ईरान से एलपीजी संकट का सच: क्या भारत ने बदले में कुछ दिया?

ईरान से एलपीजी संकट का सच: क्या भारत ने बदले में कुछ दिया?
Story at a Glance:
  • भारत-ईरान डील की अटकलें: क्या सच है?
  • वैश्विक तेल बाजार और भारत की कूटनीति
  • ट्रम्प का बयान और वैश्विक अनिश्चितता

भारत में दो बड़े एलपीजी जहाजों का आगमन हुआ है, जो देश की एलपीजी की एक दिन की जरूरत को पूरा करने की क्षमता रखते हैं। 'शिवालिक' नाम का जहाज पर्शियन गल्फ से 46,000 मीट्रिक टन एलपीजी लेकर गुजरात के मुद्रा पहुंचा है।

वहीं, 'नंदा देवी' टैंकर जामनगर वादिनार में 46,500 मीट्रिक टन एलपीजी लेकर पहुंचा है। इन दोनों जहाजों के साथ, भारत में अब 90,000 टन से अधिक एलपीजी आ चुकी है। यह एलपीजी ईरान के नियंत्रण वाले हॉर्मोज जलडमरूमध्य क्षेत्र से आई है।

यह महत्वपूर्ण क्यों है?

यह आगमन ऐसे समय में हुआ है जब भारत में एलपीजी की मांग बढ़ी हुई है। आम तौर पर 50-55 लाख सिलेंडर प्रति दिन की आवश्यकता होती है, लेकिन इन दिनों यह बढ़कर 70 लाख सिलेंडर प्रति दिन तक पहुंच गई है। यह एक जहाज अकेले 33 लाख सिलेंडर तक भर सकता है।

आखिर इसके पीछे का सच क्या है?

इन जहाजों के सुरक्षित आगमन के बाद, इस बात पर अटकलें लगने लगीं कि क्या भारत ने ईरान के साथ कोई सौदा किया है। क्या इन जहाजों को निकालने के बदले भारत ने कुछ दिया है?

भारत-ईरान डील की अटकलें: क्या सच है?

एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने ईरान के साथ एक ऐसी डील की है जिसमें वह ईरान के कुछ सीज किए गए जहाजों को छोड़ेगा। यह खबर तब सामने आई जब यह ज्ञात हुआ कि भारत ने फरवरी में तीन ऐसे प्रतिबंधित जहाजों को पकड़ा था, जो ईरान से जुड़े थे और अमेरिका द्वारा प्रतिबंधित थे।

क्या थे वो पकड़े गए जहाज?

इन जहाजों के नाम स्टेलर रूबी, अस्फाल्ट स्टार और अल जफरिया थे। ये जहाज ईरान के तेल को 'शैडो फ्लीट' के माध्यम से दुनिया भर में बेच रहे थे, जबकि ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध लागू थे। भारत ने अमेरिका के कहने पर इन्हें पकड़ा था।

ईरान की मांग और भारत का जवाब

खबरों के अनुसार, ईरान ने इन तीन टैंकरों की रिहाई की मांग की थी। तेहरान ने भारत से दवाइयां भी मांगी थीं। लेकिन, भारत सरकार ने इन दावों का खंडन किया है। विदेश मंत्रालय का कहना है कि ऐसी कोई शर्त नहीं मानी गई और न ही ईरान ने ऐसी कोई शर्त रखी।

"भारत ने वास्तव में ईरान से कोई डील नहीं की। वे जहाज कभी ईरान के थे ही नहीं।"

विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि पकड़े गए जहाज ईरान के थे ही नहीं, वे यूएई से ऑपरेट हो रहे थे और एक भारतीय व्यक्ति उन्हें मैनेज कर रहा था। इसलिए, ईरान के जहाजों को छोड़ने का सवाल ही नहीं उठता।

वैश्विक तेल बाजार और भारत की कूटनीति

ईरान से एलपीजी जहाजों के आने के साथ ही, भारत के कच्चे तेल के टैंकरों के आने की भी खबर है। 'जग लाडकी' नाम का जहाज 81,000 टन क्रूड ऑयल लेकर आ रहा है। यह भारत की कूटनीति की जीत के तौर पर देखा जा रहा है, क्योंकि इस क्षेत्र से जहाजों का निकलना मुश्किल है।

समुद्री लुटेरों का खतरा और भारतीय नौसेना की भूमिका

तेल की बढ़ती कीमतों के बीच, समुद्री लुटेरों के सक्रिय होने का खतरा बढ़ गया है। ऐसे में, भारत ने अपनी नौसेना के तीन जहाजों को गल्फ ऑफ अदन में तैनात किया है ताकि एलपीजी और क्रूड ऑयल के इन टैंकरों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

"यह जहाज सिर्फ तेल नहीं, बल्कि भारत की सुरक्षा और आत्मनिर्भरता का प्रतीक हैं।"

विदेश मंत्री एस. जयशंकर इस समय यूरोप की यात्रा पर हैं और उनसे भी इस मुद्दे पर सवाल पूछे जा रहे हैं। उन्होंने कहा है कि भारत ईरान के साथ बातचीत कर रहा है और भारतीय झंडे वाले जहाजों को गुजरने के लिए कोई स्थायी समझौता नहीं किया गया है।

"हम अपनी तरफ से अपने काम को कर रहे हैं। आप यह न समझें कि केवल भारत ही बातचीत कर रहा है; फ्रांस और इटली जैसे यूरोपीय देश भी ईरान से बातचीत में लगे हैं।"

ट्रम्प का बयान और वैश्विक अनिश्चितता

इस बीच, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि युद्ध जल्द ही खत्म होगा, लेकिन कब, यह कहना मुश्किल है। ट्रम्प ने चिंता व्यक्त की कि बड़े विशेषज्ञों ने यह नहीं सोचा था कि ईरान उन देशों पर हमला करेगा जो युद्ध में सीधे तौर पर शामिल नहीं हैं।

"ट्रम्प ने बड़ी चतुराई से यह संकेत दिया कि वह इस स्थिति को संभालने के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति हैं।"

ट्रम्प का मानना है कि नाटो सहयोगियों को अमेरिका की मदद करनी चाहिए, जैसा कि नाटो के अनुच्छेद पांच में लिखा गया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अमेरिका पर ट्रिलियन डॉलर का खर्च आता है और नाटो देशों को भी अमेरिका की मदद करनी चाहिए।

"अमेरिका को यह सोचना पड़ रहा है कि नाटो में अमेरिका औरों की मदद करता है या अमेरिका की ये लोग मदद करते हैं।"

ट्रम्प के बयानों पर मीम्स और रील्स भी वायरल हो रहे हैं, जिसमें उनकी मदद की गुहार को मजाक में लिया जा रहा है।

ईरान का दृढ़ रुख और फीफा विश्व कप

ईरान का रुख स्पष्ट है कि वह युद्ध विराम के लिए आगे से हाथ नहीं बढ़ाएगा। उनके विदेश मंत्री का कहना है कि अमेरिका को सबक सिखाया जाएगा। ईरान का कहना है कि वह किसी भी स्थिति में पीछे नहीं हटेगा।

इस बीच, फीफा विश्व कप के मद्देनजर ईरान ने कहा है कि वह अपनी टीम को अमेरिका नहीं भेजेगा, बल्कि मेक्सिको में मैच कराना चाहता है।

Rajesh Kashyap

Digital & Tech enthusiast। पिछले कई सालों से Geopolitics, Indian Finance और EV sector को closely follow कर रहा हूँ। Behind The Fold (behindthefold.in) का Founder — जहाँ हम headlines के पीछे की असली कहानी लाते हैं।

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