Internet Freedom Under Threat? MP's Bold Tech Demands (इंटरनेट पर बड़ा सवाल — नेता की मांगें)

MP की टेक मांगें — डेटा, क्रिप्टो पर बड़ी बातें
Story at a Glance:
  • डेटा रोलओवर और स्वामित्व का मुद्दा
  • 28-दिवसीय मासिक प्लान का 'स्कैम'
  • इनकमिंग कॉल और सिम निष्क्रियता

हाल ही में, संसद में एक सदस्य ने प्रौद्योगिकी और संबंधित नीतियों को लेकर कुछ महत्वपूर्ण बातें उठाई हैं। यह चर्चा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने ऐसे मुद्दों को उठाया है जिन पर पहले भी बात हो चुकी है, खासकर टेलीकॉम क्षेत्र में। जब कोई निर्वाचित प्रतिनिधि प्रौद्योगिकी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), और वर्तमान नीतियों की खामियों पर सवाल उठाता है, तो यह निश्चित रूप से विचारणीय विषय बन जाता है। उनकी कई बातों से मैं भी सहमत हूँ, और इसलिए आज हम इसी पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

डेटा रोलओवर और स्वामित्व का मुद्दा

सबसे पहली और अहम बात जो कही गई है, वह है दैनिक डेटा की सीमा को लेकर। हमें हर दिन एक निश्चित मात्रा में डेटा मिलता है, जैसे 1.5GB या 2GB। लेकिन जब हम इस पूरे डेटा का उपयोग नहीं कर पाते, तो वह अगले दिन के लिए क्यों नहीं जुड़ता? यह डेटा हमारे पैसे से खरीदा गया है, और इसके पैसे हम चुका चुके हैं। तो, जितना डेटा हम इस्तेमाल नहीं करते, उसे अगले दिन इस्तेमाल करने का विकल्प क्यों नहीं मिलना चाहिए?

आजकल के रिचार्ज प्लान्स में एक 'चालाकी' देखी जा सकती है। ज्यादातर प्लान्स में दैनिक डेटा की सीमा होती है, न कि मासिक। ऐसा इसलिए है ताकि अधिकतम डेटा की खपत हो सके। यह एक आम व्यक्ति के लिए परेशानी का सबब है। यदि कोई व्यक्ति किसी दिन व्यस्त है, कॉलेज या स्कूल गया है, या किसी अन्य काम में लगा है, और वह अपना दैनिक डेटा का कोटा इस्तेमाल नहीं कर पाया, तो भी उसका पैसा तो लग गया है। वह डेटा अगले दिन क्यों नहीं जोड़ा जाता?

💡 "हम जो डेटा खरीदते हैं, उसके पैसे चुकाते हैं। अगर उसका इस्तेमाल न हो, तो वह अगले दिन क्यों नहीं मिलता?"

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि प्राप्त डेटा को हमारी 'डिजिटल प्रॉपर्टी' माना जाना चाहिए। इसका मतलब है कि हमें उसे किसी और को ट्रांसफर करने की सुविधा मिलनी चाहिए, जैसे हम पैसे ट्रांसफर कर सकते हैं। यदि आज मेरे पास कुछ डेटा बचा है, तो मैं उसे अपने परिवार के सदस्यों के साथ साझा क्यों नहीं कर सकता? यह सुविधा फिलहाल उपलब्ध नहीं है, और कंपनियां बिना इस्तेमाल किए डेटा को वापस ले लेती हैं।

यह सवाल उठता है कि क्या ऐसा संभव है? हाँ, यह बिल्कुल संभव है। कुछ टेलीकॉम कंपनियां, जैसे वोडाफोन आइडिया, डेटा रोलओवर की सुविधा प्रदान करती हैं, हालांकि यह डेटा ट्रांसफर की सुविधा नहीं है। लेकिन एयरटेल और जियो जैसी बड़ी कंपनियां इस सुविधा से वंचित हैं। यह उपभोक्ताओं के लिए एक बहुत ही बुनियादी सुविधा होनी चाहिए। जिस चीज के लिए आपने भुगतान किया है, उसका लाभ आपको मिलना चाहिए।

अगर किसी व्यक्ति ने पूरे महीने के लिए रिचार्ज कराया है और वह कुछ डेटा का उपयोग नहीं कर पाता, तो वह पैसा व्यर्थ जाता है। इसके बजाय, इस अप्रयुक्त डेटा को अगले दिनों के लिए जोड़ा जाना चाहिए या किसी अन्य रूप में इस्तेमाल करने का विकल्प मिलना चाहिए। एक सुझाव यह भी दिया गया है कि अप्रयुक्त डेटा के बदले में पॉइंट दिए जाएं, जिनका उपयोग बाद में प्लान की वैधता बढ़ाने या अन्य सुविधाओं के लिए किया जा सके। यह एक उत्कृष्ट विचार है, जो उपभोक्ताओं को अधिक लचीलापन प्रदान करेगा।

28-दिवसीय मासिक प्लान का 'स्कैम'

एक और बड़ा मुद्दा उठाया गया है वह है 28-दिवसीय मासिक प्लान। यह एक ऐसा 'स्कैम' है जिसके बारे में कई बार बात हो चुकी है। जब हम 28-दिन का प्लान लेते हैं, तो साल में हमें 13 रिचार्ज कराने पड़ते हैं। यदि 30-दिवसीय प्लान होता, तो साल में केवल 12 रिचार्ज की आवश्यकता होती। यह अतिरिक्त रिचार्ज कंपनी के लिए तो फायदेमंद है, लेकिन उपभोक्ता को अतिरिक्त पैसे खर्च करने पड़ते हैं।

यह समस्या नई नहीं है। 2022 में, सरकार ने टेलीकॉम कंपनियों को कम से कम एक 30-दिवसीय प्लान अनिवार्य कर दिया था। कंपनियों ने प्लान तो पेश किए, लेकिन उन्होंने उन्हें ज्यादा बढ़ावा नहीं दिया। वे अभी भी 28-दिवसीय प्लान को ही प्राथमिकता देते हैं। आम लोगों को 30-दिवसीय प्लान के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है, और कंपनियां इसे छुपा कर रखती हैं। उदाहरण के लिए, जियो में एक 319 रुपये का प्लान है जो लगभग पूरे महीने के लिए होता है, लेकिन कंपनी अपने 349 रुपये वाले प्लान को अधिक प्रचारित करती है।

💡 "28-दिन का प्लान असल में उपभोक्ताओं से साल में एक अतिरिक्त महीने का पैसा वसूल रहा है।"

वर्तमान दूरसंचार मंत्री ने यह स्पष्ट किया है कि सरकार टेलीकॉम कंपनियों को 1-महीने वाले प्लान को अधिक प्रचारित करने और उसे प्रमुखता से पेश करने के लिए निर्देशित करेगी। यह एक स्वागत योग्य कदम है, क्योंकि इससे उपभोक्ताओं को स्पष्टता मिलेगी और वे बेहतर निर्णय ले सकेंगे। यह दर्शाता है कि जब सही सवाल उठाए जाते हैं, तो बदलाव संभव है।

इनकमिंग कॉल और सिम निष्क्रियता

एक और महत्वपूर्ण बिंदु है कि जब हमारा रिचार्ज एक्सपायर हो जाता है, तो हम आउटगोइंग कॉल या डेटा का उपयोग नहीं कर पाते, लेकिन हमारी इनकमिंग कॉल और एसएमएस की सुविधा क्यों बंद कर दी जानी चाहिए? यह तर्कसंगत नहीं है। भले ही हम सक्रिय रूप से नेटवर्क का उपयोग नहीं कर रहे हों, लेकिन हमारी इनकमिंग कॉल प्राप्त करने का अधिकार बना रहना चाहिए। बहुत से महत्वपूर्ण ओटीपी और सूचनाएं इनकमिंग कॉल या एसएमएस के माध्यम से ही आती हैं।

इसके अलावा, यह सुझाव दिया गया है कि जिस सिम में रिचार्ज नहीं हुआ है, उसे 3 साल तक निष्क्रिय नहीं किया जाना चाहिए। यह ग्राहकों के लिए बहुत फायदेमंद हो सकता है, क्योंकि वे अपना नंबर लंबे समय तक बनाए रख सकते हैं।

तकनीकी रूप से देखें तो, जब आप इनकमिंग कॉल प्राप्त करते हैं, तब भी आप उस टेलीकॉम कंपनी के नेटवर्क का उपयोग कर रहे होते हैं। यह नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर को बनाए रखने वाली मशीनों के उपयोग के बराबर है, और इसी के लिए हम भुगतान करते हैं। 3 साल तक बिना भुगतान के इनकमिंग कॉल प्राप्त करना कंपनियों के लिए वित्तीय रूप से व्यवहार्य नहीं हो सकता। हालांकि, उपभोक्ता के दृष्टिकोण से यह एक बहुत ही लाभदायक सुविधा होगी।

'मेक AI इन इंडिया' की आवश्यकता

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के क्षेत्र में 'मेक इन इंडिया' की तर्ज पर 'मेक AI इन इंडिया' की पहल की जानी चाहिए। भविष्य कंप्यूटिंग पावर और AI मॉडल के विकास का है। भारत को इस क्षेत्र में पीछे नहीं रहना चाहिए। AI का विकास भारत में ही होना चाहिए।

इसके लिए, भारत में चिप्स का निर्माण भी महत्वपूर्ण है। AI के मॉडल कंप्यूटर पर चलते हैं, और ये कंप्यूटर चिप्स पर निर्भर करते हैं। यदि चिप्स का निर्माण भारत में होता है, तो यह AI के विकास को और गति देगा।

💡 "AI का भविष्य भारत में बनना चाहिए, ताकि हम इस तकनीकी क्रांति में अग्रणी रह सकें।"

यह भी आवश्यक है कि भारत में बनने वाले AI मॉडल भारतीय भाषाओं का समर्थन करें। इससे कोई भी नागरिक पीछे नहीं रहेगा। यह समझना महत्वपूर्ण है कि भाषा केवल संवाद का माध्यम है; यह बुद्धिमत्ता का माप नहीं है। एक व्यक्ति जो धाराप्रवाह अंग्रेजी नहीं बोल सकता, वह भी अत्यधिक बुद्धिमान हो सकता है। इसलिए, AI को सभी भारतीय भाषाओं के लिए सुलभ बनाना महत्वपूर्ण है।

क्रिप्टोकरेंसी पर अनिश्चितता

क्रिप्टोकरेंसी के मुद्दे पर भी महत्वपूर्ण बातें कही गईं। यह कहा गया कि भारत में क्रिप्टोकरेंसी का अधिकांश कारोबार 'ऑफशोर' (विदेशों में) हो रहा है। भारत में, क्रिप्टोकरेंसी को न तो पूरी तरह से अवैध घोषित किया गया है, और न ही पूरी तरह से कानूनी। उस पर भारी टैक्स लगाया जाता है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है जैसे वह अवैध हो।

भारत में वर्चुअल डिजिटल एसेट्स (VDA) या क्रिप्टोकरेंसी पर 30% का भारी टैक्स लगता है। लेकिन सरकार इसे कानूनी रूप से स्वीकार नहीं करती और न ही इसे पूरी तरह से प्रतिबंधित करती है। इसका एक कारण यह है कि क्रिप्टोकरेंसी विकेंद्रीकृत होती है और इसे नियंत्रित करना मुश्किल होता है।

इस अनिश्चितता और भारी टैक्स के कारण, लगभग 4.8 लाख करोड़ रुपये का ट्रेडिंग वॉल्यूम और 180 क्रिप्टो स्टार्टअप भारत से बाहर चले गए हैं। क्योंकि क्रिप्टोकरेंसी एक सार्वभौमिक तकनीक है, यह दुनिया भर में चल रही है। लेकिन भारत में इसकी सीमित स्वीकार्यता और नियामक अनिश्चितता के कारण, जो पैसा भारत में आ सकता था, वह नहीं आ पा रहा है।

💡 "भारत में क्रिप्टो पर लागू नियम इसे गैरकानूनी की तरह बनाते हैं, जिससे निवेशक और स्टार्टअप देश छोड़ रहे हैं।"

यह सच है कि क्रिप्टोकरेंसी अवैध गतिविधियों के वित्तपोषण का एक माध्यम बन सकती है, और यही कारण है कि सरकारें इस पर नियंत्रण चाहती हैं। हालांकि, इस पर स्पष्ट और स्थिर नियम बनाना आवश्यक है ताकि नवाचार को बढ़ावा मिले और निवेशक भारत में निवेश करने में सहज महसूस करें।

अंततः, यह कहना उचित है कि डेटा के संबंध में उठाई गई अधिकांश बातें, जैसे डेटा रोलओवर और 30-दिवसीय प्लान, बुनियादी उपभोक्ता अधिकार हैं और इन्हें लागू किया जाना चाहिए। इनकमिंग कॉल को जारी रखने का मुद्दा वित्तीय रूप से कंपनियों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है, लेकिन उपभोक्ता के लिए यह एक महत्वपूर्ण राहत होगी। AI के क्षेत्र में 'मेक AI इन इंडिया' की पहल और भारतीय भाषाओं के समर्थन का विचार अत्यंत प्रासंगिक और आवश्यक है। क्रिप्टोकरेंसी पर स्पष्ट नियमों की आवश्यकता है ताकि भारत इस उभरते हुए क्षेत्र में पीछे न रह जाए।

Rajesh Kashyap

Digital & Tech enthusiast। पिछले कई सालों से Geopolitics, Indian Finance और EV sector को closely follow कर रहा हूँ। Behind The Fold (behindthefold.in) का Founder — जहाँ हम headlines के पीछे की असली कहानी लाते हैं।

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