- ईरान के विदेश मंत्री के बयान के बावजूद हमला
- भारत की तीव्र प्रतिक्रिया और ईरान के राजदूत को समन
- आईआरजीसी और सरकार के बीच मतभेद का संदेह
हाल ही में, स्टेट ऑफ हॉर्मोज से गुजर रहे दो भारतीय जहाजों पर ईरान की तरफ से गन फायर किया गया है, जिसके चलते भारतीय जहाज लौट गए। यह घटना ऐसे समय में हुई है जब अमेरिका और ईरान के बीच सीज फायर की बातें चल रही हैं और स्टेट ऑफ हॉर्मोज के खुलने-बंद होने की खबरें लगातार आ रही हैं।
विशेष रूप से तब जब स्टेट ऑफ हॉर्मोज को लेकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में ट्रंप का फैलाया हुआ एक संदेश दुनिया को यह कहने के लिए था कि स्टेट ऑफ हॉर्मोज खुल गया है और लोग यहां से निकल सकते हैं। ईरान के विदेश मंत्री का भी बयान था कि स्टेट ऑफ हॉर्मोज खुल गया है। इसके बावजूद, भारतीय जहाज जब वहां से निकलने लगे तो उन पर हमला होता है।
ईरान के विदेश मंत्री के बयान के बावजूद हमला
यह घटना ईरान के विदेश मंत्री के उस बयान के बाद हुई जिसमें उन्होंने कहा था कि स्टेट ऑफ हॉर्मोस पूरी तरह से खुल गया है। इस घटना के बाद, भारतीय झंडे लगे ऑयल टैंकरों पर आईआरजीसी की गन बोट्स द्वारा हमला किया गया। हॉर्मोज में हुई इस गोलीबारी पर भारत में तीव्र प्रतिक्रिया हुई।
तीव्र प्रतिक्रिया का एक बड़ा कारण यह था कि भारत ईरान के प्रति तटस्थ रहा था, न तो ईरान के समर्थन में और न ही उसके विरोध में। अमेरिका और ईरान के मामले में, भारत ने अपनी तटस्थता को इस प्रकार बनाए रखा कि भारत का तटस्थ होना ईरान के साथ होने जैसा था। भारत ने इज़राइल से मित्रता रखते हुए भी ईरान के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया।
भारत ने पूरे समय युद्ध के दौरान संयम बरतने की अपील की, नागरिकों को नुकसान न पहुंचाने और वाणिज्यिक गलियारों को खुला रखने की बार-बार अपील की। ऐसे में, जब यहां से गुजरते जहाजों पर हमला होता है, तो भारत में ईरान के प्रति जो भावनाएं बन रही हैं, जिनमें भारतीयों द्वारा ईरान की मदद के लिए कई प्रकार की सहायता भेजी गई है, क्या उन सब पर भारत सरकार रोक लगा देगी?
क्या ईरान के लिए जो सार्वजनिक भावना पैदा हो रही है, उसके खिलाफ भारत सरकार अब कार्रवाई करेगी? क्या भारत सरकार अपना एक रुख स्पष्ट करेगी? क्योंकि यह बात ईरान के लिए बहुत घातक सिद्ध हो सकती है।
भारत की तीव्र प्रतिक्रिया और ईरान के राजदूत को समन
भारत के विदेश मंत्रालय ने ईरान के अधिकारियों को तलब किया। राजदूत को समन करके कहा गया कि वे अपने शीर्ष अधिकारियों से बात करें और उन्हें बताएं कि भारत के हितों पर इस प्रकार का हमला ठीक नहीं है, और भारत ने अपना तीव्र विरोध दर्ज कराया है।
लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत में बैठे राजदूत भी कह रहे हैं कि यह गलत हुआ। ईरान भी इस बात को गलत मान रहा है। तो क्या हमला आईआरजीसी ने कर दिया? और क्या आईआरजीसी ईरान के नियंत्रण से बाहर चला गया है?
आईआरजीसी और सरकार के बीच मतभेद का संदेह
यह इसलिए पूछा जा रहा है क्योंकि विदेश मंत्रालय की तरफ से और आईआरजीसी की तरफ से आ रहे विरोधाभासी तथ्य कहीं न कहीं ईरान के एक और रहस्य को उजागर नहीं कर रहे हैं। जैसा कि शुरुआत में कहा गया था, क्या ईरान अफगानिस्तान तो नहीं बन गया है?
क्योंकि अफगानिस्तान में जिस प्रकार से तालिबान ने अपने नियंत्रण में चीजें ले ली थीं, क्या ईरान में आईआरजीसी ने अपने हाथ में नियंत्रण नहीं ले लिया है? आज के इस विश्लेषण में इन सब पर विस्तार से चर्चा की जाएगी।
जहाजों पर हमले का विवरण
सूचना यह है कि यह हमला भारत के जहाजों पर हुआ था जो भारत के लिए तेल लेकर आ रहे थे। हमला आईआरजीसी की तरफ से किया गया था, जो उनकी गन बोट्स द्वारा किया गया था, और यह स्टेट ऑफ हॉर्मोज में हुआ था।
असल में, जब दो जहाज कच्चा तेल और गैस लेकर भारत की ओर रवाना हुए, तो उनके साथ 14 और जहाज भी थे जिन्हें आईआरजीसी ने रोक दिया। आईआरजीसी, जो स्टेट ऑफ हॉर्मोज पर गन बोट्स के माध्यम से नियंत्रण कर रहा है, ने उन जहाजों को वापस लौटा दिया। फायरिंग में 13 जहाज फारस की खाड़ी से अलग-अलग जगहों पर वापस लौट गए।
एक जहाज पर गोली लगी, लेकिन वह जहाज स्ट्रेट पार करने में सफल रहा। मरीन ट्रैफिक डेटा के अनुसार, जब यह जहाज यहां से निकल रहे थे, तो लारक नामक द्वीप को पार करने के बाद जब वे धीमे हुए, तो उन्हें यू-टर्न लेकर लौटा दिया गया।
सरमार हेरार्ड के डेटा की अगर बात मानें, तो ये तेल से लदे ट्रक थे, मतलब वो जहाज थे, और ये इराक से तेल लेकर आ रहे थे।
गोलीबारी और चेतावनी की रिकॉर्डिंग
कुछ इस तरह से तेल लेकर आ रहे जहाजों पर जब गोलीबारी हुई, तो यह गोलीबारी टैंकर ट्रैकर्स के मुताबिक चैनल 16 पर एक ऑडियो रिकॉर्डिंग वायरल हुई, जिसमें पता चला कि जहाजों को आईआरजीसी की नौसेना द्वारा पहले सूचित किया गया था कि वे पीछे हटें।
इसमें दो अलग-अलग तरह के बयान आ रहे हैं। कुछ का कहना है कि आईआरजीसी ने सूचना भी नहीं दी और सीधा फायरिंग कर दी। टैंकर्स ट्रैकर के अनुसार, स्टेट ऑफ हॉर्मोज के अंदर इस तरह की बातचीत रिकॉर्ड हुई है, जिसमें वे जहाजों को पीछे हटने के लिए मजबूर कर रहे हैं।
लारक द्वीप के पास की घटना
यह लारक नामक द्वीप है, जो स्टेट ऑफ हॉर्मोज के पास है। इराक से तेल लेकर भारत के जो तेल जहाज आ रहे थे, उन्होंने एक जहाज यहां तक पहुंचाया था, एक इसके नजदीक पहुंचा था। इसे यहीं से रिटर्न करा दिया गया और एक जहाज को यहां से रिटर्न करा दिया गया, मतलब दोनों जहाजों को रिटर्न कराया गया।
यहां पर ईरानी फोर्स द्वारा घोषणा करके जहाजों को इस प्रकार से वापस भेजा गया। यहां पर जहाजों द्वारा अपनी तरफ से सूचना दी जाती है कि आप फायरिंग न करें। जैसा भी है, उसके हिसाब से जहाज पीछे की तरफ लौटना शुरू हो जाते हैं।
जहाजों के नाम और इराक से तेल का आयात
इन जहाजों के नाम थे जग अर्नव और दूसरे का नाम था सनमार हेराल्ड, जो ईरान के इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड के तय मार्ग से हटने का आदेश पाकर पीछे हटे। ओमान के उत्तर-पूर्व की तरफ से, यह वाला क्षेत्र ओमान का पास है और ओमान के नॉर्थ ईस्ट में, इन्होंने माइंस बिछाई हुई हैं।
और उन माइंस के चलते जहाजों को ईरान की तरफ से होकर निकलना पड़ता है। तो इन्होंने अपनी बोट्स भी ओमान वाली साइड में तैनात की हुई हैं, और यहां से जहाजों पर फायरिंग की जा रही थी।
जानकारी सामने आई कि उन्होंने अपनी गन बोट्स से हमला किया था और ये गन बोट्स लगभग 20 नॉटिकल माइल्स की दूरी से ऑपरेट हो रही थीं, ओमान के तट से, यानी कि बिल्कुल मध्य में से जल के मध्य से हो रही थीं। जिन जहाजों पर भारतीय झंडे लगे थे, जग अर्नव उनमें से एक का नाम था, एक का नाम सनमार हेराल्ड था।
और यहां पर जग अर्नव नाम के जहाज पर फायरिंग हुई थी और दूसरा जहाज सुरक्षित रहा। ये इराक से 20 लाख बैरल तेल लेकर आ रहे थे। मतलब समझकर देखिए कि भारत की ओर तेल लेकर इराक से चले आ रहे जहाजों पर यहां फायरिंग हुई।
भारत के जहाजों पर हमले के पीछे के सवाल
आपको याद होगा कि शुरुआती दौर में स्टेट ऑफ हॉर्मोज से भारतीय जहाजों का गुजरना एक बड़ी सुर्ख़ी बना था। कहा गया था कि ईरान ने भारतीय जहाजों को आने दिया। लेकिन अचानक ऐसी परिस्थिति क्या हुई कि ईरान ने भारतीय जहाजों को नहीं आने दिए?
पहला सवाल: क्या भारतीय जहाज पहले पैसे दे रहे थे और अब पैसे देने से इनकार कर दिया? दूसरा सवाल: क्या भारत को लेकर ईरान में मतभिन्नताएं हो चुकी हैं? क्या ईरान भारत को लेकर बंट चुका है?
ईरान के अंदर वर्तमान सरकार में बैठे विदेश मंत्रालय और आईआरजीसी इस फैसले को लेकर बंटे हुए हैं कि भारतीय जहाजों को जाने देना है या नहीं देना है, क्योंकि यह फायरिंग अपने आप में कई सवाल खड़े करती है।
यह सवाल ऐसे समय पर जब भारत अपनी कूटनीति के दम पर अपने जहाजों को निकालने में कामयाब हुआ हो और उसके बाद युद्ध के लगभग 40 दिन बीतने के बाद भारतीय जहाजों पर हमला कई सवाल खड़े कर देता है।
भारत का रुख और ईरान के प्रति भावनाएं
इजराइल-ईरान संघर्ष में भारत ने अपना रुख शुरुआत से ही स्पष्ट रखा है और कहा है कि स्टेट ऑफ हॉर्मोज से होते हुए वाणिज्यिक व्यापार पर किसी भी प्रकार का असर नहीं पड़ना चाहिए। भारत ने संयुक्त राष्ट्र में भी ईरान के विरुद्ध लाए गए प्रस्ताव पर रूस और चीन के वीटो के पक्ष में किसी तरह का बयान नहीं दिया था।
भारत ने केवल एक ही बात कही थी कि रास्ता खुला होना चाहिए, वाणिज्यिक गलियारे खुले होने चाहिए, नागरिकों पर हमला नहीं होना चाहिए। कुछ लोगों का मानना है कि शायद ईरान इस बात पर नाराज हो कि बहरीन द्वारा लाए गए प्रस्ताव, जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में था, भारत ने वहां पर उस प्रस्ताव को साथ में पास कराने पर सहमति दी थी, सह-प्रायोजक बनकर भारत खड़ा हुआ था।
हालांकि यह बात पुरानी हो चुकी है। इसे रूस और चीन का वीटो मिला था। रूस और चीन ने स्टेट ऑफ हॉर्मोज को खुलवाने में अपनी तरफ से कोई भी सहयोग देने से इनकार कर दिया था। परिणामस्वरूप, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने इस रास्ते को खुलवाने पर कोई भी जोर नहीं दिया। भारत बहरीन के साथ था कि चलो भाई ठीक है, रास्ता खुले तो सबके लिए बेहतर होगा।
लेकिन इन सभी बातों के बीच, भारत बार-बार संयुक्त राष्ट्र में यह कहता रहा है कि वाणिज्यिक गलियारों पर किसी का नियंत्रण नहीं होना चाहिए, स्टेट ऑफ हॉर्मोज खुलना चाहिए, मसलों को बातचीत के जरिए सुलझाना चाहिए। भारत हर बार संयुक्त राष्ट्र की बातों का पक्षधर रहा है, किसी भी पार्टी को कभी भी भारत ने पक्ष नहीं लिया है।
ऐसे में, भारत का यह कहना है कि भाई, हमारी स्थिति साफ है। भारत के लिए अपनी ऊर्जा और आर्थिक सुरक्षा के लिए खास चिंता की बात हॉर्मोज स्टेट से होती हुई वाणिज्यिक शिपिंग है। ऐसे में यह बात और मायने रखती है जब शुरुआती दौर में भारत के जहाजों पर हुए हमले से कुछ नाविकों की जान चली गई थी।
भारत ने इस मुद्दे को भी संयुक्त राष्ट्र में उठाया था। हालांकि, भारत फिर भी ईरान के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रहा है। मतलब समर्थन भले ही मौखिक रूप से न रहा हो, लेकिन भारत के अंदर ईरान के प्रति भावनाएं सकारात्मक रही हैं।
ईरान के प्रति भारत की सहानुभूति
ईरान के प्रति सकारात्मक भावनाएं इसलिए हैं क्योंकि भारत का हमेशा से यह मानना रहा है कि ईरान अपने देश में रहते हुए किसी दूसरे देश पर हमले से पहले अपने ही लोगों को मरवाता जा रहा है। अमेरिका द्वारा हमलों में ईरान का बड़ा नुकसान हो रहा है।
और हमारे भारत में अक्सर युद्ध के दौरान या किसी भी इस तरह के युद्ध में जो बहुत बुरी तरह हार रहा हो, जिसके सारे विकल्प खत्म होते चले जा रहे हों, जिसके यहां आमजन की मौत हो रही हो, लोग सहानुभूति करने लगते हैं। शुरुआत में ही अमेरिका द्वारा दागी गई मिसाइल में कुछ बच्चियों की जान चली गई थी, लगभग 200 के आसपास उनकी संख्या बताई गई थी।
तो भारत में उसके प्रति एक बहुत ज्यादा भाव था कि यह गलत हरकत हुई है जो अमेरिका द्वारा की गई है। इसी बीच, भारत के कई क्षेत्रों ने ईरान के प्रति सहानुभूति दिखाते हुए, विशेष रूप से कश्मीर की तरफ से काफी सारा डोनेशन युद्ध प्रभावित ईरान की तरफ भेजा गया।
ईरान ने इस बात को स्वीकार भी किया और उनकी तारीफें भी दीं कि लोगों ने अपनी पिगी बैंक तक ईरान को दे दी हैं। भारत को धन्यवाद भी दिया गया कि आपकी तरफ से मदद भेजी जा रही है।
भारत की नाराजगी और ईरान के राजदूत को तलब करना
ऐसे में, ईरान को जो मदद भारत से मिल रही थी, उसके बावजूद भी अगर यह हरकत हो रही है कि ईरान भारतीय जहाजों पर हमला पसंद कर रहा है, तो इस पर भारत की नाराजगी स्वाभाविक है और यही हुआ। भारत की तरफ से ईरान के राजदूत को तलब किया गया।
विदेश मंत्रालय द्वारा बुलाकर कहा गया कि आप जाकर कह दीजिए उनके नाम राजदूत का नाम मोहम्मद फतह अली है। इनको कहा गया कि आप जाकर अपनी तरफ से हमारी तरफ से प्रतिक्रिया दीजिए अपने उन लोगों को कि भारतीय जहाजों के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए था।
यहां पर भारत के प्रवक्ता ने यह भी कहा कि हमने उनसे इस बारे में अपनी तरफ से प्रतिक्रिया दर्ज करा दी है और कहा है कि यह सही नहीं है। भारतीय जहाजों पर होने वाले हमले ठीक नहीं हैं।
ईरानी प्रतिनिधि का बयान और भारत-ईरान संबंध
इसके बाद, ईरानी सुप्रीम लीडर के प्रतिनिधि जो भारत आए हुए हैं, उन्होंने कहा कि भारत के प्रति ईरान में बड़ा ही सॉफ्ट कॉर्नर है। वे यह मानते हैं कि हम युद्ध नहीं चाहते, हम शांति चाहते हैं। उम्मीद करते हैं कि दूसरा पक्ष भी शांति की अपील करेगा।
ईरान और भारत के रिश्ते मजबूत हैं और उन्हें इस घटना की जानकारी नहीं है। हम उम्मीद करते हैं कि सब ठीक होगा और मामला सुलझ जाएगा। ऐसा कहते हुए, जो ईरान के सुप्रीम लीडर के प्रतिनिधि डॉ. अब्दुल मजीद हकीम हैं, उन्होंने समाचार एजेंसी को यह बात बोलते हुए कहा कि भारत और ईरान लंबे समय से साथ रहे हैं और आने वाले समय में भी एक-दूसरे के साथ रहने वाले हैं।
आईआरजीसी और सरकार के बीच टकराव की आशंका
ऐसे में, यहां की घटना से एक और संदेश निकलता है, और वह संदेश यह कि स्टेट ऑफ हॉर्मोज को लेकर टेक्निकली जो लोग यहां पर राजदूत बनकर बैठे हैं या प्रतिनिधि बनकर आए हुए हैं या बातचीत कर रहे हैं, हमारी समाचार एजेंसियों के साथ वार्ता में हैं, यहां पर जो विदेश मंत्री बैठे हुए हैं, अरागची, उन सबके साथ कुछ और गड़बड़ भी हो रही है।
जैसा आप सभी जानते हैं कि ईरान के राष्ट्रपति पजेशकियन को कोई भी नहीं पूछ रहा है। अपनी तरफ से बस ट्वीट कर देते हैं। न तो उन्हें मुजतबा खमनई से मिलने दिया गया और न ही किसी अंतरराष्ट्रीय वार्ता में उन्हें शामिल किया गया। उन्हें एक तरफ साइडलाइन किया गया है।
ऐसे ही अभी के लिए ऐसा लगता है कि स्टेट ऑफ हॉर्मोज को लेकर जो अरागची का उस दिन वाला बयान था, जिसमें उन्होंने कहा था कि स्टेट ऑफ हॉर्मोज खुल गई है, उसके खिलाफ लगता है कि आईआरजीसी हो गई है। मतलब ईरान के अंदर अब दो धड़े बन गए हैं।
एक धड़ा जो चाहता है कि अब यहां से आगे समझौता हो और दूसरा धड़ा जो चाहता है कि स्टेट ऑफ हॉर्मोज पर आईआरजीसी का नियंत्रण हो। कारण यही है।
अरागची के ट्वीट और आईआरजीसी की प्रतिक्रिया
कारण क्या है न कि सैयद अरागची, जो यहां के विदेश मंत्री हैं, उन्होंने 17 अप्रैल को ट्वीट किया था, खुद से यह कहा था कि स्टेट ऑफ हॉर्मोज डिक्लेअर कंप्लीटली ओपन फॉर द रिमेनिंग पीरियड ऑफ़ सीज फायर, यानी 21 अप्रैल तक के लिए यह खोल दिया गया है। इसी को ट्रंप ने कोट करते हुए कहा था कि सीज स्टेट ऑफ हॉर्मोज खुल गया है।
तो 17 अप्रैल की शाम को आप ट्वीट करते हो। भारतीय जहाज इसी के चलते निकलना शुरू होते हैं। अब जैसे ही निकलना शुरू होते हैं और आप उनके ऊपर फायरिंग कर देते हैं। तो इसका मतलब सैयद अरागची की बातों में दम नहीं है। अमेरिका के राष्ट्रपति की बातों में भी दम नहीं है। तो यहां पर कोई और है जो यह सब डिसाइड कर रहा है।
इसके ऊपर बहुत प्रतिक्रिया आई है। अरागची के इस बयान के ऊपर भी वहीं के लोग कह रहे हैं कि इन्होंने एक गलत और अधूरी पोस्ट कर दी। उस पोस्ट से जानकारी साफ निकल कर ही नहीं आई कि खुला है या नहीं खुला है और इससे आईआरजीसी ने अपनी नाकेबंदी जारी रखी।
आईआरजीसी पर सरकार के फैसलों के खिलाफ काम करने का आरोप
"बैड एंड इनकंप्लीट ट्वीट बाय अरागची एंड इनकरेक्ट एम्बिगुटी क्रिएशन रिगार्डिंग द रीओपनिंग ऑफ स्टेट ऑफ़ हॉर्मोन।" मतलब इनके ऊपर आरोप लगने लगा कि तुमने यह क्या जानकारी दे दी। इस बात से पता चला कि जो यहां का ईरान का रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प है ना, जो कि कभी खमनई की निजी सेना हुआ करती थी, वह इस समय सरकार के साथ समर्थन में नहीं है।
आपको याद होगा शुरुआत में ही अरागची ने एक बयान दिया था और कहा था अपनी तरफ से कि हमारे देश में इस समय सारी स्थितियां जो हैं, वह हमारे नियंत्रण से बाहर चली गई हैं। सरकार ने शुरुआत में ही कहा था कि आईआरजीसी ने अपने हाथ में नियंत्रण ले लिया है।
आप सुप्रीम लीडर को मार दिए, उनके बाद के लीडर को मार दिए, तो अब आईआरजीसी हमारी सुन नहीं रहे हैं और यह बात अब यहां पर आती हुई दिखी। आईआरजीसी और सरकार के बीच सामंजस्य नहीं है। कहा जा रहा है कि इन दोनों के बीच बात बिगड़ने का बड़ा कारण यह है कि आईआरजीसी चाहती है कि वार्ता करने जब जाओ तो गालीबा और आराची के अलावा एक आदमी आईआरजीसी का और लेकर जाओ।
इसके चलते आईआरजीसी नाराज है कि आप जो बातचीत करने जैसे पाकिस्तान गए या कहीं भी गए, हमको लूप में क्यों नहीं ले रहे हो? और इसके चलते उनका बना बनाया जो सिस्टम है, वह पूरी तरह से अब इस समय सरकार विरोधी हो गया है और आईआरजीसी द्वारा सरकार के फैसलों के खिलाफ काम किया जा रहा है।
आईआरजीसी की भूमिका और संरचना
तो यह जो इंडियन शिप पर हमला हुआ, तो इसको समझिए कि अरागची का ट्वीट है, उसके बाद अमेरिका का ट्वीट है, उसके बाद आईआरजीसी हमला कर दे रहा है। यह बताने का प्रयास है कि हम अलग हैं। अब यह कौन है आईआरजीसी साहब? इसको भी थोड़ा सा समझ लेते हैं।
आईआरजीसी इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प है ईरान की, जिसको खमनई ने खुद अपने लिए एक ऐसी सेना के रूप में खड़ा किया था जिसका उद्देश्य सरकार विरोधी आंदोलनों को दबाना था। लगभग सवा लाख इसके पास सैनिक हैं और कई सारे इसके पास में रिजर्व सैनिक हैं, जिन्हें कि बसीज मिलीशिया कहा जाता है।
जरूरत पड़ने पर यह सेना का काम करते हैं। यानी कि सवा लाख तो पूरे टाइम ऐसे सैनिक इनके पास रहते हैं जो सेना से अलग हैं। आईआरजीसी सेना नहीं है, यह सुप्रीम लीडर की सेना है, यानी कि खमनई की सेना है। और खमनई अब जब नहीं हैं, तो मजतबा खमनई की सेना है। यह पद के लिए वफादार है। बाहुबली के अंदर यह कटप्पा वाली सेना है।
ऐसे में आईआरजीसी जो है ना, वह छह हिस्सों में बंटी होती है। इनका काम बड़े हिस्सों में है, जैसे एयरफोर्स को ऑपरेट करना, ग्राउंड फोर्स को, नेवी को, यह तमाम प्रकार के काम करती है। एक तरह से सेना से अलग होकर सुपर सेना की तरह काम करती है।
और इसका उद्देश्य यही है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान की सुप्रीमेसी को कायम रखें। खुद फोर्स ईरान के दुश्मनों के खिलाफ लड़ने वाले ग्रुप्स को ट्रेनिंग और हथियार देती है।
तो ऐसे में आईआरजीसी सरकार के उलट है, यानी कि इलेक्टेड गवर्नमेंट के साथ नहीं चल रही है और वह अपने फैसले खुद ले रही है, ऐसा लग रहा है। ईरान की जो सेना है, जो कि सरकार के अधीन है, उसको कोई पूछ नहीं रहा है। इसी के चलते स्टेट ऑफ हॉर्मोज कभी खुला है, तो कभी बंद है, तो कभी खुला है तो बंद है की सूचनाएं आपको मिलती रहती हैं।
इसके बावजूद आज भी स्थिति बनी हुई है कि ईरान का कोई भी अपडेट किसी के काम का नहीं है। अमेरिका का कोई भी अपडेट फिलहाल काम का नहीं है। अब देखते हैं आगे क्या होगा।