- कतर का पीछे हटना और पाकिस्तान की लॉटरी (Why Qatar Stepped Back?)
- पाकिस्तान की एंट्री और ट्रंप का मास्टरप्लान (Pakistan's Entry & Trump's Role)
- भारत के लिए सेटबैक और इजराइल का रुख (India's Setback & Reality Check)
नमस्कार साथियों, पिछले कुछ दिनों में पश्चिम एशिया के अंदर जिस तरह की घटनाएं घटी हैं और जिस तरह से युद्ध का माहौल चला है, उसने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया था। इस पूरे घटनाक्रम में पिछले 15 दिनों से जिस देश की चर्चा सबसे ज्यादा हो रही है, वह देश है Pakistan।
चर्चा का मुख्य कारण यह है कि पाकिस्तान इस समय पूरी दुनिया में आए हुए एक बड़े संकट को रोकने वाले मसीहा के रूप में उभरकर सामने आया है। वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं में जो महंगाई का संकट और मंदी का दौर देखा जा रहा था, उसे रुकवाने वाले देश के रूप में पाकिस्तान का नाम लिया जा रहा है।
सवाल यह उठता है कि क्या पाकिस्तान का कद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इतना ज्यादा बढ़ गया है कि उसके कहने मात्र से America और Iran ने आपस में झगड़ना छोड़ दिया? क्या वाकई में पाकिस्तान इतना महान देश हो गया है कि ईरान, अमेरिका और यहां तक कि इजराइल ने भी उसकी बातों को महत्व देना शुरू कर दिया है?
ये सभी सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि एक समय ऐसा लग रहा था कि यह युद्ध रुकने की संभावनाएं लगभग समाप्त हो चुकी हैं। दुनिया को डर था कि कहीं अमेरिका, ईरान पर कोई बहुत बड़ा और एक्सट्रीम कदम न उठा ले या इजराइल कोई बड़ी कार्रवाई न कर दे।
परमाणु बम यानी Nuclear Bomb के खतरे तक की टेंशंस वैश्विक स्तर पर होने लगी थीं। ऐसे नाजुक समय में पाकिस्तान इन दोनों महाशक्तियों के बीच में मध्यस्थता यानी Mediation कराने में कामयाब होता दिखाई दिया है।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया में हेडलाइन बन रही हैं कि ट्रंप और अमेरिका के साथ-साथ ईरान भी दो हफ्ते के मीडिएशन के लिए तैयार हो गए हैं। जब ऐसी खबरें बाहर आती हैं, तो सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि आखिर पाकिस्तान ने यह करिश्मा कैसे किया?
पाकिस्तान को इस भूमिका के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, विशेषकर यूरोप के बहुत से देशों ने शाबाशी दी है और उन्हें धन्यवाद कहा है। दुनिया के बड़े मंचों पर 'थैंक यू पाकिस्तान' के नारे सुनाई दे रहे हैं, जो भारत के लिए एक विचारणीय विषय है।
निश्चित ही पाकिस्तान भारत का विरोधी और शत्रु राष्ट्र माना जाता है, ऐसे में उसकी इस तरह की अंतरराष्ट्रीय तारीफ समस्त भारतीयों के लिए परेशानी का सबब तो है ही। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह जो जिम्मेदारी पाकिस्तान निभा रहा है, वह पहले Qatar निभाता था।
अब सवाल यह है कि कतर इस पूरी तस्वीर से कहां गायब हो गया और पाकिस्तान कैसे अचानक मुख्य भूमिका में उभर कर सामने आया? इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पूरे घटनाक्रम से भारत की वैश्विक स्थिति पर क्या फर्क पड़ेगा?
आइए इन सभी विषयों के ऊपर गहराई से सोचना और डिस्कस करना शुरू करते हैं कि आखिर अमेरिका का इसके ऊपर किस तरह से आशीर्वाद रहा। पाकिस्तान ने खुद को दुनिया के बीच में एक स्टेबल कंट्री के रूप में किस प्रकार से प्रेजेंट किया, यह समझना बेहद जरूरी है।
कतर का पीछे हटना और पाकिस्तान की लॉटरी (Why Qatar Stepped Back?)
अमेरिका और ईरान के बीच में जिस तरह का तनाव बना हुआ था, उसमें सबसे बड़ा सवाल यही था कि आखिर मध्यस्थता कौन कराएगा? युद्ध को रुकवाने की जिम्मेदारी कौन लेगा और कौन इन दोनों को बातचीत की मेज पर लाएगा?
शुरुआत में सबका ध्यान रूस की ओर गया, लेकिन रूस तो खुद युद्ध में उलझा हुआ है। वह अमेरिका के साथ खुद दुश्मनी में है, तो वह मध्यस्थ की भूमिका कैसे निभा सकता था? फिर नजर चीन पर गई, लेकिन China की भी अमेरिका से पुरानी रंजिश है।
पूरी दुनिया के बीच में कोई भी ऐसा बड़ा देश निकलकर नहीं आ रहा था जो यह कह सके कि अब रुक जाओ। असल में युद्ध रुकवाने का निर्णय खुद अमेरिका को ही लेना था, लेकिन उन्हें किसी के कंधे पर हाथ रखकर यह कहलवाना था कि 'तुम कहो तो हम रुक रहे हैं'
यह बिल्कुल वैसा ही सीन है जैसा फिल्मों में होता है कि 'मुझे रोक लो वरना मैं इसे मार दूंगा'। अमेरिका इसी भूमिका में था और वह मध्यस्थ के रूप में कतर से जिद कर रहा था कि वह बीच में आए।
लेकिन इस बार कतर ने हाथ जोड़ लिए और साफ कह दिया कि वह मध्यस्थता नहीं करेगा। कतर का इस प्रक्रिया से पीछे हटना ही असल में पाकिस्तान को मुख्य भूमिका में लेकर आया, जिससे पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय साख बढ़ गई।
कतर की कहानी भी बहुत दिलचस्प है, उसने अपनी विदेश नीति ही ऐसी बनाई है कि वह अंतरराष्ट्रीय शांति चाहता है। कतर दुनिया भर में शांति वार्ताओं का आयोजन करने के लिए जाना जाता है और यह उसकी डिप्लोमेसी का मुख्य हिस्सा है।
ऊर्जा की आपूर्ति के मामले में कतर एक बहुत ही शक्तिशाली देश है, जहां दुनिया का लगभग 20% LNG Reserve मौजूद है। 30 लाख की आबादी वाले इस छोटे से देश में केवल 30% कतरी नागरिक हैं, फिर भी यह पर कैपिटा इनकम में दुनिया के टॉप देशों में आता है।
कतर की राजधानी Doha को लंबे समय से डिप्लोमेसी की राजधानी या आर्बिट्रेटर के रूप में पहचाना जाता रहा है। जब ट्रंप सत्ता में थे, तब कतर ने $1 ट्रिलियन डॉलर के आसपास का सौदा करके अपनी आर्थिक ताकत का अहसास भी कराया था।
जब अमेरिका और अफगानिस्तान यानी तालिबान के बीच युद्ध चल रहा था, तब दोहा ही वह जगह थी जहां शांति वार्ता हुई थी। कतर ने हमेशा खुद को ऐसा रखा है कि वह युद्धरत देशों में से किसी के भी खिलाफ नहीं है, जैसे भारत की नीति रहती है।
कतर रशिया के साथ भी था और यूक्रेन के साथ भी, ताकि वह एक कॉमन देश बबने ईरान और इजराइल के बीच जून में हुए 12 दिन के युद्ध के दौरान भी कतर ही मध्यस्थ बनकर सामने आया था और शांति स्थापित करवाई थी।
चाहे रशिया-यूक्रेन का मामला हो या इजराइल-गाजा का, कतर ने हमेशा एक न्यूट्रल सेंटर के रूप में काम किया है। यहां तक कि अफ्रीका के डीआरसी और रवांडा कंफ्लिक्ट में भी 2025 की बातचीत के लिए कतर ने ही मंच तैयार किया था।
यूएस और वेनेजुएला के मामले में भी कतर ने बिना किसी लालच के दोनों पक्षों को बैठाने का काम किया था। लेकिन इस बार स्थिति बदल गई क्योंकि जब यह युद्ध शुरू हुआ, तो कतर खुद इसका निशाना बन गया, जिससे उसकी स्थिति कमजोर हो गई।
ईरान के साथ कतर की बहुत अच्छी मित्रता थी, लेकिन अमेरिका का CentCom मुख्यालय और अल उदैद एयरबेस कतर में ही है। जब ईरान ने कतर को निशाना बनाया, तो कतर का खुद का विश्वास हिल गया कि वह अब मध्यस्थ नहीं रह सकता।
पाकिस्तान की एंट्री और ट्रंप का मास्टरप्लान (Pakistan's Entry & Trump's Role)
कतर पर हुए हमलों में 16 लोग घायल हुए, जिससे कतर ने खुद को युद्ध का एक पक्ष मानने शुरू कर दिया। 23 मार्च 2026 को जब कतर ने आधिकारिक तौर पर मध्यस्थता से इंकार किया, तब पाकिस्तान के लिए रास्ते खुल गए।
कतर के इंकार के ठीक एक दिन बाद, यानी 24 मार्च को पाकिस्तान के Shahbaz Sharif ने बयान दिया कि वे युद्ध रुकवाने के लिए तैयार हैं। इस पर ट्रंप ने पाकिस्तान की पीठ थपथपाई और उन्हें इस काम के लिए आगे बढ़ने की अनुमति दे दी।
पाकिस्तान के लिए यह स्थिति बहुत ही रणनीतिक थी क्योंकि उसने सऊदी अरब के साथ मित्रता की थी कि हमले की स्थिति में वह युद्ध लड़ने जाएगा। लेकिन इस बार वह सऊदी की मदद के लिए युद्ध में नहीं कूदा, बल्कि सहानुभूति का रास्ता अपनाया।
पाकिस्तान ने ईरान के प्रति भी सॉफ्ट कॉर्नर रखा और खमनेई पर हुए हमलों की निंदा की। दूसरी ओर, अमेरिका के साथ तो पाकिस्तान अपनी गुडविल हमेशा से बनाकर रखना चाहता ही है, ताकि उसे आर्थिक मदद मिलती रहे।
पाकिस्तान OIC (Organisation of Islamic Cooperation) का एक संस्थापक सदस्य है और इकलौता इस्लामिक देश है जिसके पास Nuclear Bomb है। इस्लामिक वर्ल्ड में पाकिस्तान की इस वैल्यू को ट्रंप ने बहुत अच्छे से एनालाइज किया और उसका इस्तेमाल किया।
ट्रंप ने पाकिस्तान का उपयोग इसलिए भी किया क्योंकि पाकिस्तान ही वह देश है जो चीन पर दबाव बना सकता है। चीन को अपनी CPEC (China Pakistan Economic Corridor) परियोजना के लिए पाकिस्तान की बहुत ज्यादा जरूरत है।
चीन ने सिंजियांग से लेकर ग्वादर पोर्ट तक जो सीपेक बनाया है, वह तेल की आपूर्ति के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। अगर पश्चिम एशिया में युद्ध चलता रहता, तो चीन का यह पूरा प्रोजेक्ट और तेल की सप्लाई खतरे में पड़ सकती थी।
यही कारण था कि चीन ने युद्ध के दौरान 26 बार ईरान से बातचीत की, जिसका डेटा अब बाहर निकलकर आया है। पाकिस्तान वह कड़ी बना ,जिसके जरिए चीन और अमेरिका दोनों अपने हितों को साधने की कोशिश कर रहे थे।
पाकिस्तान ने तुर्की, मिस्र और सऊदी अरब के विदेश मंत्रियों को 29 मार्च को अपने यहां बुलाया। इसके बाद 30 मार्च को पाकिस्तान के प्रतिनिधि खुद Wang Yi से मिलने गए और ईरान को तेल न खरीदने की धमकी दिलवाई।
चीन ने ईरान के साथ 400 बिलियन डॉलर का तेल समझौता किया हुआ है, इसलिए चीन का दबाव काम कर गया। पाकिस्तान ने अमेरिका के लिए बिल्कुल वैसे ही काम किया जैसे कभी रिचर्ड निक्सन के समय में माओ जिडोंग से बात कराने के लिए किया था।
अब 10 अप्रैल को अमेरिकी उपराष्ट्रपति पाकिस्तान आएंगे और ईरान के प्रमुखों के साथ बातचीत करेंगे। इस पूरी कहानी में पाकिस्तान ने खुद को एक भरोसेमंद और विश्वस्त देश के रूप में अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्थापित करने का प्रयास किया है।
दिलचस्प बात यह है कि इजराइल इस सीजफायर में एक पार्टी है, जबकि पाकिस्तान इजराइल को एक देश के रूप में मान्यता ही नहीं देता। फिर भी पाकिस्तान ने इस पूरी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया, जो उसकी एक बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा रही है।
भारत के लिए सेटबैक और इजराइल का रुख (India's Setback & Reality Check)
बड़ा सवाल यह है कि यह काम भारत भी कर सकता था क्योंकि भारत के संबंध इजराइल और ईरान दोनों से बहुत अच्छे हैं। लेकिन भारत इस मामले में मध्यस्थ क्यों नहीं बना, यह एक गंभीर कूटनीतिक प्रश्न बनकर उभरा है।
भारत किसी भी देश का प्रतिनिधि बनकर काम नहीं करना चाहता था, चाहे वह चीन हो या अमेरिका। भारत एक इंडिपेंडेंट देश है और वह अपनी राय अपने स्वार्थ और सिद्धांतों के आधार पर रखता है, इसलिए वह इस खेल से दूर रहा।
हालांकि, पाकिस्तान का इस तरह से सफल होना भारत की विदेश नीति के लिए एक Setback यानी झटका माना जा रहा है। भारत पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने की कोशिश कर रहा था, लेकिन इस मामले में पाकिस्तान बाजी मार ले गया।
प्रधानमंत्री मोदी ने इजराइल की यात्रा की थी और भारत का पश्चिम एशिया में बहुत बड़ा प्रभाव है, फिर भी भारत इस मीडिएशन का हिस्सा नहीं रहा। हिंद महासागर और पर्शियन गल्फ के मसलों में भारत को अपनी भूमिका को और मजबूत रखनी चाहिए थी।
पाकिस्तान ने भले ही अपनी इमेज सुधारने की कोशिश की हो, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। पाकिस्तान खुद पेट्रोल-डीजल के संकट और पैसे की किल्लत से जूझ रहा है, जहां लोग वर्क फ्रॉम होम करने को मजबूर हैं।
ट्रंप ने पाकिस्तान को आगे खड़ा जरूर किया, लेकिन इजराइल अभी भी शांत बैठने को तैयार नहीं है। इजराइल ने पाकिस्तान द्वारा की गई मध्यस्थता को पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया है, क्योंकि वह पाकिस्तान को पहचानता ही नहीं है।
इस मध्यस्थता की मुख्य शर्त यह थी कि लेबनान पर हमला नहीं किया जाएगा, लेकिन अभी-अभी एक बड़ी खबर आई है। इजराइल ने Lebanon पर भीषण हमला कर दिया है, जिसमें लगभग 50 लोगों के मारे जाने की खबर है।
यह हमला यह साबित करता है कि इजराइल को इस सीजफायर में कोई दिलचस्पी नहीं है और वह अपनी कार्रवाई जारी रखेगा। पाकिस्तान भले ही चर्चा में आ गया हो, लेकिन क्या वह वास्तव में शांति ला पाएगा, इस पर बड़ा प्रश्नचिह्न लग गया है।
भारत के भीतर भी अपोजिशन सरकार से सवाल कर रहा है कि भारत इस पूरी प्रक्रिया में पीछे क्यों रह गया? लेकिन ऐसी मध्यस्थता का क्या लाभ जिसे युद्ध का मुख्य पक्ष यानी इजराइल मानने से ही इंकार कर दे और बमबारी जारी रखे।
कुल मिलाकर, पाकिस्तान ने एक मौका जरूर पाया है और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में अपनी जगह बनाई है। लेकिन पश्चिम एशिया की आग इतनी जल्दी ठंडी होगी, ऐसा फिलहाल इज़राइल के तेवरों को देखकर नहीं लगता है।
भारत निश्चित ही इस स्थिति का कोई न कोई समाधान निकालेगा और अपनी कूटनीति को फिर से पटरी पर लाएगा। पाकिस्तान का यह नया अवतार दुनिया के लिए कितना भरोसेमंद होगा, यह तो आने वाला समय ही बताएगा।