- 'एपिक फ्यूरी' अभियान का उद्देश्य
- राजनीतिक खेल और जनहित
पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बढ़ रहा है, जहाँ हाल ही में अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए हमले की भयावह तस्वीरें सामने आई हैं। इन हमलों के परिणामस्वरूप न केवल तेल भंडारों में आग लगी, बल्कि असामान्य 'काली बारिश' और पानी की किल्लत जैसी गंभीर समस्याएं भी उत्पन्न हो गईं, जो आने वाले समय में वैश्विक स्थिरता के लिए बड़ा खतरा बन सकती हैं।
बीते शनिवार को, एक पूर्व अनुमान के अनुसार, अमेरिका ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए, जिसे 'अब तक का सबसे बड़ा हमला' बताया गया। इन हमलों का मुख्य निशाना ईरान के तेल के भंडार और रिफाइनरियां थीं।CNN के पत्रकारों द्वारा ग्राउंड रिपोर्टिंग से प्राप्त भयावह तस्वीरें इस विनाश का प्रमाण देती हैं। आसमान से तेल की बूंदों की बारिश और सड़कों पर बहता हुआ तेल किसी भीषण त्रासदी का मंजर पेश कर रहे थे।
इन हमलों के कारण ईरान के कई हिस्सों में, विशेषकर तेहरान के पास, रिफाइनरियों में लगी आग से निकला काला धुआं आसमान में छा गया। यह धुआं इतना घना था कि इसने बारिश के रूप में जमीन पर तेल की बूंदों को गिराया, जिसे 'काली बारिश' का नाम दिया गया। यह दृश्य इतना भयावह था कि इसे देखकर किसी भीषण बम धमाके या परमाणु हमले का अहसास हो रहा था। इमारतों, गाड़ियों और यहां तक कि सड़कों पर भी तेल की कालिख की मोटी परत जम गई थी, जो इस विनाश की भयावहता को दर्शा रही थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन हमलों का सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा है। ताजा रिपोर्टों के अनुसार, तेल की कीमतें $115 प्रति बैरल के पार चली गई हैं। यह वृद्धि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि इससे पेट्रोल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें भी बढ़ेंगी, जो आम आदमी के जीवन को सीधे तौर पर प्रभावित करेंगी।
'एपिक फ्यूरी' अभियान का उद्देश्य
यह हमला, जिसे 'एपिक फ्यूरी' नाम दिया गया, ईरान के तेल भंडार को निशाना बनाने के लिए किया गया था। अमेरिका का मानना है कि ईरान के तेल पर नियंत्रण स्थापित करके वह अपनी आर्थिक शक्ति को मजबूत कर सकता है। इसके अलावा, ईरान के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल भंडार है, और उसका तेल अच्छी गुणवत्ता का माना जाता है।
अमेरिकी अधिकारियों का यह भी मानना है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम एक गंभीर खतरा है। हालांकि, कई विशेषज्ञों का मत है कि यह केवल एक बहाना है, और असली मकसद ईरान के तेल पर कब्जा करना है।
इस घटनाक्रम में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है। ईरान के तेल भंडारों पर हमले के साथ-साथ, इजराइल ने ईरान के शुद्ध पानी के स्रोतों, यानी डिसेलिनेशन प्लांट्स पर भी हमला किया है। यह एक अत्यंत गंभीर कदम है, क्योंकि गल्फ देशों में पीने के पानी की भारी कमी है और वे समुद्री पानी को शुद्ध करके पीने योग्य बनाते हैं।
ईरान जैसे देशों के पास पीने के पानी के लिए समुद्री जल पर निर्भरता बहुत अधिक है। बड़े-बड़े डिसेलिनेशन प्लांट्स के माध्यम से समुद्री जल को शुद्ध किया जाता है, जिसमें काफी लागत आती है। इन प्लांट्स पर हमले का मतलब है कि इन देशों में पीने के पानी का संकट गहरा सकता है, जो तेल की किल्लत से भी ज्यादा भयावह हो सकता है।
इस हमले के जवाब में, ईरान ने बहरीन के डिसेलिनेशन प्लांट पर हमला करके अपनी जवाबी कार्रवाई का संकेत दिया है। इससे पश्चिम एशिया में पानी को लेकर एक नया युद्ध छिड़ने की आशंका है।
राजनीतिक खेल और जनहित
इस पूरी घटनाक्रम के पीछे अमेरिका के एक सीनेटर, लिंडसे ग्राहम की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। ईरान का आरोप है कि ग्राहम ने इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू के साथ मिलकर अमेरिकी राष्ट्रपति को ईरान पर हमला करने के लिए उकसाया। ग्राहम का एक इतिहास रहा है, जहां उन्होंने भारत पर 500% टैरिफ लगाने की भी सलाह दी थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह हमला न केवल ईरान की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने के लिए किया गया है, बल्कि यह एक बड़े राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा भी हो सकता है। अमेरिका ईरान को नियंत्रित करके मध्य पूर्व में अपनी धाक जमाना चाहता है।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि इस तरह के संघर्षों का सबसे अधिक खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ता है। युद्ध और उसके परिणाम लोगों को विस्थापित करते हैं, उनकी अर्थव्यवस्था को नष्ट करते हैं और उन्हें बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित कर देते हैं।
फिलहाल, यह जंग धीमी गति से वैश्विक युद्ध का रूप लेती दिख रही है। इसके परिणाम न केवल पश्चिम एशिया तक सीमित रहेंगे, बल्कि पूरी दुनिया को प्रभावित करेंगे। ईरान में नव नियुक्त सुप्रीम लीडर, मोज तवा खमनेई, अब इस मुश्किल दौर में देश का नेतृत्व करेंगे, और यह देखना बाकी है कि अमेरिका और इजराइल की नीतियां उन पर क्या प्रभाव डालती हैं।
दुनिया की चुप्पी भी कई सवाल खड़े करती है। क्या यह चुप्पी अमेरिका के पक्ष में ईरान के खिलाफ होने का संकेत है, या फिर यह आने वाले बड़े बदलावों की प्रस्तावना है? यह तो वक्त ही बताएगा।