- होंडा का भारी झटका: 1.5 लाख करोड़ का नुकसान
- ईवी के प्रति आकर्षण और उसकी असल वजह
- ट्रंप का प्रभाव और ईवी बाजार पर संकट
दुनिया में इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है। ऐसे समय में जब तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं और वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट की आहट सुनाई दे रही है, कई बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनियां इलेक्ट्रिक वाहनों के भविष्य को लेकर अपने कदम पीछे खींच रही हैं। यह स्थिति कई लोगों के लिए आश्चर्यजनक हो सकती है, क्योंकि स्वाभाविक रूप से तेल की बढ़ती कीमतों के चलते लोगों को इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर आकर्षित होना चाहिए।
कई लोग अब अपने घरों में बैठकर इलेक्ट्रिक वाहनों के फायदों पर विचार कर रहे होंगे। पेट्रोल और डीजल की किल्लत से मुक्ति और पर्यावरण की चिंता ने निश्चित रूप से ईवी को एक आकर्षक विकल्प बनाया है। जिनके पास पहले से ईवी हैं, वे निश्चिंत होकर यात्रा कर रहे हैं, जबकि अन्य पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दामों से परेशान हैं।
हालांकि, एक नई रिपोर्ट ने इलेक्ट्रिक वाहनों के बाजार में एक नई चिंता पैदा कर दी है। जापानी ऑटोमोबाइल दिग्गज होंडा ने अमेरिका में अपने तीन इलेक्ट्रिक वाहन मॉडल लॉन्च करने की योजना को फिलहाल टाल दिया है। इस फैसले से कंपनी को 15.8 बिलियन डॉलर (लगभग ₹1.3 लाख करोड़) तक का नुकसान हो सकता है।
यह उम्मीद की जाती है कि पर्यावरण के प्रति जागरूक, प्रगतिशील सोच वाले और ड्राइविंग के आनंद को महत्व देने वाले लोग इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर आकर्षित होंगे। अमेरिका जैसे विकसित देश में, जहां लोग वैकल्पिक परिवहन के रूप में इलेक्ट्रिक वाहनों को तेजी से अपना रहे हैं, होंडा जैसी दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी का अपना बाजार समेट लेना कई सवाल खड़े करता है।
होंडा ने घोषणा की है कि वे 2026 के अंत में लॉन्च होने वाले तीन इलेक्ट्रिक वाहनों को अमेरिकी बाजार में नहीं उतारेंगे। यह कदम एक बड़े रणनीतिक बदलाव का संकेत दे रहा है। सवाल यह उठता है कि क्या अमेरिका जैसे देश से होंडा का पीछे हटना जापान-अमेरिका प्रतिद्वंद्विता का परिणाम है, या फिर यह कोई ऐसी रणनीतिक चाल है जिसे इन कंपनियों ने पहले ही भांप लिया है?
विचारणीय है कि लगभग ₹1.5 लाख करोड़ का भारी नुकसान उठाकर भी एक कंपनी का इलेक्ट्रिक वाहनों के बाजार में कदम न रखना, यह दर्शाता है कि कुछ तो ऐसा है जो वे देख चुके हैं जिसके कारण वे इस बाजार में प्रवेश करने से कतरा रहे हैं। क्या वे किसी चीज से डर गए हैं? यह विश्लेषण का विषय है।
होंडा का भारी झटका: 1.5 लाख करोड़ का नुकसान
जापानी कार निर्माता होंडा का यह फैसला, कि वे उत्तरी अमेरिकी बाजार से इलेक्ट्रिक वाहनों के निर्माण से पीछे हट रहे हैं, बाजार में एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है। 1957 में स्थापित, होंडा ने इस साल पहले ही 36,550 करोड़ रुपये का घाटा दर्ज किया है और अब भविष्य में 1.5 लाख करोड़ रुपये के नुकसान का सामना करने की संभावना है।
होंडा ने भविष्य के लिए जो कारें पेश की थीं, वे बेहद भविष्यवादी लग रही थीं। ये कारें अत्याधुनिक फीचर्स से लैस थीं, जिनमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) भी शामिल था, जो अमेरिकी बाजार के लिए एक अनूठा अनुभव प्रदान करतीं। होंडा 'जीरो सैलून' जैसी SUV लाने की भी योजना बना रही थी, लेकिन इन सभी योजनाओं को फिलहाल रोक दिया गया है।
यह विशेष रूप से चौंकाने वाला है क्योंकि सिर्फ तीन साल पहले, 2022 में, होंडा ने अगले 10 वर्षों में इलेक्ट्रिक वाहनों के उत्पादन पर 40 बिलियन डॉलर (लगभग 3.5 लाख करोड़ रुपये) खर्च करने की योजना बनाई थी। अब वे कह रहे हैं कि वे पैसा खर्च नहीं करेंगे। यह दर्शाता है कि कंपनी ने अपनी पूरी रणनीति बदल दी है।
तो यहां एक बड़ा सवाल उठता है: होंडा इतना पैसा निवेश करने के बाद क्यों पीछे हट रही है? क्या कोई ऐसी बात है जो हमें और आपको पता नहीं है, लेकिन उन्हें पता चल गई है?
ईवी के प्रति आकर्षण और उसकी असल वजह
दुनिया ने ईवी के प्रति अपना आकर्षण क्यों बनाया? इसका मुख्य कारण प्रदूषण था, न कि पेट्रोल और डीजल गाड़ियों को चलाने में मज़ा न आना। पेट्रोल और डीजल इंजन काफी परिष्कृत हो चुके थे, और कंपनियां लगातार बेहतर प्रदर्शन वाली इंजन बनाने पर ध्यान केंद्रित कर रही थीं।
ईंधन भरवाने और तुरंत निकल जाने की सुविधा, और कम समय में तेज गति का आनंद, ये सभी कारक उन लोगों के लिए आकर्षक थे जो आर्थिक रूप से सक्षम थे। अमीर लोगों को सीधे तौर पर कोई समस्या नहीं थी, लेकिन पर्यावरण प्रदूषण को लेकर चिंताएं बढ़ने लगीं।
वैश्विक तापवृ्द्धि, ग्लेशियरों का पिघलना और समुद्र के जल स्तर का बढ़ना - इन सभी को प्रदूषण से जोड़ा गया। संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) के तहत पेरिस जलवायु समझौते में, विकसित राष्ट्रों ने शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया। लक्ष्य यह था कि 2100 तक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक वृद्धि न हो।
इसके लिए कार्बन उत्सर्जन को तत्काल रोकना आवश्यक था। लेकिन, अमेरिका जैसे देशों का इस दिशा में रवैया हमेशा से विवादास्पद रहा है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पेरिस जलवायु समझौते से अमेरिका को बाहर कर दिया था, और अब दोबारा उनके सत्ता में आने के बाद भी ऐसे ही संकेत मिल रहे हैं।
अमेरिका, जो खुद को एक विकसित राष्ट्र और पर्यावरण संरक्षण का पैरोकार मानता है, तेल के मुद्दे पर अपनी अलग राह पर चलता दिख रहा है। यह 'पूंजीवादी चरमपंथ' जिसमें पर्यावरण की परवाह कम है, बाजार के लिए एक बड़ी चिंता का कारण बन गया है।
ट्रंप का प्रभाव और ईवी बाजार पर संकट
डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए सरकारी सब्सिडी को लेकर काफी मुखर रहा है। उन्होंने एलन मस्क की टेस्ला को दी जाने वाली $7500 की सब्सिडी को रोकने का प्रयास किया था। यह सब्सिडी इलेक्ट्रिक वाहनों को अधिक सुलभ बनाने के लिए महत्वपूर्ण थी।
सब्सिडी को रोकने के सरकारी प्रयासों के कारण, अमेरिका में इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री पर सीधा असर पड़ा। इस कदम के पीछे ट्रंप का तर्क था कि वे किसी को भी ईवी अपनाने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। इस "लड़ाई" ने दुनिया भर में एक नकारात्मक संदेश भेजा।
जुलाई 2025 में, अमेरिका द्वारा इलेक्ट्रिक वाहनों को दी जाने वाली क्रेडिट सहायता को रोकने के निर्णय ने ईवी की बिक्री को सीधे तौर पर प्रभावित किया। यदि एक 40 लाख की गाड़ी पर 6 लाख की सब्सिडी नहीं मिलती, तो गाड़ी की कीमत 46 लाख हो जाती है। ऐसे में, बहुत से लोग यह सोचने लगे कि क्या उन्हें पर्यावरण बचाने के लिए अतिरिक्त खर्च करना चाहिए।
इस प्रोत्साहन योजना के हटने से अमेरिकी ईवी बाजार सुस्त पड़ गया। चूंकि अमेरिका एक बड़ा उपभोक्ता बाजार है, इसलिए वहां मांग में कमी का असर पूरी दुनिया पर पड़ा। इसका प्रभाव चीन और अन्य देशों पर भी दिखने लगा।
वैश्विक बिक्री में गिरावट और बड़े ब्रांडों की चिंता
जब अमेरिका जैसे बड़े बाजार में ईवी की बिक्री गिरती है, तो इसका वैश्विक स्तर पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। उपभोक्ताओं के बीच यह धारणा फैल गई कि यदि अमेरिका जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था ईवी को नहीं अपना रही है, तो फिर बाकी लोगों को क्यों अपनाना चाहिए। इस नकारात्मक भावना ने वैश्विक स्तर पर ईवी की बिक्री में 20% की गिरावट दर्ज की है, विशेष रूप से 2026 में।
इस गिरावट का सबसे पहला और सीधा असर होंडा जैसी कंपनियों पर पड़ा है। होंडा, जो 2023 में तीसरे स्थान पर थी, ब्रांड वैल्यू में छठे स्थान पर आ गई है। बिक्री के मामले में भी कंपनी को नुकसान हुआ है।
इतना ही नहीं, लैंबॉर्गिनी जैसी महंगी कारें बनाने वाली कंपनियां भी सरकारों से गुहार लगा रही हैं। लैंबॉर्गिनी जैसी कंपनियां, जिनकी कारें 3 लाख डॉलर (लगभग 2.5 करोड़ रुपये) से अधिक की होती हैं, अब सरकार से कह रही हैं कि उन्हें इलेक्ट्रिक वाहनों के बाजार में जबरदस्ती न धकेला जाए।
यूके सरकार ने 2030 तक पेट्रोल और डीजल कारों को बंद करने का लक्ष्य रखा है, लेकिन लैंबॉर्गिनी जैसी कंपनियों ने 2035 तक का समय मांगा है। उनका तर्क है कि उनकी कारों की पहचान उनके इंजन की आवाज और ड्राइविंग के अनुभव से है, जो ईवी में नहीं मिल सकता।
इसके अलावा, फेरारी और लैंबॉर्गिनी जैसी कंपनियां चिंतित हैं कि यदि ईवी बाजार हावी हो गया, तो उनकी कारें बिकेंगी नहीं। यदि वे ईवी बनाते भी हैं, तो क्या वे उस "फील" को दे पाएंगे जो उनके प्रशंसक चाहते हैं?
लॉबिंग और भविष्य की अनिश्चितता
अब यह संभव है कि ये बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनियां सरकारों के सामने अपनी लॉबिंग बढ़ा रही हैं। वे तर्क दे रहे हैं कि अमीर देशों को गरीबों से कहें कि वे प्रदूषण न फैलाएं, या चीन और भारत जैसे देशों को प्रदूषण कम करने के लिए प्रेरित करें।
यह एक जटिल स्थिति है। एक ओर, दुनिया प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन से जूझ रही है, और ईवी को इसका समाधान माना जा रहा है। दूसरी ओर, बड़े ऑटोमोबाइल निर्माता और कुछ शक्तिशाली राजनेता इस दिशा में आगे बढ़ने में हिचकिचा रहे हैं, जिससे बाजार में अनिश्चितता बढ़ रही है।
हालांकि, यूरोप अभी भी अमेरिका से थोड़ा अलग रुख अपना रहा है और वहां ईवी की बिक्री अभी भी कायम है। लेकिन उत्तरी अमेरिका में बिक्री की हालत खराब है, जिसका असर चीन पर भी पड़ा है।
भारत में, ईवी बाजार अभी भी शुरुआती दौर में है, लेकिन कंपनियां भारतीय बाजार में प्रवेश करने के लिए प्रयासरत हैं। दुनिया को उम्मीद है कि भविष्य में ईवी प्रदूषण से लड़ने में मदद करेंगी। यदि फास्ट चार्जिंग जैसी समस्याएं हल हो जाती हैं, तो निश्चित रूप से लोग प्रदूषण मुक्त जीवन चाहेंगे और ईवी बाजार बढ़ेगा।
लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने निश्चित रूप से लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। क्या इलेक्ट्रिक वाहन वास्तव में वह भविष्य हैं जिसकी हमें उम्मीद थी, या फिर यह केवल एक और बड़ा व्यावसायिक खेल है?