- नाटो देशों का बदलता रुख
- छह देशों का संयुक्त एलान
- अमेरिका का अकेलापन खत्म?
पश्चिम के देश, जिन्होंने हाल ही में अमेरिका की मदद की गुहार को अनसुना किया था, अब स्टेट ऑफ हॉर्मुज को सुरक्षित करने के लिए एकजुट हो गए हैं। यह अप्रत्याशित मोड़ कई सवाल खड़े करता है - क्या यह युद्ध समाप्त होने वाला है, या यह एक बड़े वैश्विक संघर्ष में तब्दील हो जाएगा?
नाटो देशों का बदलता रुख
कुछ दिनों पहले तक, डोनाल्ड ट्रंप द्वारा नाटो सहयोगियों से मदद की गुहार को ठुकराया जा रहा था। लेकिन अब, यूरोप और जापान जैसे देशों ने स्टेट ऑफ हॉर्मुज के लिए अमेरिका का साथ देने का ऐलान किया है। यह एक महत्वपूर्ण बदलाव है, खासकर तब जब ये देश पहले इस युद्ध से दूरी बनाए हुए थे।
स्टेट ऑफ हॉर्मुज को सुरक्षित करना वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह दुनिया की लगभग 20% ऊर्जा आवश्यकता को पूरा करता है। इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की बाधा वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाल सकती है, जैसा कि हाल ही में देखा गया है जब कतर की रिफाइनरी पर हमले से एलएनजी आपूर्ति प्रभावित हुई थी।
छह देशों का संयुक्त एलान
ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड और जापान जैसे देशों ने संयुक्त रूप से घोषणा की है कि वे स्टेट ऑफ हॉर्मुज से सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए अमेरिका का साथ देंगे। इन देशों ने ईरान के उन हमलों की निंदा की है जिनके कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हुई है।
यह एलान तब आया है जब इन देशों ने ईरान के हमलों से उत्पन्न एलएनजी संकट का सामना किया। कतर की मेन रिफाइनरी पर ईरान के हमले के बाद, वैश्विक एलएनजी आपूर्ति पर 20% का असर पड़ा। इसके अलावा, यानबू पोर्ट पर हमला, जो सऊदी अरब का दूसरा महत्वपूर्ण पोर्ट है, ने पश्चिमी देशों के लिए स्थिति को और भी गंभीर बना दिया।
अमेरिका का अकेलापन खत्म?
अमेरिका, जो अब तक इस युद्ध में अकेला पड़ रहा था, अब अपने सहयोगियों के साथ खड़ा दिख रहा है। हालांकि, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इन देशों के शामिल होने से स्टेट ऑफ हॉर्मुज तुरंत खुल जाएगा, यह एक गलत धारणा हो सकती है। अमेरिका पहले से ही युद्ध में शामिल था और वह अकेले स्टेट ऑफ हॉर्मुज को नहीं खुलवा पाया था।
हालांकि, इन देशों के आने से अमेरिका को वैश्विक नैरेटिव वॉर में थोड़ी बढ़त जरूर मिलेगी। यह दर्शाता है कि अमेरिका केवल इजरायल के कारण इस युद्ध में नहीं कूदा है, बल्कि उसके साथ अन्य देश भी जुड़े हुए हैं।
ऊर्जा निर्भरता और राजनीतिक दांव-पेच
यूरोप की एलएनजी पर बढ़ती निर्भरता ने उसे इस स्थिति में ला खड़ा किया है। रूस से तेल और गैस की खरीद पर प्रतिबंध के बाद, यूरोप ने अमेरिका और नॉर्वे को अपने मुख्य आपूर्तिकर्ता के रूप में चुना। 2030 तक, यूरोप अपनी एलएनजी आवश्यकता का 80% अमेरिका से आयात करने की उम्मीद करता है।
यूरोप की एलएनजी पर अत्यधिक निर्भरता ने अमेरिका को एक मजबूत बातचीत की स्थिति में ला दिया है। यह स्थिति यूरोप के लिए चिंताजनक है, क्योंकि यदि किसी एक देश पर इतनी अधिक निर्भरता हो तो उसकी नेगोशिएटिंग पावर बहुत अधिक हो जाती है।
जापान की स्थिति भी चिंताजनक है, जिसकी 75% तेल आपूर्ति स्टेट ऑफ हॉर्मुज से होकर गुजरती है। इस क्षेत्र में किसी भी बाधा का जापान की अर्थव्यवस्था पर सीधा और गंभीर प्रभाव पड़ता है।
पर्ल हार्बर का भूत
इस बीच, एक चौंकाने वाली घटना में, डोनाल्ड ट्रंप ने जापान की प्रधानमंत्री से मुलाकात के दौरान पर्ल हार्बर हमले का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जापान द्वारा किया गया पर्ल हार्बर हमला उतना ही आश्चर्यजनक था जितना कि हाल की घटनाएं। यह बयान जापान को शर्मिंदा करने वाला था और यह दर्शाता है कि अमेरिका अपने इतिहास की कड़वाहट को लंबे समय तक याद रखता है।
पर्ल हार्बर का हमला, जो 1941 में हुआ था, द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका के प्रवेश का एक महत्वपूर्ण कारण बना था। उस हमले में जापान ने अप्रत्याशित तरीके से पर्ल हार्बर पोर्ट पर हमला कर दिया था, जिससे हजारों अमेरिकी सैनिक मारे गए थे और कई युद्धपोत नष्ट हो गए थे।
भारत की कूटनीतिक भूमिका
इस जटिल भू-राजनीतिक परिदृश्य में, भारत अपनी कूटनीतिक भूमिका निभा रहा है। प्रधानमंत्री ने फ्रांस, मलेशिया, जॉर्डन और कतर के नेताओं से बातचीत कर स्टेट ऑफ हॉर्मुज को सुरक्षित और खुला बनाए रखने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की है।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भारत को धन्यवाद देते हुए कहा कि भारत और फ्रांस भविष्य में तनाव कम करने और क्षेत्रीय शांति स्थापित करने के लिए मिलकर काम करेंगे। यह भारत की सक्रिय भूमिका का संकेत देता है, जो कूटनीतिक माध्यमों से इस संघर्ष को सुलझाने में मदद कर सकता है।
यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या भारत ईरान के साथ बातचीत में एक मध्यस्थ के रूप में कार्य कर सकता है। जैसे-जैसे और देश इस युद्ध में शामिल होते जा रहे हैं, एक शांतिपूर्ण समाधान खोजना अत्यंत आवश्यक हो गया है।