- सीरिया का भू-राजनीतिक महत्व और इतिहास
- अमेरिकी सेना की वापसी: वर्तमान परिदृश्य
- सीरिया का संक्षिप्त इतिहास
अमेरिकी सैनिक अपने सामान के साथ सीरिया छोड़कर जा रहे हैं। यह दृश्य कुछ साल पहले अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी की याद दिलाता है। अब सीरिया से भी अमेरिकी सेना की वापसी हो रही है। इसके पीछे क्या कारण हैं?
क्या सीरिया में युद्ध समाप्त हो गया है या स्थितियाँ सामान्य हो गई हैं? क्या पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप सीरियाई सेना को किसी अन्य देश में भेजकर ईरान पर बड़े हमले की तैयारी कर रहे हैं? क्या वे ईरान के डर से सीरिया छोड़ रहे हैं? ये सभी प्रश्न आपके मन में उठ रहे होंगे।
आज के इस विश्लेषण में हम इन सभी सवालों पर विस्तार से चर्चा करेंगे, इतिहास से लेकर वर्तमान तक, कि अमेरिकी सेना सीरिया से क्यों निकल रही है और इतनी तेजी से क्यों निकल रही है। इसके पीछे का वर्तमान कारण क्या है?
कई आंकड़े 10 से 12 साल पुराने हैं, जो बताते हैं कि अमेरिकी सेना इतने लंबे समय से यहां डेरा डाले हुए थी और अब वह यहां से जा रही है। हम इस पूरी घटना का विस्तार से विश्लेषण करेंगे।
इस पूरी घटना के केंद्र में निश्चित रूप से अल-शरा हैं, जिन्हें आपको याद रखना चाहिए। ये वही आतंकवादी थे जिन्हें कभी अमेरिका ने आतंकवादी घोषित किया था और उनकी जानकारी देने वाले को भारी इनाम की घोषणा की थी।
लेकिन आज अल-शरा ऐसे व्यक्ति बन गए हैं जो दशकों बाद सीरिया के राष्ट्रपति बने हैं, और अमेरिका ने उनका स्वागत किया है। तो क्या अमेरिका उनसे खुश हो गया है, इसलिए यह सब हुआ? हम इन सभी बातों पर चर्चा करेंगे।
सीरिया का भू-राजनीतिक महत्व और इतिहास
सीरिया इजराइल के उत्तर में स्थित एक देश है। इसकी राजधानी दमिश्क है, जो एक बहुत पुरानी सभ्यता का शहर माना जाता है। सीरिया की सीमा भूमध्य सागर और लेबनान से लगती है।
भू-राजनीतिक रूप से, सीरिया का महत्व बहुत अधिक है क्योंकि यह इजराइल और लेबनान दोनों के साथ सीमा साझा करता है। यदि ईरान को लेबनान की मदद करनी होती थी, तो यह इराक और सीरिया के माध्यम से ही संभव था।
ईरान एक शिया बहुल देश है। सीरिया में लंबे समय तक बशर अल-असद की सरकार रही, जो खुद शिया थे। लेबनान में हिजबुल्लाह, जो इजराइल के उत्तर में स्थित है और इजराइल के खात्मे के सपने देखता है, वह भी शिया था।
इस प्रकार, ईरान, सीरिया और लेबनान के बीच एक शिया समीकरण बनता था। इराक भी इस समीकरण का हिस्सा था, क्योंकि ईरान से शिया बहुल इराक के माध्यम से सीरिया होते हुए लेबनान तक हथियार पहुंचाए जाते थे। यह एक भूमि मार्ग था जिसके माध्यम से शिया समूहों को समर्थन मिलता था।
यह इतिहास कुछ साल पुराना है। अब, इजराइल के उत्तर में लेबनान के साथ इन दिनों इजराइल की जंग चल रही है, और बगल में सीरिया है। सीरिया में बशर अल-असद की सरकार 2024 में हट गई और 2025 में अल-शरा राष्ट्रपति बनकर आए। सीरिया में अल-शरा के राष्ट्रपति बनने के बाद क्या-क्या परिवर्तन हुए, हम उन्हें समझेंगे।
अमेरिकी सेना की वापसी: वर्तमान परिदृश्य
अप्रैल 2026 में, हसाका के कसराक एयरबेस से आखिरी अमेरिकी काफिला निकला। अमेरिकी सेंट्रल कमांड 2000 सैनिकों को जॉर्डन भेज रही है। सीरिया की सीमा जॉर्डन से जुड़ी हुई है, इसलिए यह वापसी भूमि मार्ग से जॉर्डन के रास्ते हो रही है।
जॉर्डन इस समय महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, खासकर ईरान पर हुए हमलों के बाद। अमेरिका ने ईरान पर हमले के लिए जॉर्डन का खूब इस्तेमाल किया है। इजराइल और जॉर्डन से ही सीरिया पर हमले किए गए थे। बड़ी संख्या में सैनिकों को यहां से वहां विस्थापित किया गया है।
सीरियाई सरकार का आधिकारिक पत्र, जिसमें कहा गया है कि जब अमेरिकी सेना जा रही है, तो वे पूरा सिस्टम सीरियाई सरकार को सौंप कर जा रहे हैं। यानी, अमेरिकी सेना ने सीरिया में अपने बेस सीरियाई सेना को सौंप दिए हैं।
उन्होंने ऐसे ही नहीं छोड़ा है, बल्कि सीरिया की सेना को यह बेस सौंपे गए हैं और अल-शरा की सरकार को यह जिम्मेदारी दी गई है कि अब वे इसे चलाएंगे।
सीरिया का संक्षिप्त इतिहास
सीरिया के बारे में, पहले ऑटोमन साम्राज्य का हिस्सा हुआ करता था। प्रथम विश्व युद्ध के बाद, जब ब्रिटेन और फ्रांस का संयुक्त समूह जीत गया, तो सीरिया पर फ्रांसीसियों का कब्जा हो गया। 1946 में यह फ्रांस से आजाद हुआ।
आजादी के बाद, 1963 में यहां बाथ पार्टी सत्ता में आई, जो कुछ हद तक उदार और धर्मनिरपेक्ष थी और विकास पर ध्यान केंद्रित करना चाहती थी।
लेकिन 1970 में हाफिज अल-असद, जो बशर अल-असद के पिता थे, ने सत्ता पर कब्जा कर लिया। उन्होंने एकल-पार्टी शासन की तरह काम किया और 1970 से 2024 तक उनका परिवार ही सीरिया पर शासन करता रहा।
बीच में, 1982 में सीरिया में विद्रोह हुआ, जिसे दबाने में हाफिज अल-असद की भूमिका महत्वपूर्ण रही। 2000 में हाफिज की मृत्यु के बाद, उनके बेटे बशर अल-असद राष्ट्रपति बने।
लोगों को उम्मीद थी कि वह अधिक उदार होंगे और कानून के साथ आगे बढ़ेंगे। लेकिन उन्होंने भी काफी हद तक चरमपंथ अपनाया। उनके खिलाफ सीरिया में कई प्रदर्शन हुए।
बशर अल-असद शिया मुस्लिम थे, जिन्हें ईरान का हमेशा समर्थन प्राप्त था और रूस हमेशा उनके साथ खड़ा रहा। रूस ने बशर अल-असद को इतना संरक्षण दिया कि जब अल-शरा राष्ट्रपति बने, तो बशर अल-असद को रूस में संरक्षण मिला।
आज भी बशर अल-असद रूस में रहते हैं। यहां से उड़कर वे रूस चले गए थे, और उनके जाने के साथ ही रूसी सेना भी वहां से हट गई।
इस बीच, उनके खिलाफ जितने भी आंदोलन हुए और असंतोष फूटा, अरब स्प्रिंग के समय भी, उन्होंने बड़े पैमाने पर दमन किया और अपने ही लोगों पर रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल करके विद्रोह को कुचल दिया।
इस दौरान रूसी सेना ने उनका बहुत साथ दिया। रूस की सेना लगभग तब से ही बशर अल-असद के साथ सीरिया में टिकी रही और जहां भी जरूरत होती, वे हथियार लेकर हमला करते थे।
आईएसआईएस का उदय और अमेरिकी हस्तक्षेप
2011 में पनपे असंतोष के बाद, 2014 में सुन्नियों का प्रभाव बढ़ने लगा। सीरिया के मुसलमानों के बीच यह तर्क दिया जाने लगा कि बशर अल-असद को हटाया जाना चाहिए। यहीं से आईएसआईएस (इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया) ने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए।
इराक के बाद सीरिया में, सुन्नी बहुल बगदादी के नेतृत्व में एक देश बनाने की मांग होने लगी। 2014 में सीरिया में आईएसआईएस की एंट्री शुरू हुई और उसने बशर अल-असद के समानांतर अपना एक आतंकवादी समूह बना लिया।
यह आतंकवादी समूह सीरिया को अस्थिर करने के साथ-साथ अमेरिका के लिए भी खतरा बनता जा रहा था। अमेरिका को यह अहसास हुआ कि दुनिया के किसी भी कोने से अगर उन्हें धमकी दी जाएगी, तो वे वहां पहुंचकर उन्हें मार गिराएंगे।
इसलिए, 2014 में अमेरिकी सेना सीरिया में आ गई। उनका तर्क था कि वे आईएसआईएस को खत्म करेंगे, और उन्होंने 2019 तक सीरिया में आईएसआईएस को पूरी तरह खत्म भी कर दिया।
इस बीच, एक दिलचस्प बात हुई। बशर अल-असद के लिए रूसी सेना सीरिया में थी, और अमेरिकी सेना आईएसआईएस को खत्म करने आई थी। अब सवाल यह उठता है कि उनका समर्थन कौन कर रहा था?
अमेरिकी सेना का उत्तर सीरिया में सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्सेज (एसडीएफ) कर रही थी, जो असल मायने में कुर्द फोर्सेज थीं। कुर्द वे लोग हैं जो इराक, सीरिया और तुर्की में अपने लिए अलग देश की मांग करते हैं। अमेरिका चाहता था कि वे सीरिया में प्रवेश करें।
एसडीएफ और अमेरिका के बीच अच्छी पटरी बैठी, और उन्होंने मिलकर आईएसआईएस को खत्म किया। अमेरिका ने सीरिया में एसडीएफ को बचाए रखा और कुर्द लोगों के लिए काफी काम किया। इस प्रकार, सीरिया अमेरिका और रूस दोनों के लिए एक युद्ध का मैदान बन गया था, लेकिन वे आपस में नहीं लड़ते थे।
अमेरिका जब सीरिया में बम गिराना चाहता था, गिरा लेता था। बशर अल-असद के खिलाफ अमेरिका खुलकर खड़ा नहीं था, लेकिन उनकी नीतियों का पुरजोर विरोध करता था, क्योंकि रूस और अमेरिका के बीच प्रतिद्वंद्विता थी।
ऐसे बीच में कई दौर आए जब बशर अल-असद के खिलाफ भी ट्रंप ने पिछले कार्यकाल में घोषणा की थी कि उनके खिलाफ मिसाइलें चलाओ, क्योंकि उन्होंने रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया था।
अल-शरा का उदय और अमेरिकी वापसी का वर्तमान कारण
अब सीधे मुद्दे पर आते हैं। इस बीच, सीरिया के अंदर दिसंबर 2024 में बड़ी अस्थिरता आने लगी। इसका कारण था असद पर दबाव और बिगड़ती अर्थव्यवस्था। अर्थव्यवस्था क्यों बिगड़ी, इसके कारणों को भी देखते हैं। असल में, सीरिया लंबे समय से रूस के समर्थन से जीवित रह रहा था, या कहिए बशर अल-असद जीवित रह रहे थे।
जब यूक्रेन और रूस युद्ध शुरू हुआ, तो रूस ने अपना ध्यान सीरिया से हटाकर यूक्रेन पर केंद्रित कर दिया। बड़ी संख्या में रूसी सैनिकों को युद्ध के लिए बुला लिया गया।
ऐसे में, सीरिया में असद की रक्षा के लिए कोई नहीं बचा। क्षेत्रीय समूहों ने तत्काल प्रभाव से कहा कि अब खाली कराने और कब्जा करने का समय आ गया है, क्योंकि बशर अल-असद के पास कोई नहीं है।
रूस के पीछे हटने से सीरिया के अंदर एचटीएस (हयात तहरीर अल-शाम) नामक समूह, जिसे आज के वर्तमान राष्ट्रपति अल-शरा ने नेतृत्व किया, उन्होंने पूरे क्षेत्र पर कब्जा करने का निर्णय लिया।
रूसी सेना पीछे हटने लगी और अल-शरा, जो एचटीएस से बने आतंकवादी हैं, उन्होंने असद सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए पूरे सीरिया में सत्ता परिवर्तन का बिगुल बजा दिया।
हालांकि अमेरिका ने शुरुआत में उन्हें आतंकवादी माना था और उन पर 10 मिलियन डॉलर का इनाम रखा था। लेकिन वह इनाम धीरे-धीरे बदल दिया गया, क्योंकि अमेरिका को लगा कि यह असद को हटाने में कामयाब होगा, और ऐसा ही हुआ।
जब रूस ने अपनी सेना हटाई, तो बशर अल-असद बच नहीं पाए और अल-शरा ने देश पर कब्जा करना शुरू कर दिया। उन्होंने बड़े क्षेत्र पर कब्जा जमाया। अमेरिका पीछे से देखता रहा।
मार्च में, उन्हें एक अस्थायी संविधान लिखने का मौका मिला। जनवरी 2025 में ही उन्हें स्वीकार कर लिया गया था कि वे सीरिया चलाएंगे। मई 2025 में, डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब के कहने पर उन पर लगाए गए प्रतिबंधों को हटा दिया और उन्हें एक बार फिर मौका देने का फैसला किया गया।
अल-शरा, जिन पर अमेरिका ने प्रतिबंध लगाए थे और जिन्हें आतंकवादी माना था, उन्हें नवंबर 2025 में व्हाइट हाउस बुलाया गया। यह दशकों बाद हो रहा था, क्योंकि बशर अल-असद कभी वहां नहीं गए थे। अल-शरा पहली बार एक आतंकवादी से राष्ट्रपति बने थे जिनका अमेरिका ने स्वागत किया था। इस प्रकार, अमेरिका और सीरिया अब एक दूसरे के करीब आने लगे थे।
अब सवाल उस एसडीएफ का हुआ, जो अमेरिका की मदद से कुर्द फोर्सेज वाली थी और उनके साथ काम करती थी? तो एसडीएफ की भी उनके साथ मित्रता कराई गई। कहा गया कि ठीक है साहब, अब आपके ऊपर से प्रतिबंध हटाते हैं और आपके ऊपर से प्रतिबंध हटाकर सीरिया को आप पूरी तरह एकीकृत करो।
अमेरिका को दो चीजें चाहिए थीं: पहला, सीरिया की जमीन का उपयोग इजराइल पर हमला करने के लिए नहीं होना चाहिए। दूसरा, ईरान से होकर सीरिया होते हुए लेबनान में बैठे हिजबुल्लाह तक बम नहीं पहुंचाओगे।
जब यह आश्वासन मिल गया, तो अमेरिका ने अपनी सेना हटाकर उन्हें सारे बेस सौंपने का आदेश दे दिया। और इसी के साथ, ट्रंप ने सीरिया से अपनी सेना हटाने का आदेश दे दिया।
आज एक तरीके से सीरिया प्रो-अमेरिका हो चुका है, या यह कहिए कि इजराइल के लिए अमेरिका ने सीरिया के साथ समझौता कर लिया है।
निष्कर्ष: एक भू-राजनीतिक जीत?
इसके कई कारण एक साथ तलाशे जा सकते हैं। पहला, अमेरिका ने आईएसआईएस के लक्ष्य को खत्म कर दिया है, इसलिए उसे लौटना पड़ा। दूसरा कारण, सीरिया और अमेरिका ने एसडीएफ और सीरियाई सरकार के बीच समझौता करा दिया है। अब उसे वहां रहने की जरूरत नहीं है, इसलिए वह निकल गया।
एसडीएफ का एक बड़ा हिस्सा था, और अब उन्होंने इनके साथ बातचीत करा दी कि तुम लोग आपस में मिलकर रह लो।
अमेरिका ने यह आश्वासन ले लिया है कि वे अब किसी भी प्रकार से अपनी भूमि का इस्तेमाल हिजबुल्लाह के साथ मिलकर इजराइल के खिलाफ नहीं करेंगे।
पूरी तरह से अमेरिका दुनिया को यह दिखाने में कामयाब हो गया कि देखो, रूस को तो हमने पछाड़ दिया। अब हम यहां रहकर क्या करें? क्योंकि रूस अपनी सेना पहले ही यहां से निकाल चुका है। तो अमेरिका को अपना कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं दिख रहा है।
ईरान में क्योंकि अब तनाव बढ़ रहा है, तो उस सेना को उठाकर जॉर्डन भेजा जाए और वहां से उसके ऊपर युद्ध कराया जाए। यहां से उठाकर वह सेना जॉर्डन भेज दी गई है कि चलो भाई, अब यहां से आगे निकलते हैं।
कुल मिलाकर, अमेरिका ने इसे एक बहुत बड़ी भू-राजनीतिक जीत के रूप में देखा जाना चाहिए कि सीरिया में अमेरिकी सेना हट रही है। वे हार कर नहीं, बल्कि जीतकर जा रहे हैं।
उन्होंने अपनी सरकार बिठा दी है, जो आने वाले समय में इजराइल के लिए घातक नहीं होगी और ईरान के लिए युद्ध का मैदान नहीं बनेगी, और हिजबुल्लाह की मदद नहीं करेगी।
और तो और, अब सीरियाई सरकार ही हिजबुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई कर रही है। हाल ही में ऐसे आतंकवादियों को पकड़ा गया जो सीरियाई जमीन का उपयोग इजराइल पर हमला करने के लिए करने वाले थे, ताकि इजराइल सीरिया पर गोले दाग सके।
ऐसे में, यहां पुलिस कार्रवाई में यह चीज पकड़ी भी गई और अल-शरा की सेना ने हिजबुल्लाह के आतंकवादियों को सीरिया से गिरफ्तार किया। तस्वीरें बाहर निकल कर आईं।
कुल मिलाकर, अमेरिका रूस को हराने में कामयाब हुआ है, सीरिया में अपनी सेनाओं को बाहर निकालने में कामयाब हुआ है, और एक प्रकार से अपना प्रभाव बनाने में कामयाब हुआ है।
उम्मीद है कि अब आप लोगों को यह जानकारी अच्छे से समझ आ गई होगी। सीरिया के अंदर अब शांति है। ट्रंप को इसे एक जीत के रूप में लेना चाहिए, और कुल मिलाकर, ट्रंप अब उस सेना का उपयोग ईरान पर अगर कर पाए, तो यह अपने आप में बड़ी चीज बनेगी।