आज के भारतीय बाज़ार में चीनी कंपनियों की स्थिति चिंताजनक होती जा रही है। 2026 तक कई चीनी कंपनियाँ एक बड़ी गिरावट की उम्मीद कर रही हैं, और इसके पुख्ता संकेत मिल रहे हैं कि यह साल स्मार्टफोन इंडस्ट्री के लिए अच्छा नहीं रहने वाला।
ज्यादातर चीनी कंपनियाँ ₹50,000 से कम कीमत वाले फ़ोन्स पर निर्भर हैं, और इस सेगमेंट में भी उन्हें कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि भारत का फोन बाज़ार तेज़ी से महंगे फ़ोन्स की ओर बढ़ रहा है। Apple जैसी कंपनियाँ अब Xiaomi और Realme से भी ज़्यादा फ़ोन्स बेच रही हैं, जो चीनी कंपनियों के लिए एक बड़ा झटका है।
Xiaomi जैसी कंपनियों की हालत इस साल बेहद ख़राब हो चुकी है। Redmi Note सीरीज़ को कोई पूछ नहीं रहा, और पिछले एक साल में कंपनी की बिक्री में लगातार गिरावट आई है।
Realme की स्थिति भी डांवाडोल है; उनके कर्मचारियों को निकाला जा रहा है और टीमों को वापस Oppo में मर्ज किया जा रहा है। यह संकेत है कि भारत में भी Realme, Oppo का एक सब-ब्रांड बनकर रह सकता है, जिसका फोकस केवल ऑनलाइन सेगमेंट पर होगा।
OnePlus भी इसी रास्ते पर है। Oppo, OnePlus से ध्यान हटाकर अपने ब्रांड पर ज़्यादा ध्यान केंद्रित कर रहा है। 2026 तक Oppo का लक्ष्य Samsung को पीछे छोड़ना और 2027 तक Vivo की जगह लेना है।
Poco का भी वही हाल है जो Xiaomi का है। ट्रांसियन होल्डिंग (Infinix, Tecno) भी बाज़ार से धीरे-धीरे गायब होती जा रही है।
इस गिरावट का एक बड़ा कारण बढ़ती कॉम्पोनेंट लागत है, जिससे सस्ते मोबाइल फ़ोन बनाना महंगा हो रहा है।
यह केवल बाज़ार का रुझान नहीं है, बल्कि सरकारी नियमों का भी प्रभाव पड़ा है। 2020 के बाद, सरकार की नज़र चीनी कंपनियों पर पड़ी, और कई टैक्स चोरी और फ्रॉड के मामलों में लिप्त पाई गईं।
OnePlus को हाल ही में जीएसटी विभाग से नोटिस मिला है, और पिछले साल Realme और Oppo के ऑडिट हुए।
कई चीनी कंपनियों की भारत में फैक्ट्री लगाने की योजनाएँ अधूरी रह गईं। कुछ कंपनियों ने अपनी फैक्ट्री में भारतीय कंपनियों को हिस्सेदारी भी दी है, जैसे Dicson ने।
Vivo, जो भारत में सबसे ज़्यादा फोन बेचती है, उसके फ़ोन्स की मैन्युफैक्चरिंग अब Bhagwati (पूर्व में Micromax) की फैक्ट्री में होती है।
यह विडंबना है कि एक समय चीनी कंपनियाँ भारत में अपनी फैक्ट्रियां लगा रही थीं, और अब भारतीय कंपनियाँ उनके बिज़नेस को संभाल रही हैं।
चीनी कंपनियों को भारतीय R&D पर भरोसा नहीं है। एक पूर्व OnePlus कर्मचारी के अनुसार, चीनी टीम भारतीय R&D पर बिलकुल भरोसा नहीं करती और सारा काम चीन में ही होता है।
ODM (Original Design Manufacturer) और JDM (Joint Design Manufacturer) मॉडल पर भी अब भारतीय कंपनियाँ काम कर रही हैं। लावा (Lava) जैसी भारतीय कंपनी ने भी कुछ साल पहले JDM का सहारा लिया था, चीनी कंपनियों के साथ मिलकर फ़ोन डिज़ाइन करने के लिए।
भारतीय सरकार ने भी चीनी कंपनियों के लिए नियम कड़े किए हैं, जैसे कि उन्हें भारतीय कंपनियों के साथ ज्वाइंट वेंचर करना या नेतृत्व में भारतीय को रखना।
चीन की EV इंडस्ट्री का उदाहरण भी देखें, जहाँ टेस्ला को आने की अनुमति दी गई, लेकिन आज चीनी कंपनियाँ खुद टेस्ला से ज़्यादा कारें बेच रही हैं।
MG जैसी कार कंपनियाँ भी चीन के SAIC ग्रुप का हिस्सा हैं, लेकिन भारत में JSW के साथ मिलकर असेंबली करती हैं।
Huawei जैसी कंपनियाँ भारत में इसीलिए नहीं आ पा रही हैं क्योंकि वे अपना नियंत्रण किसी दूसरी कंपनी को नहीं देना चाहतीं। BYD जैसी कंपनियाँ भी कारें एक्सपोर्ट करके लाती हैं, मैन्युफैक्चरिंग नहीं करतीं।
यह एक बड़ा डर है कि अगर चीनी कंपनियों को कार इंडस्ट्री में भी छूट दी गई, तो Maruti जैसी भारतीय कंपनियाँ भी ख़त्म हो सकती हैं।
स्मार्टफोन के अलावा, अन्य क्षेत्रों में भी चीनी कंपनियों की एंट्री रोकी जा रही है। Lenovo, Acer, Asus जैसी कंपनियाँ अब भारत में लैपटॉप की असेंबलिंग शुरू कर रही हैं।
Apple भारत में iPhones बना रही है और भविष्य में दूसरे प्रोडक्ट्स भी बनाने की योजना है।
एक और बड़ा डेवलपमेंट है Micron जैसी कंपनी का भारत में मेमोरी मॉड्यूल की टेस्टिंग, असेंबलिंग और पैकेजिंग शुरू करना। 2026 के अंत तक फैब्रिकेशन भी शुरू हो जाएगा।
स्मार्टफोन सेगमेंट में, चीनी कंपनियाँ 2026 में एक बड़ी गिरावट के लिए तैयार हैं। उनका मानना है कि उन्हें बाज़ार में ज़्यादा ग्रोथ नहीं दिखेगी।
कंपनियाँ मार्केटिंग और विज्ञापन पर ज़्यादा पैसा खर्च करेंगी, जिससे ग्राहकों को झांसे में आने से बचना होगा।
Apple जैसी कंपनियाँ भारत में अपनी स्थिति और मज़बूत करेंगी। वे लिमिटेड प्रोडक्ट्स निकालेंगे, लेकिन वे भारत में काफी पसंद किए जाएंगे।
Google भी भारत में Gemini AI जैसे प्रोडक्ट्स पर काम कर रहा है, जिसमें भारतीय इंजीनियरों का योगदान है।
Samsung का भी बेंगलुरु में R&D सेंटर है जो कैमरा टेक्नोलॉजी पर काम करता है।
हालांकि, स्मार्टफोन का मेजर काम अभी भी चीन में होता है, भारत में यह बहुत कम हो चुका है।
यह देखना बाकी है कि क्या कोई भारतीय कंपनी इस जगह ले पाएगी या बाज़ार की दिशा बदलेगी।
2026 से चीनी कंपनियों का सुनहरा दौर भारत में समाप्त होता दिख रहा है।