- Toyota: विश्वसनीयता का पर्याय
- चीन का बढ़ता प्रभाव: एक गंभीर चुनौती
- हाइब्रिड से इलेक्ट्रिक तक: Toyota की दुविधा
अगर चीजें नहीं बदलीं, तो हम नहीं बचेंगे। ये किसी संघर्षरत स्टार्टअप के सीईओ ने नहीं, बल्कि Toyota के सीईओ ने कहा है, जो कि कार बिक्री के मामले में दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी है।
दुनिया में सबसे ज्यादा बिकने वाली गाड़ियों में सबसे ऊपर Toyota की ही गाड़ी है, और Toyota को विश्वसनीयता (Reliability) का दूसरा नाम भी बोलते हैं। तो अचानक से सीईओ ऐसा क्यों बोल रहे हैं कि हम नहीं बचेंगे? क्या यह कोई पीआर स्टंट है, या फिर असल में ही कंपनी की हालत बहुत ज्यादा खराब है?
Toyota: विश्वसनीयता का पर्याय
पहले समझते हैं Toyota क्या है और यह कितना बड़ा है। Toyota वो कंपनी है जिसने दुनिया को भरोसेमंद (Reliable) कार का मतलब सिखाया है।
जब भी कोई पूछता है कि भाई, ऐसी गाड़ी बताओ जो 15 साल से भी ज्यादा चले, तो सबका जवाब हमेशा होता है, "Toyota ले ले"। भारत में, Innova प्रेमियों की पहली और एकमात्र पसंद है, और Fortuner तो ऐसी गाड़ी है कि जब कोई नया-नया अमीर होता है, तो सबसे पहले इसी को खरीदता है।
विश्व स्तर पर, Toyota ने पिछले साल 11.1 मिलियन कारें बेचीं। कोई भी प्रतियोगी (Competitor) इसके आसपास नहीं है, और पिछले 10 सालों से यह नंबर एक या नंबर दो की पोजीशन पर बनी हुई है। तो फिर डर किस बात का है?
चीन का बढ़ता प्रभाव: एक गंभीर चुनौती
इसको जानने के लिए, हमें पहले चीन जाना पड़ेगा और फिर Toyota की फैक्ट्री में जाना पड़ेगा। एक समय था जब चीन के अंदर Toyota का 20% मार्केट शेयर था।
यानी, चीन में अगर कोई पांच गाड़ियां बिक रही हैं, तो उनमें से एक तो Toyota की ही होगी। लेकिन आज, Toyota, Nissan, और Honda तीनों का मिलाकर मार्केट शेयर 9% से भी कम हो गया है।
यहां तक कि पिछले साल के मुकाबले Toyota की ग्रोथ भी नगण्य (Nil) रही है। 0.23% की ग्रोथ दिखाई गई है, जबकि BYD जैसी कंपनियां अक्सर डबल-डिजिट ग्रोथ के साथ आगे बढ़ रही हैं।
अब एक जरूरी चीज यहां पर समझ लें। Toyota की समस्या यह नहीं है कि वे इलेक्ट्रिक वाहन (EV) नहीं बना रहे हैं। मुख्य समस्या यहां speed की है।
जापानी कंपनियां अपने अनुशासन, गुणवत्ता और पूर्णता (Perfection) के लिए जानी जाती हैं। लेकिन इन्हीं खूबियों की वजह से Toyota जैसी कंपनी को एक नया कार मॉडल लाने में 4 से 5 साल लग जाते हैं, जबकि चीनी कंपनियां 1.5 से 2 साल में यह काम कर लेती हैं।
इसका मतलब है कि जितने समय में Toyota सोचता है कि हम एक नई गाड़ी लाएंगे, उतने में चीन के अंदर दो नए गाड़ियों के मॉडल लॉन्च हो चुके होते हैं।
इसे आप एक उदाहरण से भी समझ सकते हैं: एक व्यक्ति पिछले 2 साल से परीक्षा की तैयारी कर रहा है, और फिर एक नया व्यक्ति आता है जो सिर्फ 6 महीने की तैयारी से पुराने वाले व्यक्ति से ज्यादा अंक ले आता है।
समस्या तैयारी की नहीं, बल्कि system है; यही Toyota की असली दिक्कत है।
हाइब्रिड से इलेक्ट्रिक तक: Toyota की दुविधा
ऐसा नहीं है कि Toyota के पास इलेक्ट्रिक मोटर और बैटरी का कोई ज्ञान नहीं है। मैं आपको बता दूं, सबसे पहला हाइब्रिड सिस्टम Toyota ने ही बनाया था।
1997 में पहली गाड़ी आई थी इनकी Prius। और आज भी इनकी सबसे ज्यादा बिकने वाली कारें हाइब्रिड ही हैं। कुल मिलाकर, इन्होंने अब तक 27 मिलियन हाइब्रिड कारें बेची हैं और उनसे काफी मोटा मुनाफा भी कमाया है।
इसी मुनाफे के चक्कर में, इनसे एक बहुत बड़ी गलती हो जाती है: ये हाइब्रिड पर तो डबल डाउन (Double Down) खेल जाते हैं और इलेक्ट्रिक को सीधे नजरअंदाज कर देते हैं, और कहना गलत भी नहीं होगा कि वे इलेक्ट्रिक के सीधे खिलाफ हो जाते हैं।
2024 में, Toyota के चेयरमैन अकीओ टोयोटा ने बहुत बड़ी बात कही थी कि "आप जितना भी इलेक्ट्रिक कार को डेवलप कर लें, मुझे लगता है कि उनका मार्केट शेयर फिर भी 30% के आसपास ही होगा।" और यह बात बहुत वायरल भी हुई थी।
लेकिन आज, दुनिया की सबसे बड़ी कार मार्केट, चीन में, नई कारों के अंदर EV का मार्केट शेयर 50% से ज्यादा है।
गुणवत्ता का जुनून: सफलता या बाधा?
दूसरी समस्या इनकी अपनी गुणवत्ता है, लेकिन वही इनकी दुश्मन बन गई है। Toyota को के नाम से जाना जाता है, और इस विश्वसनीयता को वे अपनी EV में भी लाना चाहते हैं।
इनका सीधा लक्ष्य है: पहले प्रोडक्ट को बिल्कुल परफेक्ट करो, फिर उसे मार्केट में उतारो, उससे पहले कोई जोखिम मत लो। यही जापानी फिलॉसफी है।
जबकि Tesla और BYD इनके विपरीत चल रहे हैं। उन्होंने कहा कि भाई, पहले प्रोडक्ट लॉन्च करो, उसके बाद उसमें सुधार होता रहेगा। और बाजार ने भी इन्हें इस चीज के लिए पुरस्कृत किया है।
इस तरह का सीन हमने पहले भी देखा है। जब Nokia मार्केट लीडर हुआ करता था, तब Samsung और Apple Nokia से मुकाबला कर रहे थे। तो Nokia ने कहा कि भाई, यह जो Android है, इसे हम इस्तेमाल नहीं करेंगे। यह एक छोटे से बाजार के लिए लाया जा रहा है। हम तो Windows पर स्विच करेंगे।
और यही गलती उनकी आखिरी गलती साबित हुई, और Nokia आज मोबाइल में कहीं नहीं है। और सच कहूँ तो, Toyota भी मुझे आज उसी रास्ते पर नज़र आ रहा है।
सप्लायर समिट में हिला देने वाला बयान
सारी पोल-पट्टी कहां खुलती है? तो मार्च के महीने में, कंपनी के सीईओ कोजी सातो ने एक सप्लायर समिट में कुछ ऐसा कह दिया, जिससे वहां बैठे 484 कंपनियों से आए 700 एग्जीक्यूटिव के साथ पूरी दुनिया की ऑटोमोटिव इंडस्ट्री हिल गई।
उन्होंने कहा, "अगर चीजें नहीं बदलती हैं, तो हम नहीं बचेंगे। मैं चाहता हूं कि हम सब यह स्वीकार करें कि हम कितनी बड़ी मुसीबत में हैं। अभी हम ऑटोमोटिव इंडस्ट्री के अंदर खुद को जैसे-तैसे बचाने के लिए लड़ रहे हैं।"
यह कोई कंपनी की बोर्ड मीटिंग नहीं, बल्कि एक सप्लायर समिट था, जहां सीईओ ने 700 लोगों के सामने ये शब्द कहे, जिसका सीधा मतलब था कि कंपनी सीधे अपने पार्टनर्स को भी बताना चाह रही है कि वे खत्म भी हो सकते हैं, तैयार रहो।
उसके बाद एक और लाइन आई, जिस पर Toyota के प्रशंसक (Lovers) भी हैरान रह गए: "हम over-engineered हैं, और यही हमारी सबसे बड़ी प्रॉब्लम है।"
अब यह सुनने में आपको साधारण लग रहा होगा, लेकिन इसकी गहराई मैं आपको समझाता हूँ। Toyota हर महीने 10,000 वायर हार्नेस (जो वायरिंग सेट होता है) को स्क्रैप कर देता था। क्यों?
क्योंकि वायर हार्नेस, जो गाड़ी के अंदर होता है और जिसे ग्राहक कभी देखता भी नहीं है, उसकी कवरिंग का रंग मेल नहीं खा रहा है। वह पीले की बजाय थोड़ा डार्क पीला है, या उसमें 19-20 का अंतर है। इसके चलते वायर हार्नेस को सीधे रिजेक्ट कर दिया जाता था।
स्टीयरिंग व्हील पर जो मोल्डेड रेन (Resin) है, उसके अंदर एक माइक्रोस्कोपिक लेवल का रिंकल है, जिसे यूजर न तो कभी देख सकता है और न ही कभी महसूस कर सकता है – रिजेक्ट!
मैंने आपको ये दो केस उदाहरण के लिए बताए हैं। ऐसे बहुत सारे क्वालिटी स्टैंडर्ड हैं जिन्हें Toyota फॉलो करता है, जहाँ पार्ट की फंक्शनैलिटी में कोई दिक्कत नहीं आ रही है, वे 100% हैं। सुरक्षा (Safety) के मामले में भी वे 100% हैं, जीरो इशू है। लेकिन इतनी की वजह से उसे रिजेक्ट कर दिया जाए!
सोचिए, दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी एक पार्ट की कवरिंग के रंग को परफेक्ट करने में इतनी इन्वेस्टमेंट कर रही थी, वह भी हर महीने! अब ग्राहक के नजरिए से तो यह बहुत अच्छी बात हो जाती है। लोग कहेंगे कि "इसी को तो Toyota लीजेंडरी बनाते हैं! इनका क्वालिटी कंट्रोल तो नेक्स्ट लेवल है!"
अब यही बात कंपनी के सीईओ ने कही है कि हमारा यह क्वालिटी को लेकर जुनून अब हमारे लिए poison बन गया है।
इतनी अटेंशन टू डिटेल की वजह से पार्ट्स की बर्बादी बहुत ज्यादा हो जाती है, लागत बढ़ती है, उत्पादन भी धीमा होता है, और दक्षता (Efficiency) भी बाधित होती है।
और इसी चीज से निपटने के लिए, उन्होंने लॉन्च भी कर दिया है, जिसमें वे ओवरइंजीनियरिंग को कम करेंगे। अगर कोई पार्ट फंक्शन बिल्कुल सही कर रहा है, सुरक्षा में भी परफेक्ट है, उसका रंग 19-20 मैच नहीं हो रहा है, तो उसे स्वीकार किया जाएगा।
कुल मिलाकर, यहां क्वालिटी स्टैंडर्ड को थोड़ा ढीला किया जाएगा। Toyota के लिए यह सिर्फ एक ऑपरेशनल बदलाव नहीं है, बल्कि मैं कहूंगा एक स्पाइकोसगिक्ला क्रांति (Spicosagical Revolution) है, क्योंकि 50 सालों से चली आ रही उनकी सोच को भी तोड़ना पड़ेगा, और यह उनके लिए आसान बिल्कुल नहीं होगा।
गीगा कास्टिंग: भविष्य की ओर एक कदम
तो Toyota अब अपनी speed वाली problem को ठीक करने के लिए क्या करेगा? तो यह वहीं वापस चले गए हैं, जहां से Tesla ने अपनी शुरुआत की थी ।- गीगा कास्टिंग
गीगा कास्टिंग को अगर मैं कम शब्दों में बताऊं, तो यह कार बनाने के लिए अगली पीढ़ी की है। जैसे किसी खिलौने को बनाया जाता है ना, बड़े-बड़े पार्ट्स एक साथ जोड़ दिए जाते हैं, वही चीज अब हम असली कारों के साथ भी करते हैं।
बड़ी-बड़ी कास्टिंग मशीनों से हम इन सभी पार्टों को एक साथ जोड़ देते हैं, जिसके वजह से कार बनाना फास्टर, चीपर और स्ट्रॉन्ग (Stronger) भी होता है।
Toyota ने भी अपना गीगा कास्टिंग का एक डेमो दिखाया था 2023 में, जहां उन्होंने दावा किया था कि उनकी गाड़ी का जो रियर सेक्शन है, जिसमें 86 पार्ट होते हैं और 33 स्टेप होते हैं, वह घंटों में बनता है। वही रियर सेक्शन गीगा कास्टिंग से एक पार्ट में, एक स्टेप में, सिर्फ 3 मिनट में बन जाएगा!
और Toyota की मोटामाची फैक्ट्री (Motomachi Factory) के अंदर भी उन्होंने ऑटोमेशन को बढ़ाया है। कन्वेयर बेल्ट को खत्म करके, सिर्फ बैटरी, मोटर और व्हील के साथ गाड़ी खुद-ब-खुद बहुत धीमी गति पर आगे बढ़ती है, जहां उसे रोबोट द्वारा असेंबल किया जाता है।
और यह सिर्फ फैक्ट्री की बात नहीं है। कंपनी के नए सीईओ, जो 1 अप्रैल को ही बने हैं, उन्होंने साफ-साफ बोला है कि "सिर्फ एक ही तरीका है अब अपने लक्ष्य को हासिल करने का: हम अपनी कमज़ोर प्रतिस्पर्धी आधार (Weakened competitive foundation) को फिर से बनाएंगे और Toyota की ताकत को बहाल करेंगे।"
सोचने वाली बात है, "फाउंडेशन कमजोर हो गई है" - ये शब्द कंपनी के नए सीईओ बोल रहे हैं, जिसका मतलब है कि शीर्ष प्रबंधन (Top Management) स्वीकार कर रहा है कि फाउंडेशन अब कमजोर हो गई है।
कार बनाने की प्रक्रिया में, अगर आप Toyota को Tesla से कंपेयर करेंगे, तो Toyota बहुत पीछे नजर आएगा। Tesla ने 2020 में पार्शियली अपनी गीगा कास्टिंग चालू कर दी थी, 2023 में BYD ने बड़े पैमाने पर गीगा कास्टिंग चालू कर दी थी, और Toyota 2026 में अभी गीगा कास्टिंग चालू करेगा – और यह भी पक्का नहीं है कि कब से करेंगे।
तो कुल मिलाकर, Tesla के मुकाबले सीधा 6 साल पीछे हैं।
हाइड्रोजन और सॉलिड-स्टेट बैटरी: क्या ये बचा पाएंगे?
Toyota के प्रशंसक (Lovers) कुछ बातें करते हुए नज़र आते हैं कि Toyota जो है ना, हाइड्रोजन डेवलप कर रहा है, जो भाई EV को हमेशा के लिए खत्म कर देगा। प्लस EV के अंदर ये सॉलिड-स्टेट बैटरी बना रहे हैं, जिस दिन वो परफेक्ट हो जाएगी, फिर वे अपनी EV लेकर आएंगे और पूरे मार्केट को घेर लेंगे।
इन दोनों का भी सीन मैं आपको बताता हूँ। हाइड्रोजन कारें, Toyota 30 साल पहले से बना रहा है। इनकी सबसे ज्यादा प्रसिद्ध कार Mirai, जो हाइड्रोजन कार है, वह अब तक सिर्फ 28,000 यूनिट ही बेच पाई है, जिसमें सबसे ज्यादा बिक्री अमेरिका और जापान से आई है।
Toyota ने अपना लक्ष्य रखा था कि 2020 से वे हर साल 20,000 कारें बेचेंगे। और इस ग्राफ में आपको दिख रहा होगा कि 2021 में उन्होंने अपना पीक पकड़ा था, जहां उन्होंने लगभग 6,000 गाड़ियां बेची थीं।
लेकिन उसके बाद, उनका ग्राफ नीचे गिरता चला गया। 22, 23, 24 – यहाँ तक कि 2025 में भी उन्होंने सिर्फ 250 प्लस कारें बेची हैं। तो नंबर्स के हिसाब से तो इनकी हाइड्रोजन कार फेल हो गई है।
लेकिन फिर भी, Toyota अपने हाइड्रोजन सॉल्यूशन हब (Hydrogen Solution Hubs) पूरे विश्व में बना रहा है। अब या तो इसे दूरदर्शी (Visionary) कह लो, या फिर एक और denial कह लो।
हाइड्रोजन के बाद, इनका दूसरा पत्ता आता है – सॉलिड-स्टेट बैटरी। सॉलिड-स्टेट बैटरी को लेकर भी इन्होंने पिछले 8-10 सालों से हवा बनाई रखी है कि भाई, अगले साल लाएंगे। 2018 में इन्होंने बोल दिया था कि 2020 में दिखाएंगे। 2020 हो गया, 2023, फिर 25-26 हो गया।
और जो लेटेस्ट अपडेट आई है, उसके अनुसार 2027-28 में जाकर ये अपनी पहली सॉलिड-स्टेट बैटरी लाएंगे। यह डेट भी निश्चित नहीं है, हो सकता है कि यह भी भविष्य में जाकर एक्सटेंड हो जाए।
तो कुल मिलाकर, कुछ ठोस नजर नहीं आ रहा है। जहाँ BYD, Tesla, यहाँ तक कि Hyundai EV के अंदर इतना डेवलपमेंट दिखा रहे हैं, Toyota के पास कुछ तगड़ा यहाँ पर नहीं है।
यहाँ तक कि भारतीय कंपनियां (Indian Players) भी इतना तगड़ा कर रही हैं कि भाई, Toyota आपको बहुत ज्यादा पीछे नज़र आएगा। हाल ही में, इन्होंने अपनी Urban Cruiser E-BELLA को जनवरी 2026 में लॉन्च कर दिया था, जो कि असल में Maruti e-Vitara ही है, जिसका Toyota-ification कर दिया गया है। अंदर से वह e-Vitara ही है, और यहाँ भी रेंज 543 किलोमीटर की है।
लेकिन सरप्राइजिंगली, भारत के अंदर भी Toyota काफी underconfident महसूस हो रहा है। इन्हें कॉन्फिडेंस ही नहीं आ रहा है, क्योंकि इन्होंने 3 महीने बाद भी, इस गाड़ी की कीमत (Price) रिवील नहीं की है।
Toyota ने इससे पहले कभी ऐसा नहीं किया है, जबकि Tata, Mahindra, MG धड़ल्ले से अपनी इलेक्ट्रिक कारें बेच रहे हैं। Toyota से अपनी इलेक्ट्रिक कार की कीमतें सेट नहीं हो रही हैं।
निष्कर्ष: अपनी ही सफलता के बोझ तले दबी Toyota
तो कुल मिलाकर, सारांश (Summary) क्या है? देखो, Toyota एक ऐसी कंपनी है जो अपने ही बोझ तले दबी है। दशकों तक, जिन सिस्टम्स को उन्होंने उत्पादन (Production) के लिए बनाया था, वे आज भी उन्हीं को फॉलो कर रहे हैं।
ओवर-इंजीनियरिंग, धीमे चक्र (Slow Cycle), पूर्णता, क्वालिटी स्टैंडर्ड के पीछे का पागलपन, कंपनी को आज की दुनिया से बिल्कुल अलग कर रहा है, सीधा बोलूं तो पीछे कर रहा है।
लेकिन यह भी सच है कि इतनी संसाधनों वाली कंपनी है, ऐसा नहीं है कि कल को ही बंद हो जाएगी। कंपनी ने जो बातें कही हैं, वे असल में वास्तविक (Real) हैं। गीगा कास्टिंग वास्तविक है, यह जो बदलाव (Pivot) करेंगे, वह भी वास्तविक है, और इनकी जो eVX इलेक्ट्रिक कार है, वह भी वास्तविक है।
Toyota जो अपनी स्मार्ट स्टैंडर्ड एक्टिविटीज लागू करेगा, उसके बाद आपको देखने को मिलेगा कि इनकी गाड़ियों का उत्पादन बहुत तेज हो गया है, उनकी लागत कम हो गई है, प्रति गाड़ी इनका मुनाफा बढ़ गया है।
लेकिन गाड़ी की क्वालिटी पहले जैसी नहीं है। क्वालिटी स्टैंडर्ड भी डाउन हुए हैं। साथ में, Toyota की जो perfection image है ना, कि इनकी क्वालिटी बेहतरीन होती है, वह भी बाधित हो सकती है। लोगों के बीच में जो Toyota का नाम है, वह भी नीचे जा सकता है। तो risk यहां पर दोनों तरफ है।
भविष्य की राह: परिवर्तन और अनिश्चितता
अपना व्यक्तिगत मत (Personal Take) बताऊं ना, तो मुझे ऐसा लगता है कि Toyota ने यह पता लगाने में देरी तो कर दी है। लेकिन हाँ, कंपनी निश्चित रूप से ये बदलाव लाकर survive तो कर लेगी।
लेकिन Toyota का यह नया सर्वाइवल, या सर्वाइवल मोड, वह नहीं होगा जो आज से 5, 10, 15 साल पहले Toyota हुआ करता था। इनकी रैंकिंग है ना, वह निश्चित रूप से अब बदलने वाली है।
मेरे हिसाब से, जितने भी विकासशील देश हैं, चाहे वह दक्षिण पूर्व एशिया हो, अफ्रीका हो, कुछ हद तक भारत भी हो गया – यहां पर Toyota का ब्रांड भरोसा (Brand Trust) इतना गहरा है कि वह आसानी से नहीं जाएगा।
विकसित बाजारों (Developed Markets) जैसे कि यूरोप या चीन में, इनका शेयर अभी और भी नीचे जाएगा। वहां इन्हें बहुत ज्यादा संघर्ष करना पड़ेगा। वहां आप कह सकते हैं कि इनकी पोजिशनिंग ranking के तौर पर हो जाएगी, क्योंकि यह टेक्नोलॉजी के मामले में उनसे बहुत पीछे जा चुके हैं। वो कंपनियां अभी और भी आगे जाएंगी।
सवाल यही बनता है: क्या Toyota ने बहुत देर कर दी है? क्या Toyota 2030 तक, आज की अपनी पोजिशनिंग के साथ सर्वाइव कर पाएगा, या फिर यह दूसरा Nokia बन जाएगा?