- वैश्विक तनाव और तेल संकट: मंदी के पीछे के प्रमुख कारण
- पश्चिम एशिया में अस्थिरता और भारत पर इसका प्रभाव
- वैश्विक मंदी की आहट?
क्या आप जानते हैं कि भारत में मंदी की आहट सुनाई दे रही है? यह कोई काल्पनिक डर नहीं, बल्कि शेयर बाजार के हालिया प्रदर्शन और वैश्विक घटनाओं का सीधा संकेत है। यदि ऐसा हुआ, तो महंगाई बढ़ सकती है, लोग खर्च करने से कतराएंगे, और आर्थिक विकास के अवसर थम सकते हैं। सवाल यह है कि क्या भारत की विकास दर सीधे तौर पर प्रभावित होगी?
यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि हाल ही में भारतीय शेयर बाजार ने एक दिन में 21 महीने का सबसे बड़ा गोता लगाया है। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) से मात्र एक दिन में 12 ट्रिलियन रुपये साफ हो गए। सेंसेक्स लगभग 2500 अंक गिरकर बंद हुआ, जो कि एक बहुत बड़ी औरशॉकिंग स्थिति मानी जा सकती है।
वैश्विक तनाव और तेल संकट: मंदी के पीछे के प्रमुख कारण
बाजार में लगातार उत्पन्न हो रही इन समस्याओं के पीछे तेल की सप्लाई एक बड़ा कारण है। पिछले कुछ समय से बाजार परेशानियों के दौर से गुजर रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा तनाव, जिसे ईरान और अमेरिका मिलकर एक युद्ध के रूप में देख रहे हैं, यह स्थितियां बेहद खतरनाक होती जा रही हैं।
इन घातक स्थितियों में, जब ईरान स्टेट ऑफ हॉर्मोज से तेल और गैस सप्लाई को नियंत्रित करने की कोशिश करता है, तो भारत जैसे देश पर इसका सीधा असर पड़ता है। भारत अपनी 85% ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आयात पर निर्भर है। रूस से तेल खरीदने का विकल्प मौजूद है, लेकिन रूस कब तक इस बढ़ती मांग को पूरा कर पाएगा, यह एक बड़ा सवाल है।
भारत की कुल ऊर्जा आवश्यकताओं का लगभग 45 से 50% स्टेट ऑफ हॉर्मोज से आता है। अगर यह पूरी तरह बंद हो जाता है, तो वैकल्पिक सप्लाई के साधन भी सवालों के घेरे में आ जाएंगे।
पश्चिम एशिया में अस्थिरता और भारत पर इसका प्रभाव
सऊदी अरब ने हाल ही में राजतनूरा और अपनी आरामों पर हुए हमलों के जवाब में यानबू पोर्ट (लाल सागर में) से तेल सप्लाई शुरू की थी। लेकिन अब ईरान ने यानबू पोर्ट पर भी हमला कर दिया है। ऐसे में, पश्चिम एशिया के वे सभी देश जो भारत के लिए तेल, गैस सप्लाई और भारत के निर्यात का एक प्रमुख केंद्र हैं, वे पूरी तरह बाधित हो रहे हैं।
बाजार पर इसका असर साफ दिख रहा है। बाजार में गिरी हुई ये संख्याएं और बिगड़ा हुआ सेंसेक्स सीधे तौर पर इस ओर इशारा कर रहे हैं। इससे भी बुरी खबर यह है कि रुपया भी रिकॉर्ड स्तर पर गिरता चला जा रहा है और डॉलर के मुकाबले 92.62 तक पहुंच गया है।
अमेरिका और इजराइल द्वारा पैदा की गई यह संकट की स्थिति भारत जैसे विकासशील देश के लिए, जहां 140 करोड़ से अधिक लोग रहते हैं, बहुत चिंताजनक है। पश्चिम एशिया से आने वाले विदेशी मुद्रा भंडार ( remittances) हमारे लिए जरूरी हैं। वहीं, हमारी कई कंपनियां जो पश्चिम एशिया के देशों को माल बेचकर लाभ कमाती हैं, और जो तेल पर निर्भर हैं, उन सभी पर सीधा असर पड़ रहा है।
वैश्विक मंदी की आहट?
इन सब के चलते, वैश्विक मंदी (Global Recession) एक बड़ा सवाल बन गई है। ऐसा इसलिए है क्योंकि जब-जब खाड़ी क्षेत्र में ऐसी स्थितियां बनी हैं, बाजार के हालात बिगड़े हैं। यह युद्ध पहले ही तीन हफ्ते पूरा करने जा रहा है, और यदि विश्लेषकों की मानें और यह स्थिति चार हफ्ते और खिंच गई, तो बाजार के लिए यह बहुत भीषण होगा।
हाल ही में, ईरान ने कतर की सबसे बड़ी रिफाइनरी पर हमला किया है, जो गैस सप्लाई (LNG) का दुनिया का 20% केंद्र है। वहां गैस सप्लाई बाधित होना और उसे फिर से शुरू करने में लगने वाला समय दुनिया के लिए बहुत भयावह हो सकता है। इसी चिंता को भारत सरकार ने भी अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में व्यक्त किया है।
शेयर बाजार में तबाही: आंकड़े क्या कहते हैं?
बाजार के हालात आपके सामने हैं। सेंसेक्स के साथ-साथ निफ्टी भी 23,000 अंक पर गिरकर बंद हुआ। यह गिरावट विशेष रूप से बैंकिंग और ऑटो शेयरों में सबसे ज्यादा देखी गई। जून 2024 के बाद, सेंसेक्स 5.74% गिरा था, और यह गिरावट उसी श्रेणी की है।
आज, BSE 2496 अंक (3.26%) गिरकर 74,207 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 2302 अंक गिरकर 23,000 पर बंद हुआ। निफ्टी 50 और सेंसेक्स के 30 प्रमुख शेयरों में छाई हुई लालिमा (गिरावट) बताती है कि बाजार में भारी बिकवाली हुई है।
हालात इतने खराब हैं कि बैंकों के शेयर बहुत तेजी से गिर रहे हैं। विदेशी निवेशक लगातार पैसा निकाल रहे हैं, और घरेलू निवेशक उन्हें भरने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन बाजार संभल नहीं रहा। सूचीबद्ध कंपनियों का मार्केट कैप ₹443.8 लाख करोड़ से घटकर ₹426 लाख करोड़ के करीब रह गया है।
अतिरिक्त कारक और उनका प्रभाव
युद्ध को बाजार गिरने का एक बड़ा कारण माना जा रहा है। लेकिन एक और कारण भी है। हाल ही में HDFC बैंक के चेयरमैन अतानु चक्रवर्ती का इस्तीफा भी HDFC बैंक के शेयरों में गिरावट का एक बड़ा कारण बना है।
दूसरी ओर, तेल की बढ़ती कीमतों और तेल व एलपीजी सप्लाई पर उत्पन्न संकट के कारण कीमतें बढ़ी हैं। इससे सीधे तौर पर उन लोगों के बजट पर असर पड़ेगा जो यातायात सेवाओं का उपयोग करते हैं, या जिनके व्यवसाय में ट्रांसपोर्टेशन एक बड़ी भूमिका निभाता है।
आज अगर भारत में देखें, तो ब्लिंक, जोमैटो, स्विगी जैसी कंपनियां जो डिलीवरी करती हैं, और रेस्टोरेंट व्यवसाय चलाने वाले, सभी सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। एलपीजी पर संकट आएगा तो रेस्टोरेंट्स पर, रेस्टोरेंट्स पर संकट आएगा तो सप्लाई बाधित होगी, और इससे इन कंपनियों के स्टॉक नीचे जाएंगे।
माल भाड़े में वृद्धि से ट्रांसपोर्टेशन महंगा होगा, जिससे माल की मांग और खपत कम होने लगेगी। जब खपत कम होगी, तो उत्पादक कंपनियों का स्टॉक बिक नहीं पाएगा, जिससे मुसीबत खड़ी हो जाएगी।
इसके अलावा, लोग यात्राओं से कतराने लगेंगे, और पेट्रोल-डीजल की अनिश्चितता भी लोगों को चिंतित करेगी। ऐसी स्थितियां बाजार को भविष्य की चिंताओं के आधार पर गिराती हैं, न कि केवल वर्तमान स्थिति के आधार पर।
अन्य प्रभावित क्षेत्र
पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण उर्वरक की आपूर्ति भी बाधित हुई है, क्योंकि फर्टिलाइज़र के लिए हम इन देशों पर निर्भर करते हैं। साथ ही, वहां रहने वाले भारतीयों से आने वाला रेमिटेंस भी प्रभावित हुआ है। कई भारतीय व्यवसायों की पश्चिम एशिया (दुबई, दोहा, सऊदी) में होने वाली यात्राएं बाधित हुई हैं। ये सभी कारक बाजार को लगातार प्रभावित कर रहे हैं।
इसी वजह से, पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष और मंदी के बीच संबंध पर चर्चा हो रही है। क्या यह वैश्विक मंदी का कारण बन सकता है?
इतिहास गवाह है: तेल संकट और मंदी
यह पहली बार नहीं है जब ईरान ने इस क्षेत्र को प्रभावित किया हो। 1973 में भी तेल संकट की ऐसी ही स्थिति उत्पन्न हुई थी, जब अमेरिका ने इजराइल पर हमला किया था। उस समय भी ईरान ने इजराइल समर्थक देशों को तेल देने से मना कर दिया था, जिससे तेल की कीमतों में चार गुना तक वृद्धि हो गई थी।
उस समय स्टेट ऑफ हॉर्मोज से तेल सप्लाई पूरी तरह रोक दी गई थी, जिससे दुनिया को भयंकर किल्लतों का सामना करना पड़ा था। इसके बाद भी रिसेशन (मंदी) की स्थिति बनी, जिसमें जीडीपी ग्रोथ रेट घटी, बेरोजगारी बढ़ी और मांग घटी।
1974 के बाद, 1990-91 के गल्फ वॉर के दौरान भी ऐसी स्थिति बनी, जब ऑयल प्राइस ने सबको चौंका दिया था। इराक के कुवैत पर हमले के समय भी बाजार में ऐसे ही हालात थे। उस समय भारत में विदेशी मुद्रा का इतना संकट खड़ा हो गया था कि हमें सोना गिरवी रखने का विचार करना पड़ा था।
2003 में इराक वॉर, 2011 में अरब स्प्रिंग, जब-जब खाड़ी क्षेत्र प्रभावित हुआ है, बाजार पर इसका सीधा असर पड़ा है।
क्या इस बार बाजार बच पाएगा?
यह सोचना मुश्किल है कि इस बार बाजार इस स्थिति से बच पाएगा या नहीं। क्योंकि इस बार ईरान ने उन ठिकानों को निशाना बनाया है जो पश्चिम एशिया के लिए महत्वपूर्ण थे, ताकि अमेरिका पर युद्ध विराम के लिए दबाव बनाया जा सके।
आगे क्या? घबराहट नहीं, समझदारी ज़रूरी
ऐसी स्थिति में, घबराना नहीं चाहिए। यदि आप शेयर बाजार में निवेशित हैं, तो पैनिक में आकर बिक्री न करें। समझदार निवेशक ऐसी स्थिति में और खरीदारी करते हैं, क्योंकि बाजार को वापस लौटना ही है। यह स्थिति लंबे समय तक नहीं चलेगी।
दूसरा, वर्तमान परिस्थितियों से निपटने के लिए अपने स्तर पर तैयारी रखें। इसका मतलब यह नहीं कि कालाबाजारी करें या जबरदस्ती स्टॉक जमा करें। लेकिन अपने आवश्यक धन की व्यवस्था रखें।
बाजार में उतना ही खर्च करें जितनी जरूरत हो। लग्जरी को फिलहाल दूसरे पायदान पर रखें। आवश्यक चीजों को जितना कुशलता से कर पाएंगे, वह आपके लिए बेहतर होगा।
कुल मिलाकर, घबराने की बात नहीं है, लेकिन चर्चा का विषय जरूर है। पैनिक सेल या पैनिक बाय, दोनों ही बाजार के लिए खराब माने जाते हैं।
सोना-चांदी और निवेशकों का डर
जहां तक सोना और चांदी की बात है, उनके भावों में गिरावट यह दर्शाती है कि निवेशकों में निवेश को लेकर डर है। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि पैसा निवेश करें या नहीं। यही सबसे बड़ी चिंता का विषय बन रहा है।
यहां तक कि भारत सरकार ने भी तेल और गैस की आपूर्ति पर चिंता जाहिर की है, जो यह दर्शाता है कि सरकार भी इस स्थिति को जनता के सामने रख रही है।
आखिर में: नेशन फर्स्ट
फिर भी, अल्टीमेटली, हमें "नेशन फर्स्ट" की भावना रखनी है और घबराना नहीं है। 140 करोड़ भारतीय हैं, हमें मजबूत बनना है। इतना मजबूत कि दुनिया हम पर निर्भर करे, न कि हम दूसरों की घटनाओं पर निर्भर रहें।
जब हम खुद इतने पीछे हैं, तो जो हमसे आगे हैं, अगर वो कुछ नहीं कर पा रहे हैं, तो हम क्या करेंगे, यह सोचकर आगे बढ़ना चाहिए।