- कलपक्कम में भारत का स्वदेशी चमत्कार
- नाभिकीय विज्ञान: कैसे बनता है ईंधन?
- दुनिया हैरान: भारत की सस्ती और सटीक तकनीक
भारत ने Nuclear Energy के सेक्टर में एक ऐसा कारनामा कर दिया है जो कि आने वाले समय में भारत के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा। हम परमाणु ऊर्जा की बात कर रहे हैं, परमाणु बम की नहीं।
इसका मतलब यह है कि हम अपने रिएक्टर्स का उपयोग बिल्कुल कंस्ट्रक्टिव तरीके से सिविलियन पर्पज यूजज़ में करते हुए परमाणु ईंधन का इस्तेमाल कर सकेंगे। इस तकनीक के माध्यम से हम भविष्य में बड़े पैमाने पर ऊर्जा का उत्पादन करने में सक्षम होंगे।
भारत की फिलहाल जो ऊर्जा की आवश्यकताएं हैं, उनमें लगभग 3% तक आज भी हम Nuclear Energy से पैदा करते हैं। अर्थात हम यूरेनियम विखंडन को करते हुए उससे उत्पन्न हीट को बिजली में कन्वर्ट करके अपनी ऊर्जा आवश्यकता की 3% तक पूर्ति कर पाते हैं।
भारत का लक्ष्य है कि आने वाले 10 साल में हम इसे बढ़ाकर 12 गुना कर दें। इसके अंदर आज की यह खबर एक बहुत ही महत्वपूर्ण रोल प्ले करने जा रही है।
ऊर्जा का उत्पादन कैसे होता है? पहले अगर हम उस पर चर्चा कर लें तो आपके लिए आगे बढ़ना और इस खबर को डिटेल में समझना बेहद आसान होगा।
सिर्फ इतना समझिए कि जब आप टरबाइन घुमाते हैं, तो टरबाइन घुमाने के लिए आपने प्रेशर कहां से लिया? आपने हीट उत्पन्न करके वाटर वेपर बनाई और उन वेपर्स को प्रेशर से टरबाइन पर डाला।
टरबाइन घूमकर बिजली उत्पादित करती है, लेकिन यह वेपर बनाने के लिए आपने कोयला जलाया था या पानी को ऊंचाई से गिराया था? या फिर आपने Uranium जैसे न्यूक्लियर फजाइल मटेरियल्स का इस्तेमाल किया?
नाभिकीय विखंडनीय तत्वों को इस्तेमाल करके उन्हें तोड़कर ऊर्जा पैदा की गई और उस ऊर्जा की गर्मी से पानी को वेपर में बदला गया। कुल मिलाकर अंततः गैस टरबाइन घूमने से ही बिजली बननी है।
लेकिन टरबाइन घुमाने के लिए जो प्रेशर पैदा कर रहे हैं, वह पानी गर्म किससे किया गया? अगर कोयले से गर्म किया तो आप उसे थर्मल पावर कहते हैं और अगर Nuclear Energy से किया तो उसे न्यूक्लियर रिएक्टर कहते हैं।
हम लोग यूरेनियम की बात इसलिए कर रहे हैं कि कोयले से जितनी ऊर्जा पैदा होती है, उससे कई हजार गुना ज्यादा ऊर्जा उससे कम मात्रा में उपलब्ध यूरेनियम से की जा सकती है। कोयले से तो फिर भी कार्बन डाइऑक्साइड निकलेगी और दुनिया में प्रदूषण फैलेगा।
लेकिन यूरेनियम से जब ऊर्जा उत्पादित की जाती है, तो ज्यादा ऊर्जा भी निकलती है और प्रदूषण भी कार्बन के रूप में नहीं होता। इसलिए इसे Clean Energy Source के रूप में माना जाता है।
ऐसे में जब आज हम इस उपलब्धि की कंसीडरेशन कर रहे हैं, तो हमने ऐसा क्या कर दिया जो दुनिया नहीं कर पाई? क्या हमने कोई परमाणु बम बना लिया है?
देखिए परमाणु बम तो भारत पहले ही बनाकर बैठा हुआ है और पोकरण में परीक्षण करके हमने पहले ही अपने आप को सुरक्षित कर रखा है। लेकिन आज जो हमने कर दिया है, वह है Most Advanced Atomic Reactor का माइलस्टोन पूरा करना।
हमने वह कर लिया है जो अब तक अमेरिका नहीं कर पाया और जो अब तक पश्चिम के देश नहीं कर पाए हैं। रूस और चीन के बाद भारत दुनिया का तीसरा देश बन गया है जिसने यह उपलब्धि हासिल की है।
भारत ने indigenously आत्मनिर्भर होते हुए अपने ही उद्योगों और MSME सेक्टर की कंपनियों की मदद से एक ऐसा रिएक्टर बना लिया है जो खुद यूरेनियम पैदा करेगा। यह भारत की बहुत बड़ी कामयाबी है।
हमने जब कहा कि रिएक्टर्स के अंदर यूरेनियम की ऊर्जा आवश्यक होती है, तो अब हमें यूरेनियम खदानों से नहीं चाहिए होगा। हमारे पास उपलब्ध Thorium के जो भंडार हैं, हम उसका उपयोग करके खुद का यूरेनियम बना पाएंगे।
मोनाजाइट सोइल के अंदर उपलब्ध थोरियम से हम यूरेनियम बना पाएंगे और उस यूरेनियम से बिजली उत्पादित कर पाएंगे। यह प्रक्रिया हमने आत्मनिर्भरता के साथ करके दुनिया के लिए एक बड़ा कीर्तिमान स्थापित कर दिया है।
कलपक्कम में भारत का स्वदेशी चमत्कार
खबर है कि भारत ने तमिलनाडु के Kalpakkam में अपनी संस्था भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड, जिसे Bhavini कहते हैं, वहां काम शुरू किया है। वहां 500 मेगावाट प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर का कमर्शियल उत्पादन शुरू कर दिया गया है।
इसके निर्माण में 200 से अधिक भारतीय एमएसएमई और निजी कंपनियों के कलपुरजे लगे हैं। यह पूरी तरह स्वदेशी बताया गया है और इसमें भारत की मेहनत साफ नज़र आती है।
कहा गया कि इसके निर्माण में जो सपना था, वह Homi Jehangir Bhabha का था। उन्होंने कई साल पहले यह सपना देखा था कि भारत को अगर परमाणु ऊर्जा में आत्मनिर्भर होना है, तो हमें दुनिया के यूरेनियम पर निर्भर होना छोड़ना होगा।
आज भी आप देखते हैं तो ईरान पर बम गिरने की मेजर वजह यही थी कि ईरान यूरेनियम एनरचमेंट यानी संवर्धन करने लग रहा है। भारत के पास भी यूरेनियम की कमी है।
भारत अपनी कुल आवश्यकता का बहुत कम हिस्सा ही यूरेनियम अपने पास रखता है। अगर हम अपने रिएक्टर से बिजली उत्पादित करते भी हैं, तो उसके लिए हमें यूरेनियम इंपोर्ट करना पड़ता है।
ऐसे में यदि हम अपने यहाँ पर यूरेनियम बनाने लग जाएँ, जो कि प्राकृतिक रूप से मिलने वाला तत्व है, तो यह बड़ी बात होगी। हमारे पास यूरेनियम की खदानें नहीं हैं, लेकिन हमारे पास थोरियम बहुत है।
अगर हम उपलब्ध थोरियम से यूरेनियम बनाने लग जाएँ, तो यह भारत के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। यह सपना कभी होमी जहाँगीर भाभा ने देखा था जिसे अब पूरा किया गया है।
प्रधानमंत्री ने इस बात को जब लिखा तो यह कहा कि Indigenously Designed प्रोटोटाइप हमने तैयार किया है। यह Fast Breeder Reactor की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है।
ब्रीडर का मतलब है कि यह ब्रीड कर रहा है, यानी पैदा कर रहा है। ऐसा रिएक्टर जो खुद से ईंधन पैदा कर दे, यानी आप जितना ईंधन दे रहे हो, उससे ज्यादा ईंधन खुद बना के दे दे रहा है।
इसीलिए इसे Breeder Reactor कहा जाता है। हमने इसे अटेन किया है और इस काम को करके हमने आने वाले समय में अपने थोरियम भंडारों को तीसरे स्टेज के लिए उपयोग में लेने का रास्ता खोल दिया है।
इस बात को समझने के लिए आपको थोड़ी केमिस्ट्री समझनी होगी। जिस थोरियम के लिए हम खुश हो रहे हैं, उसका दुनिया का 25% भंडार अकेले भारत में है और इसीलिए वह हमारे लिए एक बड़ी चीज है।
थोरियम एक रेडियो एक्टिव तत्व है जिसका परमाणु क्रमांक 90 है। होमी जहाँगीर भाभा का यह सपना था कि अगर भारत न्यूक्लियर रिएक्टर्स में थोरियम यूज़ करना शुरू कर दे, तो हमें किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
लेकिन थोरियम डायरेक्ट यूज़ हो नहीं सकता, इसलिए उसे कन्वर्ट करना था यूरेनियम के अंदर। उसकी प्रक्रिया उन्होंने सुझाई थी और उसके अलग-अलग स्टेजेस बताए थे।
फिलहाल जो दुनिया में स्थित रिएक्टर्स हैं, वे Pressurized Heavy Water Reactors हैं। उनमें होता यह है कि जो यूरेनियम प्राकृतिक रूप से मिलता है, उसे फ्यूल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
नाभिकीय विज्ञान: कैसे बनता है ईंधन?
रिएक्टर वेसल के अंदर कंट्रोलोल्ड तरीके से नाभिकीय अभिक्रिया कराने के लिए यूरेनियम पर न्यूट्रॉन की बारिश की जाती है। जब न्यूट्रॉन की बारिश होती है और वह यूरेनियम टूटने लगता है, तो उससे ऊर्जा और हीट उत्पादित होती हैं।
उस हीट को पानी के साथ लपेटा जाता है और वह पानी भाप में बदलता है। वह बनी हुई भाप टरबाइन को घुमाती है और टरबाइन से जनरेटर घूमता है, जिससे बिजली उत्पादित होकर आपको मिल जाती है।
लेकिन इस पूरे काम के लिए जरूरी यह है कि रिएक्टर के अंदर यूरेनियम सही से कंट्रोलोल्ड वे में फटे। अगर वह अनकंट्रोल्ड हो जाएगा, तो वह नाभिकीय बम बन जाएगा या कोई बड़ी आपदा आ जाएगी।
यूरेनियम का एटॉमिक नंबर 92 होता है, जो कि प्रोटॉन की संख्या है। जब इस पर एक और न्यूट्रॉन डाल दिया जाए, तो यह Uranium-239 में बदल जाता है। यह आगे चलकर बीटा डिके की प्रक्रिया से गुजरता है।
किसी एटम के अंदर इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन होते हैं। न्यूट्रॉन को प्रोटॉन में बदला जा सकता है और इसके लिए उसमें बीटा डिकैं करना होता है।
अगर बीटा इससे बाहर निकलता है, तो यह प्रोटॉन में बदल जाता है। न्यूट्रॉन को प्रोटॉन में बदलने की यह एक्सरसाइज सुनने में तो आसान है, लेकिन ऐसा होते ही एलिमेंट का एटॉमिक नंबर बदल जाता है।
जब यूरेनियम से एक बीटा बाहर निकाल दिया जाए, तो वह Neptunium बन जाता है जिसका नंबर 93 है। अगर उससे भी एक और बीटा बाहर निकाल दिया जाए, तो वह Plutonium बन जाता है जिसका नंबर 94 है।
अब तक दुनिया के रिएक्टरों में यहाँ तक कि काम होता था। जो भी फास्ट ब्रीडर रिएक्टर्स हुआ करते थे, उनमें हम प्लूटोनियम को उत्पन्न करते थे। लेकिन अब हमने इससे आगे का काम सीख लिया है।
हमने अब प्लूटोनियम का उपयोग करके Fast Breeder Reactor में आगे बढ़ते हुए Uranium-233 का उत्पादन करना सीख लिया है। यह भारत के लिए एक बहुत बड़ी छलांग है।
थोरियम 90 (232) पर जब न्यूट्रॉन की वर्षा होती है, तो यह थोरियम 233 में बदल जाता है। इसके बाद बीटा डिके के माध्यम से यह Protactinium में बदलता है और फिर अंत में Uranium-233 बनता है।
प्रैक्टिनियम से हमने यूरेनियम बनाने की कला सीख ली है। यह पूरी प्रक्रिया भारत के लिए Third Stage Goal जैसी है जिसे भारत अब सफलतापूर्वक करने निकल पड़ा है।
भारत ने जो काम कर दिखाया, वह यूरेनियम का उत्पादन करना सिखा दिया। यूरेनियम के कई आइसोटोप्स होते हैं, जैसे U-233, U-235 और U-238। इनमें सबसे ज्यादा रेडियोएक्टिव बम में यूज़ होता है, लेकिन बिजली के लिए ये सभी काम के हैं।
हमने कंट्रोलोल्ड वे में थोरियम को यूरेनियम में बदलने की कला पर महारत हासिल कर ली है। अब हम Third Stage में एंट्री करने जा रहे हैं, जहाँ केवल थोरियम से यूरेनियम बनने लगेगा।
दुनिया हैरान: भारत की सस्ती और सटीक तकनीक
इसी प्रक्रिया को Criticality कहते हैं। हमने उस क्रिटिकिटी को अचीव कर लिया है जो करना दुनिया के बड़े-बड़े देशों के लिए बहुत ही मुश्किल काम था।
इतना मुश्किलहै कि दुनिया अब तक इस पर 50 बिलियन डॉलर खर्च कर चुकी है। अमेरिका 15 बिलियन, जापान 12 बिलियन और जर्मनी 6 बिलियन डॉलर खर्च कर चुका है, लेकिन परिणाम वैसा नहीं मिला।
भारत ने 1 बिलियन डॉलर से भी कम दाम पर इसे तैयार कर लिया है। हालांकि इस काम को करने में हमें बहुत साल लगे। हमने 2004 से इस पर काम शुरू किया था और 22 साल बाद हमें यह सफलता मिली है।
लेकिन भारत ने हार नहीं मानी क्योंकि अगर हम थोरियम को यूरेनियम में बदलना सीख गए, तो यह हमारे लिए गेम-चेंजर होगा। हमारे पास दुनिया का 25% थोरियम मौजूद है।
अगर हम उसे यूज़ करना सीख गए, तो हम दुनिया में बिजली के मामले में आत्मनिर्भर होंगे। भारत ने बहुत ही पेशेंस के साथ इस मिशन को पूरा किया है और कलपक्कम में यह कारनामा कर दिखाया है।
फिलहाल के लिए 500 मेगावाट का हमने एक प्रोटोटाइप तैयार करके यह दिखा दिया है कि काम कैसे होता है। तमिलनाडु के कल्पक्कम में Bhavini के द्वारा यह कार्य परमाणु ऊर्जा विभाग के अधीन किया गया है।
आने वाले समय में दुनिया को भारत से बड़ी उम्मीदें होंगी कि भारत ने पूरी तरह से Indigenous तकनीकी कैसे विकसित कर ली। यह तकनीक न केवल ऊर्जा देगी बल्कि हमें सुरक्षित भी रखेगी।
सोचिए, ईरान जैसा देश आज यूरेनियम एनरचमेंट के लिए संघर्ष कर रहा है, और हमने वह तकनीक विकसित कर ली है जो अमेरिका और ब्रिटेन भी नहीं कर पाए हैं।
चाइना और रशिया इस काम को पहले से कर रहे थे, लेकिन अब भारत भी उस एलीट क्लब में शामिल हो गया है। भारत ने पूरी दुनिया को बता दिया है कि हम Three-Stage Nuclear Reactor के सेकंड स्टेज को पार कर चुके हैं।
इस ऐतिहासिक प्रगति के लिए इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी यानी IAEA ने भी भारत को बधाई दी है। IAEA के चेयरमैन ने इसे एक बहुत ही इंप्रेसिव प्रोग्रेस माना है।
भारत की यह उपलब्धि दर्शाती है कि हम विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में किसी से पीछे नहीं हैं। थोरियम आधारित बिजली उत्पादन भारत के भविष्य को पूरी तरह से बदलने की ताकत रखता है।