ईरान पर मंडराया अफगानिस्तान जैसा खतरा: अमेरिका की चालें और वैश्विक शक्ति संतुलन में उथल-पुथल!

ईरान पर मंडराया अफगानिस्तान जैसा खतरा: अमेरिका की चालें और वैश्विक शक्ति संतुलन में उथल-पुथल!
Story at a Glance:
  • अफगानिस्तान का अस्थिर इतिहास: अमेरिका और रूस की वर्चस्व की लड़ाई
  • ईरान में क्रांति: अमेरिका के प्रभाव से धार्मिक शासन तक
  • वर्तमान हालात: ईरान क्यों बन सकता है अगला अफगानिस्तान?

क्या आप जानते हैं कि आपके पड़ोसी देशों में एक बड़ी उथल-पुथल मचने वाली है? जिस तरह से अफगानिस्तान में अचानक सत्ता परिवर्तन हुआ और वहां के हालात बेकाबू हो गए, क्या वैसा ही कुछ ईरान में भी होने की कगार पर है? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि जिस तरह से अमेरिका ने अफगानिस्तान में दखलअंदाजी की, वैसा ही कुछ ईरान में भी देखने को मिल रहा है। दोनों देश पड़ोसी हैं, तो क्या पड़ोसियों के अंदर एक जैसी ही अस्थिरता पैदा होने वाली है?

यह गंभीर सवाल हमें ईरान की वर्तमान स्थिति को समझने के लिए प्रेरित करता है। हम यह जानने की कोशिश करेंगे कि कैसे अफगानिस्तान का इतिहास बदला गया, कैसे सोवियत रूस से लेकर अमेरिका तक ने वहां अपनी पकड़ बनाने की कोशिश की। साथ ही, हम यह भी देखेंगे कि कैसे ईरान ने अमेरिका के प्रभाव से एक धार्मिक क्रांति देखी और आज वह किस मोड़ पर खड़ा है। दोनों देशों की तुलना करते हुए, हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि आज ईरान को अफगानिस्तान जैसा संकट क्यों झेलना पड़ सकता है।

इस विश्लेषण के साथ-साथ, हम कुछ महत्वपूर्ण युद्ध अपडेट्स पर भी नज़र डालेंगे। हाल ही में, यूके के पास स्थित डियागो गार्सिया, जो मॉरीशस से लिया गया है, उसे अमेरिकी इस्तेमाल के लिए अनुमति मिली है। इस अनुमति के बाद अमेरिका को किस तरह की प्रतिक्रिया झेलनी पड़ी, यह भी जानना महत्वपूर्ण होगा। तो चलिए, आज के इस विस्तृत विश्लेषण में इन सभी पहलुओं पर गहराई से चर्चा करते हैं।

अफगानिस्तान का अस्थिर इतिहास: अमेरिका और रूस की वर्चस्व की लड़ाई

अपनी बात को आगे बढ़ाने से पहले, आइए थोड़ा अफगानिस्तान के इतिहास पर नज़र डालते हैं। आप जैसे-जैसे यह कहानी सुनेंगे, आपको ईरान की वर्तमान स्थिति से एक अद्भुत समानता नज़र आएगी। अफगानिस्तान की कहानी 1919 में शुरू होती है, जब यह देश ब्रिटेन से आज़ाद हुआ। आजादी के बाद, वहां राजशाही की शुरुआत हुई, जो 54 साल तक चली। अंतिम राजा मोहम्मद ज़हीर शाह थे, जिन्होंने 1973 में बीमार पड़ने पर इलाज के लिए इटली का रुख किया।

इसी बीच, उनके सेनापति दाऊद खान ने तख्ता पलट कर दिया और खुद को प्रधानमंत्री घोषित कर दिया। यह 54 साल का काल अफगानिस्तान के लिए सबसे स्थिर माना जाता है। लेकिन 1973 के बाद, अफगानिस्तान ने जो देखा, वह आज तक उसे अस्थिरता के दलदल में फंसाए हुए है। दाऊद खान ने जनता से संविधान लाने का वादा किया था, लेकिन वे सिंगल-पार्टी शासन, एक तरह की तानाशाही ले आए, ताकि सत्ता उन्हीं के पास रहे।

जनता ने इसका विरोध किया और 1978 में एक क्रांति हुई, जिसका नेतृत्व नूर मोहम्मद तारिकी ने किया। यह वही समय था जब ईरान में खुमैनी का शासन आने वाला था, क्योंकि 1979 में वहां भी एक बड़ी क्रांति होने वाली थी। ये दोनों देश पड़ोसी हैं, और इन दोनों देशों में एक ही समय में महत्वपूर्ण राजनीतिक बदलाव हो रहे थे।

💡 "1978 में अफगानिस्तान में नूर मोहम्मद तारिकी के नेतृत्व में हुई क्रांति और 1979 में ईरान में खुमैनी के नेतृत्व में हुई क्रांति, दोनों ही पड़ोसी देशों में महत्वपूर्ण सत्ता परिवर्तन की घटनाएं थीं, जिनका वैश्विक शक्ति संतुलन पर गहरा प्रभाव पड़ा।"

अफगानिस्तान में तारिकी के सत्ता में आने पर उन्हें जनता का भारी समर्थन मिला और दाऊद खान को देश छोड़कर भागना पड़ा। तारिकी अफगानिस्तान के पहले राष्ट्रपति कहलाए। उन्होंने सोवियत रूस के साथ मिलकर काम किया, जिसका उन पर गहरा प्रभाव था। उस समय, सोवियत संघ अमेरिका का सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी था और अफगानिस्तान में साम्यवाद की लहर फैल रही थी। धर्म को खास महत्व नहीं दिया जा रहा था और समाज में समानता की बातें की जा रही थीं।

सोवियत रूस के समर्थन से, तारिकी आधुनिकीकरण पर ज़ोर दे रहे थे। वे स्कूलों, कॉलेजों, कारखानों की स्थापना और महिलाओं की आज़ादी पर ध्यान केंद्रित कर रहे थे। उनकी सोच एक ऐसी सोसाइटी बनाने की थी जहाँ श्रमिक और किसान बेहतर जीवन जी सकें। लेकिन, अफगानिस्तान के कुछ कट्टरपंथी समूहों को यह आधुनिकीकरण पसंद नहीं आया।

यहीं से कुछ इस्लाम को मानने वाले कट्टरपंथी कबीले, जिन्हें बाद में मुजाहिदीन कहा गया, ने नूर मोहम्मद तारिकी का विरोध करना शुरू कर दिया। इस विरोध को अमेरिका हवा दे रहा था, क्योंकि 1979 में अमेरिका ईरान से बाहर हो गया था। ईरान से निकलते ही, अमेरिका की नज़रें अफगानिस्तान पर टिक गईं।

अमेरिका नहीं चाहता था कि सोवियत संघ का प्रभाव उसके पड़ोस में बढ़े। इसलिए, सीआईए ने तारिकी का विरोध करने वाले मुसलमानों को भड़काना शुरू किया। मजहब के नाम पर लोगों को उकसाया गया और सीआईए ने तारिकी के विदेश मंत्री हफिजुद्दीन अमीन को अपने साथ मिला लिया।

यहां एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है: अमेरिका को इन सबमें क्या फायदा था? इसका जवाब वर्चस्व की लड़ाई में छिपा है। अमेरिका दुनिया में सबसे ऊपर रहना चाहता था। अगर उसे सोवियत संघ कहीं आगे बढ़ता दिखता, तो वह उसे रोकने के लिए हर संभव प्रयास करता। इसी वर्चस्व की लड़ाई का एक हिस्सा अफगानिस्तान में चल रहा था।

ईरान में क्रांति: अमेरिका के प्रभाव से धार्मिक शासन तक

अब बात करते हैं ईरान की। 1953 में, अमेरिका ने सीआईए और ब्रिटेन के साथ मिलकर ईरान में पहला तख्तापलट किया। उन्होंने मोहम्मद मोसदिक को हटाकर शाह राजा पहलवी को राजा बनाया। मोसदिक एक प्रगतिशील नेता थे, जिनका मानना था कि ईरान का तेल राष्ट्रीयकृत होना चाहिए, यानी तेल के कुएं ईरान की सरकार के होने चाहिए, न कि अमेरिकी और ब्रिटिश कंपनियों के।

यह बात अमेरिका को बर्दाश्त नहीं हुई। उन्होंने मोसदिक को हटा दिया और उनके स्थान पर रज़ा पहलवी को बैठाया, जो अमेरिका समर्थक थे। पहलवी ने बड़े पैमाने पर आधुनिकीकरण किया, महिलाओं को आज़ादी दी, ताकि लोगों को लगे कि अमेरिका महान है। शुरुआत में लोगों को यह सब अच्छा लगा, लेकिन धीरे-धीरे भ्रष्टाचार सामने आने लगा और यह स्पष्ट हो गया कि शाह पूरी तरह से अमेरिका का प्यादा हैं।

💡 "1953 में अमेरिका द्वारा ईरान में किया गया तख्तापलट, उस देश के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ, जिसने अमेरिकी प्रभाव को मजबूत किया लेकिन जनता में असंतोष के बीज बो दिए।"

धीरे-धीरे, जनता शाह के खिलाफ खड़ी हो गई। इस जनता का नेतृत्व खुमैनी ने किया और 1979 में एक धार्मिक क्रांति हुई। इसके बाद ईरान में सुप्रीम लीडर की सत्ता स्थापित हुई, जो आज भी जारी है। पहले खुमैनी, फिर खमनई, और अब खुमैनी के बेटे मुस्तबा खमनई तीसरे सुप्रीम लीडर हैं।

ईरान ने अमेरिका को इतना परेशान कर दिया था कि उन्होंने 444 दिनों तक अमेरिकी दूतावास पर कब्ज़ा कर लिया था। उन्होंने 52 अमेरिकी नागरिकों को तब तक नहीं छोड़ा, जब तक शाह को उन्हें नहीं सौंपा गया। शाह, जो ईरान से भागकर अमेरिका चले गए थे, बाद में मिस्र में मृत पाए गए।

ईरान से मिली इस बेइज्जती का बदला लेने के लिए, अमेरिका ने अफगानिस्तान में खेला किया। 1980 से 1988 के बीच, ईरान-इराक युद्ध हुआ, जिसमें अमेरिका ने इराक के सद्दाम हुसैन का साथ दिया। उसी सद्दाम हुसैन को, जिसे बाद में अमेरिका ने फांसी पर लटका दिया।

वर्तमान हालात: ईरान क्यों बन सकता है अगला अफगानिस्तान?

आज की स्थिति को देखते हुए, ईरान की तुलना अफगानिस्तान से करना कोई बेतुकी बात नहीं है। दोनों ही देशों में सत्ता की चाह है, लेकिन यह चाह संघर्ष और विदेशी हस्तक्षेप का नतीजा है। अफगानिस्तान में, अमेरिका ने 20 साल तक सरकार बिठाने की कोशिश की, लेकिन अंततः तालिबान का शासन वापस आ गया। आज अफगानिस्तान आर्थिक संकट, भुखमरी और मानवीय त्रासदी से जूझ रहा है।

ईरान भी आज उसी राह पर खड़ा दिखाई दे रहा है। अमेरिका ने ईरान पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए हैं, यह कहकर कि ईरान परमाणु हथियार बना रहा है, ठीक वैसे ही जैसे सद्दाम हुसैन के बारे में कहा गया था कि उनके पास रासायनिक हथियार हैं। इन प्रतिबंधों ने ईरान की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है। मुद्रा गिर गई है, महंगाई और बेरोजगारी बढ़ गई है।

💡 "अमेरिकी प्रतिबंधों और वैश्विक दबावों के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है, जिससे आम जनता पर भारी बोझ पड़ा है और देश को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।"

डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में, ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते (JCPOA) से अमेरिका के बाहर निकलने और फिर से प्रतिबंध लगाने के फैसले ने ईरान को दुनिया के नक्शे पर और भी अकेला कर दिया। अमेरिका और इज़राइल, ईरान के धार्मिक शासन को हटाना चाहते हैं। 47 साल पुरानी बेइज्जती का बदला लेने के लिए, 28 फरवरी का हमला यह दर्शाता है कि अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान में सत्ता परिवर्तन की कोशिश कर रहे हैं।

लेकिन, इस हमले के बाद जनता का समर्थन शासकों के साथ बढ़ गया है। जैसे तालिबान के शासन आने के बाद अफगानिस्तान में कोई बड़ा विद्रोह नहीं हुआ, उसी तरह ईरान में भी, नेताओं के मारे जाने के बाद भी जनता सड़कों पर नहीं आ रही है। ऐसा लगता है कि लोगों को यह संदेश मिल गया है कि अमेरिका ईरान का हितैषी नहीं है।

यह स्थिति ईरान को एक महत्वपूर्ण मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है। क्या ईरान भी अफगानिस्तान की तरह एक संघर्षरत देश बन जाएगा? क्या अमेरिका एक बार फिर किसी देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करके उसे अस्थिरता की ओर धकेल देगा?

डियागो गार्सिया और अमेरिकी सैन्य विस्तार

इसी बीच, हिंद महासागर में स्थित डियागो गार्सिया द्वीप पर अमेरिका को एक महत्वपूर्ण सैन्य सुविधा मिली है। यूके ने मॉरीशस से लीज पर लिया हुआ यह द्वीप अमेरिकी विमानों को ईरान पर हमला करने के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी है। जैसे ही ईरान को इस बात का पता चला, उसने जवाबी कार्रवाई के तौर पर वहां हमला कर दिया। यह घटना दर्शाती है कि पश्चिम एशिया में तनाव कितना बढ़ गया है और अमेरिका अपनी सैन्य उपस्थिति को मजबूत करने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है।

💡 "डियागो गार्सिया पर अमेरिकी सैन्य अनुमति और उसके बाद ईरान की जवाबी कार्रवाई, पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और शक्ति प्रदर्शन का एक और उदाहरण है।"

अमेरिका की नीतियां, चाहे वह अफगानिस्तान में हों या ईरान में, हमेशा से ही उसके वर्चस्व को बनाए रखने और रणनीतिक हितों को साधने पर केंद्रित रही हैं। लेकिन, इन नीतियों के कारण अक्सर उन देशों में अस्थिरता और मानवीय संकट पैदा होता है, जिनका वह खुद को 'मददगार' बताता है।

निष्कर्ष: अमेरिकी वर्चस्व का अंत या नया अध्याय?

सवाल यह है कि क्या अमेरिका अपने इरादों में सफल होगा? क्या ईरान का सत्ता परिवर्तन होगा? या क्या अमेरिका एक बार फिर से वैश्विक समुदाय के गुस्से का शिकार बनेगा? जिस तरह से भारत जैसे देशों ने अपने बाजारों को बचाने के लिए अमेरिका से समझौते किए, लेकिन फिर भी लाभ नहीं मिला, यह दर्शाता है कि दुनिया भर के देश अब अमेरिकी नीतियों के खिलाफ खड़े होने लगे हैं।

ईरान की स्थिति फिलहाल नाजुक है, लेकिन जनता का समर्थन शासकों के साथ होने से हालात बदल सकते हैं। अमेरिका के लिए यह आसान नहीं होगा कि वह दुनिया भर के बढ़ते दबाव को झेले। नाटो जैसे गठबंधन भी अब सवालों के घेरे में हैं। ऐसा लगता है कि अमेरिकी वर्चस्व, जो वेनेजुएला जैसे मामलों में मजबूत दिखता था, अब कमजोर पड़ रहा है।

पश्चिम एशिया के देश, जैसे सऊदी अरब, यूएई, और ओमान, भी धीरे-धीरे अमेरिका के असली चेहरे को पहचानने लगेंगे। अब यह देखना बाकी है कि ईरान का भविष्य क्या होगा और क्या यह एक बार फिर से अमेरिका की शक्ति की लड़ाई का मैदान बनेगा, या वह अपने दम पर खड़ा रहेगा।

Rajesh Kashyap

Digital & Tech enthusiast। पिछले कई सालों से Geopolitics, Indian Finance और EV sector को closely follow कर रहा हूँ। Behind The Fold (behindthefold.in) का Founder — जहाँ हम headlines के पीछे की असली कहानी लाते हैं।

और नया पुराने