- क्या नाटो देश अमेरिका के साथ खड़े होंगे?
- ईरान की 'सैजल' मिसाइल: एक खतरनाक हथियार
- नेतनयाहू की गायब होने की अफवाहें
हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति का एक इंटरव्यू वायरल हो रहा है, जिसमें वह दुनिया के देशों से मदद की गुहार लगा रहे हैं। वह देशों से युद्ध में साथ आने का आह्वान कर रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अमेरिका 'स्टेट ऑफ हॉर्मोस' में हार गया है?
क्या यह सच है कि राष्ट्रपति को इस समय मदद मांगने की जरूरत पड़ रही है? क्या दुनिया के देशों ने उन्हें अकेला छोड़ दिया है? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या नाटो देश उनकी मदद के लिए आगे आएंगे?
यह सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि खबरों में कहा जा रहा है कि राष्ट्रपति ने हाल ही में दुनिया के देशों से 'स्टेट ऑफ हॉर्मोस' को चालू रखने के लिए मदद मांगी है।
क्या नाटो देश अमेरिका के साथ खड़े होंगे?
पहला सवाल यही है। क्या वाकई में अमेरिका ईरान के सामने अपनी स्थिति को सही साबित नहीं कर पा रहा है? या अंतरराष्ट्रीय दबाव ने अमेरिका को कूटनीतिक स्तर पर अलग-थलग कर दिया है?
साथ ही, आज के विश्लेषण में हम उत्तर कोरिया का भी जिक्र करेंगे, जिसने खुद को युद्ध में अकेला पाकर दक्षिण कोरिया की सांसें अटका दी हैं।
"ईरान की 'सैजल' मिसाइल, जो लक्ष्य बदलकर आयरन डोम जैसे सिस्टम को चकमा दे सकती है, इजराइल पर दागी गई!"
फिलहाल, राष्ट्रपति की धमकियां सर्वोपरि हैं, जिसमें उन्होंने नाटो देशों से कहा है कि यदि वे साथ नहीं आए तो बहुत बुरा होगा।
नाटो देशों के साथ बुरा करने की धमकी देने वाले राष्ट्रपति, किस तरह से दुनिया से धमका कर मदद मांग रहे हैं? क्या यह उनका गुंडागर्दी वाला तरीका है, या वाकई में अमेरिका जरूरत में है? चलिए, विश्लेषण करते हैं।
आज अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जंग का 17वां दिन है। इस बीच, युद्ध के अपडेट में सबसे बड़ी खबर यह है कि ईरान ने इतने दिनों से अपनी जो 'सैजल' मिसाइलें इस्तेमाल नहीं की थीं, उनका हाल ही में इस्तेमाल किया है।
ईरान की 'सैजल' मिसाइल: एक खतरनाक हथियार
यह 'सैजल' मिसाइल ईरान की ब्रह्मोस समझी जाती है। इस मिसाइल की रेंज 2000 से 2500 किलोमीटर तक मानी जाती है। ठोस ईंधन से चलने वाली इस मिसाइल को ईरान ने इजरायल पर लॉन्च किया है।
इस मिसाइल को 'डांसिंग मिसाइल' के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि यह मिसाइल लक्ष्य पर पहुंचकर भी अपना लक्ष्य बदल सकती है, यानी कि रास्ते से लक्ष्य पर पहुंचने से पहले अपनी दिशा बदल सकती है।
"यह मिसाइल लक्ष्य पर पहुंचकर भी अपना लक्ष्य बदल सकती है, जिससे यह आयरन डोम जैसे सिस्टम के लिए एक बड़ी चुनौती बन जाती है।"
ऐसा इसलिए महत्वपूर्ण बताया जा रहा है क्योंकि ऐसा करके यह मिसाइल आयरन डोम जैसे सिस्टम से सेल्फ-डिफेंस की ओर चली जाती है। यही कारण है कि इस मिसाइल को एक बड़ी आक्रामक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
ईरान ने इजरायल के ऊपर अपना रवैया बदल दिया है और ऐसी मिसाइलों का उपयोग कर रहा है, जो उसने अब तक नहीं की थीं। क्या भविष्य में वह कुछ और खतरनाक प्रयोग कर सकता है?
'सैजल' मिसाइल का परीक्षण पहले भी जून 2025 में किया गया था। लेकिन जैसे ही अब इसे चलाया गया है, इसके बाद ईरान की रणनीति को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
नेतनयाहू की गायब होने की अफवाहें
चर्चाएं तो इस बात पर भी हैं कि नेतन्याहू को कहीं कुछ हो तो नहीं गया है। ऐसा इसलिए, क्योंकि सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे मीम्स भी वायरल हो रहे हैं, जिनमें नेतन्याहू ने जब राष्ट्र को संबोधित किया तो उनके हाथ में छह उंगलियां दिखाई दी थीं।
इससे सोशल मीडिया पर यह बज क्रिएट हुआ कि कहीं उनका देहांत तो नहीं हो गया है? कहीं उनका एआई-जनित वीडियो चलाकर इस्तेमाल तो नहीं किया जा रहा है?
"नेतन्याहू कहां हैं?" यह सवाल कई दिनों से पूछा जा रहा था, और उनकी अचानक सार्वजनिक उपस्थिति ने डीपफेक की अटकलों को हवा दी।
नेतनयाहू कहां हैं? यह कई दिनों से पूछा जा रहा था। अचानक कल नेतनयाहू फिर उपस्थित हुए और वह एक कॉफी शॉप पर कॉफी पीते हुए दिखाई दिए। सवाल फिर खड़े होते हैं कि जिन्हें मृत बताया गया था, उन्हें इजरायल वालों ने डीपफेक से रीजनरेट करके दुनिया के सामने खड़ा कर दिया है?
खैर, सच क्या है, यह तो खैर इजरायल ही जानता है। लेकिन इस बीच, दोनों देशों के अपने दावे हैं।
ईरान पर जनता का भरोसा, अमेरिका पर संदेह
जहां ईरान को इस बात की सबसे ज्यादा सहायता मिल रही है कि ईरान सच बोल रहा है। क्योंकि खमनी की मौत पर ईरान ने सार्वजनिक रूप से घोषणा कर दी थी कि हां, वह मर गए हैं।
और अमेरिका इस समय डिनायल मोड में चला गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति, जो दुनिया भर के सामने भारत और पाकिस्तान के बीच में ऑपरेशन सिंदूर के समय हीटेड माहौल बन गया था, उन फाइटर जेट्स को गिराने की संख्या 11 तक बता चुके हैं।
आज खुद एआई के जमाने में कहते हुए पाए जा रहे हैं कि ईरान फर्जी तरीके से एआई-जनित वीडियो डालकर दिखा रहा है कि हमारे कितने नुकसान हुए हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति कह रहे हैं कि ईरान पांच-छह फाइटर जेट गिराने की जो हमारी बातें कर रहा है, ऐसा कुछ नहीं हुआ है। यह विचारणीय तथ्य है कि अमेरिका को एआई का निर्माता कहा जाए, जहां से एआई शुरू होकर आया है, जिसकी टॉप कंपनियां जिसके कंट्रोल में हैं, वह आज ईरान पर डीपफेक का आरोप लगा रहा है।
"एआई का जनक अमेरिका, अब ईरान पर डीपफेक का आरोप लगा रहा है, जबकि जनता ईरान की बातों पर ज्यादा विश्वास कर रही है।"
सत्यता के मामले में जनता ईरान पर ज्यादा विश्वास कर रही है कि वह जो कह रहा है, वह ज्यादा सही है।
राष्ट्रपति, जो कह रहे हैं, वह बहुत दिनों से झूठे साबित हो चुके थे और अब उनका झूठ सार्वजनिक हो चुका है। तो इस चलते उनके साथ लोग रिलेट नहीं कर पा रहे हैं।
कुल मिलाकर, ईरान अब अमेरिका को उसकी इमेज के साथ-साथ उसकी जियोपॉलिटिकल स्थिति के साथ-साथ तमाम जगहों पर बराबर चोट पहुंचा रहा है।
'स्टेट ऑफ हॉर्मोस' पर ईरान का नियंत्रण
जहां तक खमनी के बेटे द्वारा सत्ता संभालने की बात है, तो वह स्वस्थ और तंदुरुस्त बताए गए हैं। लेकिन अमेरिकियों के सामने वह दिख नहीं रहे हैं।
लेकिन उन्होंने 'स्टेट ऑफ हॉर्मोस' पर अपना नियंत्रण साफ दिखा दिया है। चर्चा है कि 'स्टेट ऑफ हॉर्मोस' से निकलने वाले जहाजों को पूरी तरह निशाना ईरान द्वारा बनाया जा रहा है।
लेकिन अपने फ्रेंडली नेशंस को छोड़ दिया जा रहा है। उन देशों में चीन और भारत का नाम सर्वोपरि है कि यदि ये दो देशों के जहाज यहां से निकलेंगे तो उन्हें ईरान नुकसान नहीं पहुंचाएगा।
तारीफ इस बात की हो रही है कि भारत ने दोनों ही देशों से, जो दोनों युद्ध कर रहे हैं, उनसे किस तरह से अपनी कूटनीति सेट कर ली। इजरायल से मिलकर आए थे, अगले दिन ईरान से जंग शुरू हुई। उसके बावजूद भी ईरान भारतीय जहाजों को आने दे रहा है।
अमेरिका से भारत को 1 महीने तक रूस से तेल खरीदने की छूट मिलती है, वहीं ईरान भी हमें तेल निकालने की इजाजत देता है। चर्चाएं भारत की कूटनीति की भी इन दिनों जोरों पर हो रही हैं।
खैर, चर्चाएं तो अमेरिका की भी हो रही हैं, जिसने 'स्टेट ऑफ हॉर्मोस' के बारे में कहा था कि मैं यहां से निकलने वाले जहाजों को सुरक्षा दूंगा।
अमेरिकी वादों का पलटना
यूएस नेवी विल प्रोटेक्ट गल्फ शिपिंग एज ईरान थ्रेटन स्टेट ऑफ हॉर्मोस। यह 4 तारीख की खबर है। यह उसकी कटिंग है, जिसको मैं आपको दिखा रहा हूं कि दुनिया वालों चिंता मत करो, यहां से निकलने वाले सभी जहाजों को अमेरिकी नेवी पूरी तरह एस्कॉर्ट करेगी, उनकी सुरक्षा देगी।
4 तारीख को राष्ट्रपति का ही यह ट्वीट है। लेकिन यही राष्ट्रपति समय बीतते-बीतते पलट जाते हैं। वह साफ 11 तारीख को कहते हैं कि यूएस नेवी फिलहाल ऑयल टैंकर्स को एस्कॉर्ट करने की स्थिति में नहीं है।
कारण बताया जाता है कि ईरान अपने ड्रोन्स के थ्रू, छोटे-छोटे बॉम्ब्स के थ्रू किसी भी टैंकर को नुकसान पहुंचा रहा है। हम सुरक्षा नहीं कर पाएंगे।
"4 तारीख को अमेरिकी राष्ट्रपति ने जहाजों की सुरक्षा का वादा किया, लेकिन 11 तारीख को कहा कि हम ऐसा करने में असमर्थ हैं।"
और जब हम सुरक्षा नहीं कर पाएंगे, तो बाकी लोग अपनी सुरक्षा करने के लिए आगे चले आएं। राष्ट्रपति का हतोत्साहित होना दिखाई पड़ता है।
लेकिन यहां एक बात जानना जरूरी है। हमने आपसे पहले भी कहा था कि पश्चिम एशिया में ईरान द्वारा पश्चिम एशिया के जो देश हैं, चाहे यूएई है, सऊदी, कतर, बहरीन, इनको निशाना बनाया जाएगा और अमेरिका यह चाहता था कि जैसे ही इन्हें निशाना बनाया जाए, ये देश भी ईरान पर हमला करने के लिए अग्रसर हों।
अमेरिका की युद्ध रणनीति का पर्दाफाश
क्योंकि इतने दिनों तक युद्ध चलते हुए हो चुका है, 17 दिन चल चुके हैं और अब तक यह देश पश्चिम एशिया के देश हमले का प्रतिक्रिया नहीं कर रहे हैं। इससे राष्ट्रपति बौखला रहे हैं।
राष्ट्रपति को लग यह रहा था कि चाहे कुछ हो ना हो, मैं ईरान का जो रिटेलिएशन होगा, उसमें इन देशों को निशाना बनाया जाएगा। तो ये देश आत्मरक्षा के लिए ही ईरान पर हमला कर पड़ेंगे।
और एक बार ये हमला करने निकल पड़े, तो मेरी हथियारों की सेल बढ़ जाएगी। मिडिल ईस्ट के देश मुझसे हथियार खरीदने निकल पड़ेंगे। उनके पास बहुत पैसा है और मुझसे वेपन खरीदेंगे।
तो अमेरिका ने यह युद्ध शुरू किया ही इसलिए था कि मैं बस तीली लगाऊंगा, उसके बाद ये आपस में झगड़ेंगे और झगड़ करके मेरे पास चले आएंगे। बिल्कुल वैसे ही जैसे द्वितीय विश्व युद्ध के अंदर बचावकर्ता के रूप में निकला था और शक्तिशाली राष्ट्र बन गया था।
कहते हैं कि फ्रांस और ब्रिटेन जब इटली और जापान से लड़ रहे थे, उस समय पर यह दोनों ही देशों के बीच में शुरुआत में सप्लायर बनकर खड़े थे। खड़े फर्स्ट कॉर्नर में हमेशा से ब्रिटेन फ्रांस के साथ थे। लेकिन किसी की मदद पड़े तो हम हैं।
ऐसे में आज की स्थिति फिर से दिखाई पड़ती है कि ये ईरान और सऊदी को लड़ाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे थे। जबकि उन देशों ने साफ मना किया था कि सर, ईरान पर गोला मत डालना।
लेकिन इन भाई साहब ने गोला डाला, क्योंकि खुद तो बहुत दूर बैठे हैं और खुद की मार के नाम पर इन देशों को पिटवाना शुरू किया। अब जब ये लोग नहीं निकले, तो इनका पूरा फ्रस्ट्रेशन जाहिर हो रहा है।
खुद बाहर निकल कर कह रहे हैं कि मेरे पास तो खूब तेल है। जिनका तेल नहीं बिक रहा या जिनके देश में तेल नहीं पहुंच रहा, वो आगे आए और वो 'स्टेट ऑफ हॉर्मोस' को खुला रखने में मदद करें।
"राष्ट्रपति ने 'स्टेट ऑफ हॉर्मोस' के ट्रैफिक को बुरी तरह बिगाड़ दिया है, जिससे प्रतिदिन जहाजों की संख्या 150 से घटकर सिर्फ 4 रह गई है।"
राष्ट्रपति ने 'स्टेट्स' को इस तरह बिगाड़ दिया है कि जहां 'स्टेट ऑफ हॉर्मोस' से पहले 150 जहाज पर डे निकलते थे, आज वहां चार जहाज पर डे निकल कर जा रहे हैं।
और राष्ट्रपति ने इस स्थिति तक दुनिया को पहुंचाकर खुद हाथ खड़े कर दिए हैं। अपनी तरफ से कहते हैं कि 'स्टेट ऑफ हॉर्मोस' से जो तेल हासिल करने वाले रास्ते देश हैं, वो खुद की सुरक्षा खुद सुनिश्चित करें। हम उनकी पूरी मदद करेंगे।
लेकिन उन देशों के साथ तालमेल जरूरी है, ताकि यह सब लगातार जारी रह सके।
नाटो की बेरुखी और अमेरिकी अलगाव
साफ-साफ सी बात है कि अमेरिका ने पहले युद्ध शुरू किया। युद्ध शुरू करके जब पूरी तरह रायता फैल गया, तो उसे समेटने के लिए दुनिया के देशों का आवाहन हो रहा है।
इसमें यूरोप के इनके जो साथी हैं, नाटो के जो अलाइज हैं, जो कि अकॉर्डिंग टू इनका जो आर्टिकल फाइव है, जिससे बंधे हुए हैं कि अगर अमेरिका पर हमला होता है, तो उसे हम सब पर हमला माना जाएगा, उनको यह आवाहन दे रहे हैं कि तुम लोग आओ, अमेरिका पर हमले हो रहे हैं और हमें बचाओ।
लेकिन इस बात को स्वीकार नहीं रहे हैं कि हम पर हमले हो रहे हैं। इसलिए वो देश भी नहीं आ रहे हैं। तो नाटो ने भी आने से इंकार कर दिया और ये जो पश्चिम एशिया के देश हैं, ये भी बदला नहीं ले रहे। ये राष्ट्रपति की रणनीति बिगाड़ने वाला है।
इसी के चलते राष्ट्रपति ने अपने जहाज में चलते-चलते ये कहा कि वी ऑलवेज देयर फॉर नाटो। हम हमेशा नाटो के लिए थे, हम उनकी मदद कर रहे थे यूक्रेन के मामले में। लेकिन अब हमें कोई मदद करने नहीं आ रहा है। हमारे साथ में आना चाहिए।
अगर ये नहीं आते हैं, तो बड़ी मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है। 'स्टेट' को ओपन रखने के लिए तो इन्हें आना चाहिए। हमारे पास तो खूब सारा तेल है, हमें कोई जरूरत नहीं है।
लेकिन मैं सब उन देशों से कह रहा हूं, जिनके देशों में तेल नहीं पहुंच रहा है। तो महाराज, आपने युद्ध शुरू किया था, तो आप पंच बनकर क्यों गए थे? हमें तो ईरान से पहले भी दिक्कत नहीं हो रही थी।
आपने जाकर बम मारे, युद्ध को शुरू किया। अब आप कह रहे हैं कि आपको तेल चाहिए, तो आप रास्ता खुलवा लो। तो बिगाड़ने चले आए थे?
"यह कूटनीति की विफलता है कि अमेरिका ने युद्ध शुरू किया और अब दुनिया से मदद मांग रहा है, जबकि नाटो देश भी पीछे हट गए हैं।"
तकनीकी रूप से अगर देखा जाए, तो दुनिया का हर व्यक्ति इस बात से जरा जरूर आहत होगा कि अमेरिका, तुम तो शुरू किए थे इस पूरी जंग को। अब जब बिगड़ चुका है माहौल, तब दुनिया से कह रहे हो कि आओ और रास्ता खुलवा कर के सामान लेकर चले जाओ।
इसका मतलब यह हुआ कि तुम्हारी चाहत पहले से ही ईरान को खराब करने की नहीं थी। तुम्हारी पूरी वर्ल्ड ऑर्डर को अव्यवस्थित करने की थी कि मैं दुनिया को एक बार तहस-नहस कर दूं।
समझदारी दुनिया के देशों ने यह की कि वह तुम्हारे साथ जाकर जंग में नहीं उतरे। हर देश अपना किनारा करके बैठ गया, क्योंकि वह तुम्हारे सोच से वाकिफ हो चुके थे।
कोई भी नाटो कंट्रीज तक इनके साथ नहीं आए। पश्चिम एशिया के जो देश हैं, वह भी इनके साथ नहीं आए। ये अपनी बातें कहते रहे। इस बात पर लोगों ने इन्हें अमेरिका में ही घेरना शुरू किया और कहा कि मिस्टर प्रेसिडेंट, आप भूल चुके हैं।
आपने अपने ही नाटो सहयोगियों का क्षेत्र कब जाने का प्लान किया था? ग्रीनलैंड वाला मामला याद होगा ना? जब ये माधुरों को उठा लिए थे। उसके बाद इनका हौसला बहुत बढ़ गया था, ये ग्रीनलैंड हथियाने चले थे।
तो इसके बाद इनको कहा गया कि मिस्टर प्रेसिडेंट, भूल गए, आप अपने नाटो सहयोगियों के ही क्षेत्र को कब्जाने निकले थे। भाई साहब, सब लोग इनको देखकर के कह रहे हैं कि आज अमेरिका इनके चलते जिस तरह से पूरी दुनिया के अंदर अलग-थलग पड़ गया है, जिसको घमंड था कि मैं पूरी दुनिया में अकेले राज कर सकता हूं, एक युद्ध अकेले लड़ने निकला, उससे पूरी दुनिया ने रास्ता दिखा दिया कि तुम कुछ नहीं कर पाओगे।
चीन का दबाव और भारत की कूटनीति
कुल मिलाकर, अमेरिकी राष्ट्रपति का अब एक और हतोत्साहित भरा बयान वायरल हुआ, जिसमें वह कहते हैं कि हो सकता है कि मुझे इस महीने जो चीन जाना था, वह लेट हो सकता है।
अगर चीन चाहे तो वह 'स्टेट ऑफ हॉर्मोस' को ओपन करवाए और यहां पर अपना जहाज भेजें, युद्ध करने के लिए, ताकि मैं उनसे मिलने जा सकूं। मतलब, अमेरिकी राष्ट्रपति चीन जाते हैं, लेकिन चीन पर प्रेशर है कि तुम पहले अपना जहाज भेजो 'स्टेट ऑफ हॉर्मोस' के लिए, ताकि मैं तुम्हारे देश में आ सकूं।
इसको चीन के लोग मजाक में ले रहे हैं। वह कह रहे हैं कि सर, आप भूल रहे हैं। चीनी जहाज भी 'स्टेट ऑफ हॉर्मोस' से बेरोक-टोक आ रहे हैं। ईरान ने चीनी जहाजों को जाने की परमिशन दे दी है।
यह हेडलाइन बनना शुरू हो रही है। ब्लूमबर्ग ने इस बात को लिखते हुए कहा कि साहब, आपका वहां जाना डिले हो सकता है, क्योंकि आप परफॉर्म नहीं कर पा रहे हैं।
लेकिन चीन ने ईरान के साथ बात बैठा ली है। बिल्कुल वैसे ही, जैसे भारत ने ईरान के साथ बातचीत बिठा ली है। 'स्टेट ऑफ हॉर्मोस' से भारतीय जहाज क्रॉस भी होने शुरू हो चुके हैं। दो भारतीय जहाज 'स्टेट ऑफ हॉर्मोस' को क्रॉस करके आ रहे हैं।
यह बात ईरान ने अनाउंस कर दी थी। इसके चलते वर्ल्ड मीडिया में भारत की इस डिप्लोमेसी की चर्चा है कि भाई, यह कैसे संभव हुआ?
तो अमेरिका के खुद एनर्जी मिनिस्टर कहते हैं कि हो सकता है इंडिया ने ईरान के साथ कोई डील कर ली हो। भाई साहब, इसकी चर्चा अल अरेबिया में भी होती है और इस बात की तारीफ होती है कि भारत ने अमेरिका को भी साध लिया और ईरान को भी साध लिया और अपनी जरूरतों को भी पूरा करने के लिए जो प्रयास करने थे, वह कर लिए।
लेकिन जो कूटनीति नहीं कर पाए, वह ये महाशय हैं। इनकी वजह से दुनिया के देशों को परेशानी हुई।
पत्रकारों से बचना और सैनिकों की मौत पर चुप्पी
और तो और, अब ये दुनिया के पत्रकारों से बचते दिखाई दे रहे हैं। अपने हवाई जहाज में अक्सर इन्हें इंटरव्यू देना होता है।
हवाई जहाज में इंटरव्यू दे रहे थे। एक पत्रकार ने इनसे पूछा कि सर, छह अमेरिकी सैनिक मर गए, उस पर क्या कहेंगे? भाई साहब, सवाल इग्नोर करके अंदर चले जाते हैं।
इस पर फिर से अमेरिका में लोग इन्हें ट्रोल करने निकल पड़ते हैं कि लीजिए, और पूछ लीजिए कितने लोग थे? कोई जवाब नहीं।
इस प्रकार से इनको और ट्रोल किया गया कि साहब, अमेरिकी शायद यही डिजर्व करते हैं कि एक राष्ट्रपति सैनिकों के मरने पर चुप्पी साधे और फालतू के बयान देते हुए निकल जाए।
"सैनिकों की मौत पर अमेरिकी राष्ट्रपति की चुप्पी ने उन्हें आलोचना का शिकार बनाया है, जबकि वह पत्रकारों से बचने की कोशिश कर रहे हैं।"
एक और चर्चा निकल कर आई और वो ये है कि ये अपनी तरफ से एक बयान देते हुए पाए गए थे कि हो सकता है कि मैं 5000 सैनिकों को वहां भेजूं।
इस पर रिपोर्टर ने पूछा कि सर, आप 5000 सैनिक वहां भेजने वाले थे। राष्ट्रपति कहते हैं, "यू आर वेरी ऑब्नॉक्सशियस पर्सन।" यानी कि उस पत्रकार को ही यह भद्दी टिप्पणी कर देते हैं और इस बात को भी अमेरिका में इस तरह से लिया जाता है कि राष्ट्रपति फ्रस्ट्रेट हो रहे हैं।
उन सवालों को, जिस पर अमेरिका घिर रहा है, उनको जवाब देने से ये बचते हुए दिख रहे हैं।
नाटो की बेरुखी और जापान-दक्षिण कोरिया की स्थिति
खैर, कुल मिलाकर के नाटो के हाल क्या हैं, वो आप सबके सामने हैं। नाटो का आर्टिकल फाइव जरूर यह कहता है कि अमेरिका के साथ जो कुल 32 देश हैं, उनमें से किसी भी देश पर हमला होगा, तो सब साथ होंगे।
लेकिन फिलहाल, क्योंकि अमेरिका यह नहीं कह रहा कि मुझ पर हमला हुआ है, तो इनमें से कोई भी आर्टिकल फाइव को नहीं मान रहा है। नाटो मेंबर्स अमेरिका के युद्ध में जाने पर सहमत नहीं हैं। उन्होंने इस युद्ध को अपना युद्ध नहीं माना।
यूके के जितने, यूएस के जितने भी अलाइज हैं, उन्होंने साफ-साफ मना करना शुरू कर दिया है। नाम में यूके, ऑस्ट्रेलिया, जापान इन सबके नाम हैं। जिन्होंने साफ कहा है कि हम 'स्टेट ऑफ हॉर्मोस' में अपने जहाज नहीं भेजेंगे।
और 'स्टेट ऑफ हॉर्मोस' में जहाज न भेजने के पीछे का इनका तर्क यह है कि हम उस स्थिति को अपने ऊपर क्यों लें, जो आपने शुरू की है। हर देश सीधा मना न हो, तो इनडायरेक्टली मना कर दे रहा है।
जापान मना कर रहा है कि हमारा लीगल फ्रेमवर्क ऐसा नहीं है कि हम जहाज लड़ने भेजें, आपके कहने पर।
दक्षिण कोरिया का तो हाल बहुत बुरा हो गया है। बेचारे के साथ बड़ी चोट हुई है। जापान और दक्षिण कोरिया को अमेरिका ने वचन दिया था कि हम तुम्हारी सुरक्षा करेंगे। इस चलते सुरक्षा के नाम पर दक्षिण कोरिया वाले अमेरिका को भर-भर के पैसा भी देते हैं।
दक्षिण कोरिया और जापान वो देश हैं जो कभी, क्या आज भी अमेरिका के पूरी तरह से कॉलोनी की तरह काम करते हैं। मतलब, अमेरिका यहां पर अपनी पूरी सेना बिठा के रखता है, पूरा इन पर कंट्रोल करके रखता है।
उत्तर कोरिया का खतरा
उत्तर कोरिया पूरी तरह से चीन का नादान बच्चा है, जिसको छोड़ रखा है इन दोनों को डराने के लिए। उत्तर कोरिया में किम जोंग उन, राष्ट्रपति के दूसरे कार्यकाल में बिल्कुल चर्चा में नहीं पाए, इंतजार कर रहे थे कि राष्ट्रपति एक बार घिरे, तो हम अपनी प्रेजेंस लगाएं कि साहब, हम भी हैं।
ऐसे में किम जोंग उन ने हाल ही में दक्षिण कोरिया और जापान पर से मिसाइल क्रॉस करा दी। कब हुआ? हुआ यह कि अभी जब पश्चिम एशिया के अंदर मिसाइलें गिर रही थीं, तो कई मिसाइलों ने अमेरिकी डिफेंस सिस्टम, जो THAAD है, जो कि अमेरिका का S-400 समझा जाता है, उसको नुकसान पहुंचाया।
S-400 को जैसे ही नुकसान हुआ, तो तत्काल प्रभाव से अमेरिका चौंका कि यार, यह तो बड़ा लॉस है, जो हमें हो गया है। S-400 मतलब, जो THAAD सिस्टम है, अमेरिका का, वह रूस के S-400 का सिमिलर समझ लीजिए।
तो उन्होंने दक्षिण कोरिया में लगा हुआ THAAD उठवाया और अपने पास पश्चिम एशिया के अंदर बुला लिया। यहां से जो S-400 का तुल्य THAAD, जो है, उसको यहां से लेकर जब पश्चिम एशिया गया अमेरिका, तो उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया को फिर डरा दिया।
उत्तर कोरिया, जो इतने दिन से हाशिए पर थे, इन्होंने अब अपने द्वारा मिसाइल चलाते हुए THAAD की एब्सेंस में दक्षिण कोरिया को डरा दिया है।
"अमेरिका ने दक्षिण कोरिया से THAAD सिस्टम हटा लिया, जिसके बाद उत्तर कोरिया ने 10 बैलिस्टिक मिसाइलें दाग दीं।"
उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया को धमकाने के लिए बम चला दिया है। हेडलाइन बनती है कि उत्तर कोरिया ने 10 बैलेस्टिक मिसाइल फायर कीं, जो कि सी ऑफ जापान में जाकर के गिरी और यह चिंता दक्षिण कोरिया के लिए बड़ी चिंता बन गई।
कुल मिलाकर के, जापान और दक्षिण कोरिया इसलिए भी साथ नहीं हैं कि साहब, आपने पहले पश्चिम एशिया में जंग शुरू कर दी, अब आप हमारे यहां शुरू कर रहे हो। हमें बखश दो, हम अपनी सुरक्षा कर लेंगे।
किम जोंग उन के मीम बहुत वायरल हो रहे हैं कि एक लाइक कर दो, मैं युद्ध में आ जाऊंगा। इस तरह के मीम बहुत वायरल हो रहे हैं।
किम जोंग उन को लोग तरह-तरह से एआई से बना-बनाकर दिखा रहे हैं कि बेचारे बड़े उदास हैं कि मैंने इतनी मिसाइलें बना रखी हैं, कोई खेलने ही नहीं दे रहा है।
लोग इनके मीम इसलिए भी बना रहे हैं कि अमेरिका सबसे ज्यादा उत्तर कोरिया से नफरत करता था कि उसने परमाणु कार्यक्रम बना रखा है। इस पूरे डेढ़ साल में राष्ट्रपति ने एक शब्द उस पर नहीं बोला और जो सहयोगी थे, उन सबको घसीटा।
ऐसे में यह चर्चा अपने आप में बड़ी चर्चाओं में बनकर आती है।
अन्य देशों की कड़ी प्रतिक्रिया
साथ ही साथ, इमैनुएल मैक्रों ने अभी ईरान के राष्ट्रपति से बात की है और उन्होंने इस रास्ते में पूरी तरह 'स्टेट ऑफ हॉर्मोस' को चलते रहने में, जो फ्रांसीसी नागरिक निशाने पर आ गए हैं या फिर उनको लगता है कि शायद उनके साथ कुछ गड़बड़ हो गई है, उस पर भी इन्होंने उस मुद्दे को वहां उठाया है।
कनाडा ने तो साफ-साफ सदन में मना कर दिया है। कनाडा बोला है कि वह पार्टिसिपेट नहीं करेगा इजरायल और अमेरिका के साथ मिलकर के ईरान के खिलाफ। यानी कि अमेरिका के साथ खड़े रहने वाले देश पीछे हट रहे हैं।
इटली ने अपनी तरफ से यूएस के वॉर को क्रिटिसाइज किया है। साथ ही साथ में जो बच्चियों के ऊपर बम गिरा, जो बच्चियां मारी गईं, स्कूल में, जो इनकी एक मिसाइल के गलत फायर हो जाने से हुआ था, उसको टॉम हॉक मिसाइल के चलते, उसको इन्होंने क्रिटिसाइज किया है।
कुल मिलाकर के, अमेरिका केवल इजरायल के साथ खड़ा है। दुनिया का कोई देश उसके साथ इस जंग में साथ नहीं है। इससे बुरा किसी पावर के लिए नहीं हो सकता।