artemis) लॉन्च कर दिया है।
यह विरोधाभास हैरान करने वाला है कि अमेरिका एक तरफ युद्ध लड़ रहा है और दूसरी तरफ चंद्रमा की यात्रा कर रहा है। ट्रंप के लिए युद्ध एक 'पार्ट-टाइम एक्टिविटी' जैसा प्रतीत हो रहा है।
रक्षा मंत्री पीट हेग्सेथ ने भी ट्रंप के सुर में सुर मिलाते हुए ट्वीट किया- "Back to Stone Age"। इसका सीधा मतलब है कि ईरान के खिलाफ हमले अभी और तेज होंगे और अगले दो-तीन हफ्ते निर्णायक होने वाले हैं।
इतिहास के अनुसार स्टोन एज वह दौर था जब मनुष्य पत्थरों पर निर्भर था। ईरान को उस स्थिति में पहुंचाने का मतलब है उसकी पूरी आधुनिक व्यवस्था, बिजली, पानी और इंटरनेट को पूरी तरह नष्ट कर देना।
बाजार में कोहराम और जमीनी हकीकत
ट्रंप के इस भाषण का असर वैश्विक शेयर बाजारों पर तत्काल पड़ा। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) खुलते ही 412 अंक गिर गया और Nifty 50 में 118 अंकों की गिरावट दर्ज की गई।
चीन और हांगकांग के बाजार भी लाल निशान पर बंद हुए। तेल की कीमतों में अनिश्चितता की वजह से पूरी दुनिया में महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है।
जमीनी स्तर पर खबरें आ रही हैं कि ईरान के इशफहान (Isfahan) मिसाइल बेस पर बड़ा हमला हुआ है। वहीं दूसरी ओर, ईरान द्वारा अबू धाबी पर हमले की भी अपुष्ट खबरें मीडिया में चल रही हैं।
ईरान के राष्ट्रपति ने अमेरिकी जनता को पत्र लिखकर कहा है कि यह युद्ध केवल इजराइल के प्रभाव में लड़ा जा रहा है। ईरान का दावा है कि वह केवल आत्मरक्षा में कदम उठा रहा है और अमेरिका उसे जानबूझकर उकसा रहा है।
रणनीति विहीन युद्ध या ब्लाइंड फ्यूरी?
प्रतिष्ठित मैगजीन 'The Economist' ने ट्रंप के इस रवैये को "Blind Fury" (अंधा गुस्सा) करार दिया है। मैगज़ीन के कवर पेज पर इसे "A War Without Strategy" बताया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की इस आक्रामकता का सबसे बड़ा फायदा चीन को होने वाला है। जब अमेरिका और ईरान आपस में उलझे होंगे, तब चीन शांति का चेहरा बनकर दुनिया का भरोसा जीत सकता है।
यूनाइटेड किंगडम ने अब 35 देशों को न्यौता भेजा है ताकि युद्ध के बिना स्टेट ऑफ हॉर्मुज को खुलवाया जा सके। वहीं नाटो प्रमुख भी अगले हफ्ते ट्रंप से मिलने जाने वाले हैं ताकि गठबंधन को टूटने से बचाया जा सके।
फिलहाल स्थितियाँ बेहद नाजुक हैं। ट्रंप की 'पगलाए' हुए व्यवहार वाली थ्योरी, जिसमें वे एक हाथ से मारते हैं और दूसरे से पुचकारते हैं, पूरी दुनिया के लिए एक पहेली बन गई है। ईरान का भविष्य और वैश्विक शांति अब इन आने वाले दो-तीन हफ्तों पर टिकी हैं।