अमेरिका के महाशक्तियों के वाहक पर बड़ा हमला! कहीं भारत भी तो नहीं खतरे में?

अमेरिका के महाशक्तियों के वाहक पर बड़ा हमला! कहीं भारत भी तो नहीं खतरे में?
Story at a Glance:
  • अमेरिका की सैन्य शक्ति पर सवालिया निशान?
  • गेराल्ड आर. फोर्ड: विशालकाय लेकिन कमजोर?
  • आग और टॉयलेट युद्ध: क्या है असली वजह?

युद्ध के 21वें दिन एक ऐसी खबर आई है जिसने दुनिया भर में हड़कंप मचा दिया है। अमेरिका की दो प्रमुख सैन्य ताकतों पर बड़ा नुकसान पहुंचने की सुर्खियां हैं। पहली खबर अमेरिका के सबसे बड़े एयरक्राफ्ट कैरियर, यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड (USS Gerald R. Ford) पर हुए नुकसान से जुड़ी है, जो इजराइल के करीब तैनात था। दूसरी खबर अमेरिका के सबसे उन्नत लड़ाकू विमान, F-35 के निशाने बनाए जाने की है, जिसे दुनिया का सबसे आधुनिक विमान माना जाता है।

ईरान की नेतृत्व वाली कई हस्तियों को पहले ही नुकसान झेलना पड़ा है, और ऐसे में अमेरिका और इजराइल मिलकर इस युद्ध को खींचते चले जा रहे हैं। इसी कड़ी में, अमेरिका के सबसे शक्तिशाली नौसैनिक जहाजों में से एक, यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड, पर हुआ नुकसान चर्चा का विषय बन गया है। खबर है कि यह एयरक्राफ्ट कैरियर ईरान के साथ युद्ध के दौरान मरम्मत के लिए पीछे हट गया है। यह जहाज़ इजराइल के हाइफा शहर के नजदीक खड़ा था, और इसके पीछे हटते ही यह सुर्खी बनी कि ईरान ने इजराइल की हाइफा रिफाइनरी को निशाना बनाया है।

यह सब ऐसे समय पर हो रहा है जब ईरान के एक बैलेस्टिक मिसाइल सिस्टम ने अमेरिका के सबसे उन्नत और गायब होने में सक्षम माने जाने वाले, F-35 लड़ाकू विमान को निशाना बनाया है। फिफ्थ जनरेशन फाइटर जेट्स अपनी अदृश्यता के लिए जाने जाते हैं, जिसका अर्थ है कि उन्हें ट्रैक करना लगभग असंभव होता है। लेकिन ईरान ने इस धारणा को चुनौती दी है।

अमेरिका की सैन्य शक्ति पर सवालिया निशान?

अमेरिका अपनी सुपरपावर होने की पहचान अपनी नौसेना, थल सेना और वायु सेना की तीनों मोर्चों पर मजबूत उपस्थिति के कारण रखता है। लेकिन वर्तमान संघर्ष में, इन सेनाओं को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या इजराइल वाकई में अमेरिका के समर्थन के बिना या अमेरिका की बदलती परिस्थितियों में इस युद्ध को जारी रख पाएगा?

ईरान के साथ चल रहे युद्ध में, अमेरिका और इजराइल इस संघर्ष को अपने तरीके से आगे बढ़ा रहे हैं। लेकिन ईरान ने एक ऐसी रणनीति अपनाई है जिससे वह इस युद्ध को लंबा खींच सके। ईरान जानता है कि वह सीधे तौर पर अमेरिका के सामने युद्ध नहीं जीत सकता, लेकिन वह इसे अमेरिका के लिए इतना कठिन बना सकता है कि अमेरिका खुद इस युद्ध से पीछे हट जाए। इसी रणनीति का एक हिस्सा है यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर पर हुई घटना।

💡 "ईरान सीधे तौर पर अमेरिका को युद्ध में नहीं हरा सकता, लेकिन वह इसे इतना लंबा और मुश्किल बना सकता है कि अमेरिका खुद हार मान ले।"

एयरक्राफ्ट कैरियर वे विशाल युद्धपोत होते हैं जो लड़ाकू विमानों को ले जाने और उन पर ऑपरेशन करने में सक्षम होते हैं। अमेरिका का गेराल्ड आर. फोर्ड इस श्रेणी का सबसे बड़ा और सबसे उन्नत एयरक्राफ्ट कैरियर माना जाता है। इसे हाइफा के पास तैनात किया गया था।

खबरें फरवरी 2026 की हैं, जब युद्ध शुरू नहीं हुआ था, तब से ही यह चर्चा थी कि गेराल्ड आर. फोर्ड मध्य पूर्व में नौसैनिक बलों में शामिल होने के लिए आगे बढ़ रहा है। 24 फरवरी को यह खबर बनने लगी थी कि गेराल्ड आर. फोर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर हाइफा में डॉक करने के लिए बढ़ रहा है, क्योंकि तनाव बढ़ रहा था। इसके ठीक बाद 27 फरवरी को युद्ध शुरू हो गया।

यह फाइटर जेट कैरियर पहले वेनेजुएला के पास तैनात था, फिर इसे वहां से हटाकर इस क्षेत्र में भेजा गया। जब यह इजराइल के पास पहुंचा और यहां से युद्ध शुरू हुआ, तो इसकी तैनाती का महत्व और बढ़ गया।

गेराल्ड आर. फोर्ड: विशालकाय लेकिन कमजोर?

यह जहाज़ भूमध्य सागर में इजराइल के पास तैनात किया गया था। यह दुनिया का सबसे बड़ा एयरक्राफ्ट कैरियर कहा जाता है, जिसकी लंबाई 1106 फीट और चौड़ाई 256 फीट है। इसकी अधिकतम गति 56 किलोमीटर प्रति घंटे है और यह 1 लाख टन वजन उठा सकता है। सबसे खास बात यह है कि यह 90 लड़ाकू विमानों को अपने ऊपर ले जा सकता है।

इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पेट्रोल या डीजल पर नहीं चलता। यह अपनी बिजली खुद बनाता है, जो कि न्यूक्लियर फ्यूल से संचालित न्यूक्लियर रिएक्टर से उत्पन्न होती है। न्यूक्लियर रिएक्टर से बिजली बनाने के कारण इसे बार-बार डॉक करने की आवश्यकता नहीं पड़ती, और यह लंबी यात्राएं कर सकता है। यही इसकी ताकत भी है और कमजोरी भी।

यह एयरक्राफ्ट कैरियर लगभग 4500 लोगों के क्रू के साथ काम करता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें इतने बड़े सिस्टम को चलाने के लिए कम लोगों की आवश्यकता होती है, जो इसे अन्य जहाजों की तुलना में अधिक कुशल बनाता है। लेकिन 4500 लोगों का दल अपने आप में एक बड़ी संख्या है, और यही इन दिनों एक बड़ी समस्या का कारण बना हुआ है।

आग और टॉयलेट युद्ध: क्या है असली वजह?

18 मार्च को यह खबर सामने आई कि यूएस कैरियर फोर्ड, ईरान में तैनाती के दौरान जहाज पर आग लगने के बाद बंदरगाह लौट आया है। यह ईरान से लड़ने के लिए निकला था, लेकिन अब इसे मरम्मत के लिए ग्रीस के क्रेते द्वीप पर स्थित अमेरिकी नौसैनिक अड्डे पर ले जाया जा रहा है।

यह आग लगने की घटना अपने आप में एक बड़ा सवाल खड़ा करती है। क्या यह किसी दुश्मन के हमले का नतीजा थी, या यह जहाज के अंदर ही लगी थी? खबरें इस ओर इशारा करती हैं कि आग लगने के पीछे जहाज पर तैनात चालक दल का हाथ हो सकता है। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि यह जहाज़ 10 महीनों से युद्ध क्षेत्र में है और चालक दल के सदस्य लंबे समय से घर नहीं लौट पाए हैं।

चालक दल के सदस्य लंबे समय से जहाज की मरम्मत और उन्हें छुट्टी देने की मांग कर रहे थे। ऐसे में, जहाज पर आग लगना इस बात का संकेत हो सकता है कि चालक दल हताश हो गया है। आग इतनी भीषण थी कि उसे बुझाने में 30 घंटे लग गए, और यह खबर ग्लोबल टाइम्स जैसे चीनी मीडिया ने भी उठाई, जिसमें उन्होंने अमेरिका की सैन्य प्रणाली की विफलता को उजागर किया।

💡 "10 महीने की लगातार तैनाती और घर वापसी की तीव्र इच्छा ने अमेरिकी नौसैनिकों को इतना हताश कर दिया कि जहाज पर आग लगा दी गई।"

इस घटना के अलावा, इस एयरक्राफ्ट कैरियर पर एक और बड़ा मुद्दा है - "टॉयलेट वॉर"। 4500 लोगों के दल के लिए पर्याप्त टॉयलेट की सुविधा न होना एक गंभीर समस्या बन गई है। 10 महीने की लगातार यात्रा के कारण टॉयलेट जाम हो जाते हैं, और मानव मल का उचित निपटान न होने से जहाज पर गंदगी और बदबू फैल जाती है।

इस जहाज से जुडी ऐसी खबरें पहले भी आई हैं जहां टॉयलेट की समस्या के कारण नाविकों के बीच लड़ाईयां हुई हैं। टॉयलेट की सफाई में एक बार में लगभग 4 करोड़ रुपये का खर्च आता है, जो इस समस्या की गंभीरता को दर्शाता है। इन सभी समस्याओं के कारण, अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर को पीछे हटना पड़ा है।

F-35 का निशान बनाया जाना: एक बड़ा झटका

जब गेराल्ड आर. फोर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर पीछे हटा, तो उसी समय इजराइल के हाइफा पोर्ट पर ईरानियों का हमला हो गया। यह एक संयोग कहा जा सकता है, हालांकि हाइफा पर पहले भी हमले हो चुके हैं।

तीसरी और सबसे चौंकाने वाली खबर अमेरिका के F-35 लड़ाकू विमान से जुड़ी है। F-35 एक फिफ्थ जनरेशन स्टेल्थ फाइटर जेट है, जिसका मतलब है कि इसे रडार पर पकड़ना लगभग असंभव होता है। लेकिन हाल ही में, ईरान ने एक वीडियो जारी कर दावा किया है कि उन्होंने अपने बैलेस्टिक मिसाइल सिस्टम से एक F-35 को निशाना बनाया है।

आईआरजीसी (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स) ने दावा किया कि यह दुनिया की पहली घटना है जब F-35 को निशाना बनाया गया हो, क्योंकि यह अपनी अदृश्यता के लिए ही जाना जाता है। F-35 दुनिया के सबसे महंगे लड़ाकू विमानों में से एक है, और अमेरिका इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेचना चाहता है।

यह पहली बार नहीं है कि F-35 विवादों में रहा है। पिछले 7 सालों में यह 11 बार क्रैश हो चुका है, अक्सर इसे संभालना मुश्किल साबित हुआ है। लेकिन दुश्मन इसे निशाना नहीं बना सकता, यही इसकी सबसे बड़ी खूबी बताकर बेचा जाता था।

ईरान द्वारा F-35 को निशाना बनाए जाने की खबर ने दुनिया भर में खलबली मचा दी है। ईरान इस घटना को अपनी एक बड़ी सफलता के तौर पर प्रचारित कर रहा है, और सोशल मीडिया पर खूब सारे मीम्स वायरल हो रहे हैं। यह घटना अमेरिकी वायु सेना के लिए एक बड़ा झटका है, खासकर तब जब अमेरिका भारत को अपने फाइटर जेट बेचने की कोशिश कर रहा है।

💡 "F-35, जिसे दुश्मन की पकड़ से बाहर माना जाता था, अब ईरान के मिसाइल हमले का शिकार हो गया है, जिससे अमेरिकी सैन्य श्रेष्ठता पर सवाल उठ रहे हैं।"

अमेरिका की प्रतिक्रिया और नई तैनाती

इस घटना के बाद, ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि उस गिरे हुए F-35 को ढूंढने के लिए चिनूक हेलीकॉप्टर भेजे गए हैं। यह खबर कितनी सच है, यह तो बाद में पता चलेगा, लेकिन यह अमेरिकी सेना के लिए एक बड़ी शर्मिंदगी का कारण बन सकती है।

कुल मिलाकर, अमेरिका को इन दिनों अपनी सैन्य क्षमताओं की एक 'रियलिटी चेक' का सामना करना पड़ रहा है। हालाँकि, अमेरिका इन चुनौतियों से निपटने के लिए अन्य फाइटर जेट्स और एयरक्राफ्ट कैरियर्स को तैनात कर रहा है।

गेराल्ड आर. फोर्ड के हटने के बाद, अमेरिका ने यूएसएस ट्रिपोली (USS Tripoli) को इस क्षेत्र की ओर रवाना कर दिया है। यह जहाज दक्षिण चीन सागर में तैनात था, लेकिन अब इसे मध्य पूर्व की ओर भेजा गया है। इस जहाज को यहाँ पहुँचने में दो हफ्ते का समय लग सकता है।

इसके अलावा, यूएसएस बॉक्सर (USS Boxer), यूएसएस कॉमशक (USS Comstock) और यूएसएस पोर्टलैंड (USS Portland) जैसे युद्धपोतों को भी खाड़ी क्षेत्र की ओर भेज दिया गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि अमेरिका युद्ध से पीछे नहीं हट रहा है, बल्कि वह अपनी सैन्य ताकत को नए सिरे से व्यवस्थित कर रहा है।

अमेरिका का लक्ष्य ईरान के खर्ग द्वीप (Kharg Island) को निशाना बनाना हो सकता है, जो ईरान के तट के पास स्थित है। यह द्वीप ईरान के तेल निर्यात में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

कुल मिलाकर, गेराल्ड आर. फोर्ड का हटना और ट्रिपोली का उसकी जगह लेना यह दर्शाता है कि अमेरिका इस संघर्ष से खुद को बाहर नहीं खींच रहा है, बल्कि वह अपनी सेनाओं को बदल रहा है। इसके पीछे एक बड़ा कारण खर्ग द्वीप को निशाना बनाना भी हो सकता है।

यह देखना दिलचस्प होगा कि अमेरिका की ये नई रणनीतियाँ युद्ध के मैदान पर क्या प्रभाव डालती हैं, और क्या यह इजराइल को इस युद्ध में बने रहने में मदद कर पाएगा।

Rajesh Kashyap

Digital & Tech enthusiast। पिछले कई सालों से Geopolitics, Indian Finance और EV sector को closely follow कर रहा हूँ। Behind The Fold (behindthefold.in) का Founder — जहाँ हम headlines के पीछे की असली कहानी लाते हैं।

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