- क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और तुर्की की भूमिका
- ऐतिहासिक संबंध और बदलते समीकरण
- एर्दोगन का उदय और इस्लामिक नेतृत्व की महत्वाकांक्षा
हाल ही में इजराइल और ईरान के बीच का संघर्ष, जो अमेरिका के माध्यम से चल रहा था, एक अप्रत्याशित मोड़ ले सकता है। इस्लामाबाद में शांति वार्ता का आयोजन, जिसमें तुर्की, सऊदी अरब और मिस्र जैसे देश महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे, इस क्षेत्र में बढ़ती अनिश्चितता का संकेत है।
यह वार्ता न केवल ईरान के साथ सत्ता के केंद्र और भविष्य में मुसलमानों के लिए नेतृत्व की लड़ाई से प्रेरित है, बल्कि यह एक बड़े भू-राजनीतिक बदलाव की ओर भी इशारा करती है।
विशेष रूप से, तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन की ओर से इजराइल को दी गई धमकी ने इस पूरे परिदृश्य को और अधिक जटिल बना दिया है। यरूशलम पोस्ट द्वारा रिपोर्ट की गई यह धमकी, जिसमें कहा गया है कि यदि इजराइल ने अपनी गतिविधियाँ बंद नहीं कीं, तो तुर्की सैन्य कार्रवाई कर सकता है, इसने अंतरराष्ट्रीय समुदाय में हलचल मचा दी है।
यह खबर भारत सहित कई देशों के मीडिया में भी छाई रही, जिसने इस संभावना को जन्म दिया कि क्या तुर्की अब युद्ध में शामिल हो जाएगा, और यदि हाँ, तो किस पक्ष की ओर से?
क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और तुर्की की भूमिका
यह सवाल कि तुर्की किस पक्ष से लड़ेगा - ईरान, लेबनान, सीरिया, या गाजा की ओर से, या एक स्वतंत्र भूमिका निभाएगा - कई भू-राजनीतिक गणनाओं को जन्म देता है।
इतिहास गवाह है कि गाजा को लेकर इज़राइल और उसके विरोधी गुटों के बीच पहले भी संघर्ष हो चुके हैं। लेकिन क्या यह संघर्ष एक बड़े युद्ध में बदल जाएगा? और यदि ऐसा होता है, तो क्या यह एक नए मोर्चे को खोलेगा?
वर्तमान भू-राजनीतिक स्थिति पहले से ही तनावपूर्ण है। फारस की खाड़ी में स्थित हॉरमुज जलडमरूमध्य पहले से ही बंद है, और यदि तुर्की और इजराइल के बीच संघर्ष बढ़ता है, तो यह बॉस्फोरस जलडमरूमध्य को भी प्रभावित कर सकता है।
बॉस्फोरस जलडमरूमध्य का बंद होना रूस से आने वाले तेल की आपूर्ति को रोक सकता है, जिससे वैश्विक मंदी का खतरा और बढ़ जाएगा। यह स्थिति दुनिया भर में संकट को और गहरा कर सकती है।
यह चर्चा केवल तुर्की औरइज़राइलल के बीच संभावित संघर्ष तक ही सीमित नहीं है। यदि यह संघर्ष बढ़ता है, तो यह एक बड़ी वैश्विक खबर बन जाएगा और दुनिया को बुरी तरह प्रभावित करेगा। यह फिर से एक ऐसे युद्ध की ओर इशारा करता है जो मानचित्र पर उठ रहा है।
एक समय ऑटोमन साम्राज्य का हिस्सा रहा क्षेत्र, जिसमें आज का इजराइल और फिलिस्तीन शामिल हैं, अब एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा होने की तैयारी में है।
ऐतिहासिक संबंध और बदलते समीकरण
यह समझना महत्वपूर्ण है कि तुर्की औइज़राइलइल के बीच संबंध हमेशा से इतने तनावपूर्ण नहीं रहे हैं। वास्तव में, इजरायल को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने वाला तुर्की पहला मुस्लिम देश था, जिसने 1949 में यह कदम उठाया था। उस समय, इज़राइल को अधिकांश मुस्लिम देशों से मान्यता नहीं मिल रही थी; तुर्की उसके साथ खड़ा था।
हालांकि, बीच-बीच में संबंधों में उतार-चढ़ाव आते रहे। 1950 और 60 के दशक में, जब इजराइल ने मिस्र के सिनाई प्रायद्वीप पर स्वेज नहर के लिए कब्जा किया, तब तुर्की के साथ उसके संबंध कुछ हद तक बिगड़ गए थे।
1967 के छह दिवसीय युद्ध के बाद, जब इजराइल ने बड़े क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया, तब भी तुर्की ने इजराइल की आलोचना की। लेकिन फिर भी, दोनों देश अपने संबंधों को सामान्य बनाए रखने में कामयाब रहे।
1990 के दशक में, दोनों देशों के बीच मित्रता का एक "स्वर्ण युग" देखा गया। उन्होंने एक-दूसरे के साथ रणनीतिक साझेदारी को बढ़ावा दिया, खासकर सीरिया में कुर्द लड़ाकों के मुद्दे पर। तुर्की और इजराइल दोनों सीरियाई क्षेत्र में कुर्द समूहों को निशाना बनाते थे, जिससे एक अनौपचारिक साझा लक्ष्य बन गया था।
एर्दोगन का उदय और इस्लामिक नेतृत्व की महत्वाकांक्षा
2002 में, रेसेप तैयप एर्दोगन तुर्की की सत्ता में आए। शुरुआत में, उन्हें एक धर्मनिरपेक्ष नेता के रूप में देखा गया, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने इस्लाम को अपनी नीतियों के केंद्र में रखना शुरू कर दिया।
उनकी एक प्रमुख महत्वाकांक्षा इस्लामिक दुनिया में नेतृत्व की भूमिका निभाना था, जिसका उद्देश्य एक एकीकृत बाज़ार बनाना था, ठीक वैसे ही जैसे अमेरिका ने नाटो के माध्यम से किया था।
तुर्की, ईरान और सऊदी अरब जैसे देश, जो ओआईसी के लगभग 57 सदस्य देशों को कवर करते हैं, सभी मुस्लिम दुनिया के नेता बनने की दौड़ में हैं।
तुर्की ने पाकिस्तान का समर्थन करके, विशेष रूप से कश्मीर मुद्दे पर, इस दिशा में कदम बढ़ाए। साथ ही, अजरबैजान को आर्मेनिया के खिलाफ सैन्य समर्थन देकर, तुर्की ने खुद को मुस्लिम समुदाय के बीच एक समर्थक के रूप में स्थापित करने की कोशिश की।
गाजा पट्टी में इजराइल द्वारा किए गए हमलों के खिलाफ वैश्विक मुस्लिम समुदाय की पीड़ा का फायदा उठाते हुए, एर्दोगन ने खुद को गाजा का समर्थक बताया। उनका मानना था कि ऐसा करके वह इस्लामिक दुनिया में लोकप्रियता हासिल कर सकते हैं और तुर्की को ऐतिहासिक खलीफा पद की शक्ति को पुनः प्राप्त करने में मदद कर सकते हैं।
संबंधों में कड़वाहट: गाजा से शुरू हुआ टकराव
तुर्की और इज़राइल के संबंधों में कड़वाहट की शुरुआत गाज़ा से हुई। 2010 में, जब तुर्की का एक "फ्लोटिला" जहाज गाजा की मदद के लिए जा रहा था, इजराइली नौसेना ने उस पर हमला कर दिया, जिसमें नौ तुर्की नागरिक मारे गए। इस घटना ने दोनों देशों के संबंधों को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाया, और इजराइल को मुआवजा देना पड़ा और माफी मांगनी पड़ी।
2018 से 2020 के बीच, गाजा में हिंसा और यरुशलम के मुद्दे को लेकर तुर्की फिर से इजराइल के खिलाफ मुखर हुआ। 2022 में, दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध फिर से शुरू हुए, जिसमें 67 अरब डॉलर का व्यापार हुआ। हालांकि, तुर्की को जल्द ही एहसास हुआ कि इस व्यापार से वह अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सकता।
हमास के इजराइल पर हमले और इजराइल की जवाबी कार्रवाई के बाद, एर्दोगन ने इजराइल के कार्यों को "नरसंहार" करार दिया और गाजा के लोगों को "मुजाहिद्दीन" बताया।
यह एक स्पष्ट संकेत था कि दोनों देशों के बीच संबंध अब और खराब हो चुके हैं। 2024 के अंत तक, तुर्की ने इजराइल के साथ अपने सभी व्यापारिक संबंध समाप्त कर दिए और 2025 तक, यहां तक कि उड़ानों पर भी प्रतिबंध लगा दिया।
कानूनी लड़ाई और एर्दोगन का पलटवार
नवंबर 2024 में, तुर्की ने इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू और 35 अन्य नेताओं के खिलाफ अपनी अदालत में मामला दायर किया।
यह मामला "सुमुद फ्लोटिला" जहाज को रोके जाने से संबंधित था, जो ग्रेटा थनबर्ग सहित कार्यकर्ताओं को लेकर गाजा की मदद के लिए जा रहा था। तुर्की का आरोप था किइज़राइलइल ने इस जहाज को रोककर, जो भोजन और पानी ले जा रहा था, एक "नरसंहार" किया है।
तुर्की की अदालत ने नेतन्याहू को "रक्त में अंधे" और "इस समय के हिटलर" जैसा बताते हुए, उनके खिलाफ 4596 साल की सजा की मांग की।
यह मामला एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय बहस का विषय बन गया, और इसके परिणामस्वरूप सोशल मीडिया पर दोनों देशों के नेताओं के बीच तीखी बयानबाजी शुरू हो गई।
इजराइल के रक्षा मंत्री और अन्य अधिकारियों ने भी एर्दोगन पर "आतंकियों को पनाह देने" और "दोहरी बात करने" का आरोप लगाया। इस आरोप-प्रत्यारोप के दौर में, स्थिति इतनी बिगड़ गई कि दोनों देशों के नेता एक-दूसरे के खिलाफ अभद्र भाषा का प्रयोग करने लगे।
धमकी का सच: क्या युद्ध होगा?
हाल ही में, एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें एर्दोगन को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि यदि पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता नहीं कर रहा होता, तो वे लेबनान पर हमले के लिए इजराइल को "उसकी औकात याद दिला देते।" इस वीडियो ने फिर से यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या तुर्की वास्तव में इजराइल पर हमला करेगा।
हालांकि, बाद में यह पता चला कि यह वीडियो दो साल पुराना है और इसे गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया है। तथ्यात्मक रूप से, तुर्की इज़राइल से नफरत करता है, लेकिन वर्तमान में युद्ध करने के मूड में नहीं है। फिर भी, निकट भविष्य में, ईरान के कमजोर होने के साथ, तुर्की उस खाली जगह को भरने की कोशिश कर सकता है।
इजराइल इस स्थिति के लिए तैयार है। तीन महीने पहले, यह रिपोर्ट आई थी कि इजराइल ने तुर्की के खिलाफ एक विस्तृत योजना बनाना शुरू कर दिया है, जिसमें भारत और साइप्रस के साथ मिलकर एक संयुक्त बल बनाने की बात शामिल है। यह मोर्चा विशेष रूप से पाकिस्तान के खिलाफ भारत के हितों की रक्षा के लिए बनाया जा रहा है, लेकिन इसमें तुर्की भी एक संभावित विरोधी के रूप में देखा जा रहा है।
निष्कर्ष: जमीन की लड़ाई
एर्दोगन की महत्वाकांक्षाएं राष्ट्रीय मुद्दों से आगे बढ़कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंच गई हैं, जिसका उद्देश्य देश के व्यापार को बढ़ाना और खुद को लोकप्रिय बनाए रखना है। यह भी संभव है कि वह अपने विदेश मंत्री को पछाड़कर अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए इजराइल के खिलाफ ऐसे चरम कदम उठा सकते हैं।